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‘आप’ ने खोया आपा: नखलिस्तान से निराशा

जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था, लेकिन जो हुआ वही होना था। ‘आप’ ने अपना आपा खो दिया! कहने को पार्टी ने कहा है कि उसने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से हटा दिया है लेकिन उनका अपराध क्या था और उनकी सफाई क्या थी, यह तो किसी […]

Author March 13, 2015 10:23 AM
‘आप’ ने अपना आपा खो दिया! कहने को पार्टी ने कहा है कि उसने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से हटा दिया है लेकिन उनका अपराध क्या था और उनकी सफाई क्या थी, यह तो किसी ने नहीं बताया। (एक्सप्रेस फ़ोटो)

जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था, लेकिन जो हुआ वही होना था। ‘आप’ ने अपना आपा खो दिया! कहने को पार्टी ने कहा है कि उसने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से हटा दिया है लेकिन उनका अपराध क्या था और उनकी सफाई क्या थी, यह तो किसी ने नहीं बताया।

यह भी नहीं बताया कि उनकी सफाई में ऐसा क्या था कि जिस पर भरोसा करना इतना कठिन था कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना अटल हो गया? अगर ऐसा ही था तब यह जरूरी था- नैतिक दृष्टि से भी और राजनीतिक परिपक्वता की दृष्टि से भी- कि अरविंद केजरीवाल इस बैठक में उपस्थित रहते। क्या वे इतने बीमार थे कि घर से निकल कर बैठक में आ ही नहीं सकते थे? अगर ऐसा था तब यह लाजिमी था कि बैठक आगे के लिए टाल दी जाती। दोनों में से कोई भी रास्ता लिया जाता तो पार्टी और अरविंद केजरीवाल, दोनों की छवि साफ होती। अंधेरे में गुपचुप की गई हर कार्रवाई अंधेरा ही फैलाती है और अविश्वास ही गहरा करती है।

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योगेंद्र-प्रशांत को निकाल बाहर करने का यह फैसला भी ‘आप’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से नहीं किया बल्कि बहुमत से किया- 8 बनाम 11! इसका सीधा मतलब यह हुआ कि यह दो व्यक्तियों का मामला था नहीं, दो प्रवाहों का मामला था। आप बचाते उसे ही हैं जिसे आप चाहते हैं, मानते हैं, खोजते हैं और पाते हैं। जो कहीं पड़ा मिल जाता है वह न संभाला जाता है और न उसका किसी को दर्द होता है। लगता है, कुछ ऐसा ही यहां भी हुआ है।

अरविंद का बैठक में नहीं आना बताता है कि उन्होंने इन दोनों के साथ अब आगे नहीं चलने का फैसला कर लिया था और अपने सिपहसालारों को साफ निर्देश दे दिया था कि यह आॅपरेशन पूरा करो। इसमें कुछ गलत भी नहीं था। राजनीतिक दल इसी तरह काम करते हैं जहां यह माना जाता है कि नेतृत्व एक का ही होता है और वह एक ही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है।

जब तक अण्णा का आंदोलन चल रहा था, ऐसा लगता था कि एक टीम है जो सारा संयोजन-निर्देशन कर रही है। मतभेद और प्राथमिकताओं के बारे में विभेद तब भी रहे ही होंगे क्योंकि यह आदमी की बुनियादी कमजोरी है और राजनीति इनसे ही खेलने का दूसरा नाम है। लेकिन तब प्रकाश में अण्णा हजारे थे तो दूसरी अंधेरी वृत्तियों को आगे आने का अवसर नहीं मिलता था। फिर भी छन-छन कर कुछ बातें तो आती ही थीं।

स्वामी अग्निवेश वगैरह को निकालने आदि का प्रसंग तो तब भी हुआ ही था। फिर भी एक टीम का आभास तो था ही। लेकिन आंदोलन के लोगों ने जैसे ही पार्टी बनाई, सबसे पहले टीम खत्म हो गई और सब कुछ एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने लगा। फिर तो ‘मफलर मैन’ का प्रतीक ही रच दिया गया।

यह मानने का भी कारण नहीं है कि योगेंद्र और प्रशांत के भीतर कोई राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा नहीं होगी। यह भी माना ही जा सकता है कि इन्होंने ‘आप’ पार्टी की कमान अपनी तरफ करने की कोशिश की होगी। अब तो कई लोग इस बात को खासी कड़वाहट से और सप्रमाण बताने लगे हैं कि इन दोनों ने कैसे समय-समय पर अरविंद को नीचा दिखाने की, उन्हें अयोग्य साबित करने की, पार्टी के भीतर अपनी स्वतंत्र हैसियत बनाने की, दिल्ली चुनाव में पार्टी की पराजय हो ताकि अरविंद की विफलता को ठोस आधार दिया जा सके आदि-आदि की कोशिशें कीं।

ये दोनों, खासकर योगेंद्र, अण्णा आंदोलन में थे नहीं और अगर थे तो इसी भूमिका में कि आंदोलन से निकल कर, राजनीतिक पार्टी की तरफ अविलंब कैसे जाया जाए। आम आदमी पार्टी बनी तो ये लोग पार्टी का चेहरा बने। और फिर राजनीतिक पार्टी ही नहीं बनी, राजनीति अपने सारे गुण-दोष के साथ यहां भी आकार लेने लगी।

अब कोई अण्णा हजारे भी नहीं थे कि जिनकी कमान का थोड़ा-बहुत लिहाज भी रहता था। बड़ी आसानी से लेकिन पहले से की गई बड़ी तैयारी के कारण अण्णा की जगह अरविंद ने ले ली और जिन लोगों को यह रास आता था, उन्होंने इसे खूब हवा भी दी। टोपियां बन गर्इं, जिन पर अण्णा आंदोलन की पैरोडियां छपवाई गई थीं। पोस्टर और बैनर और नारे सब अण्णा आंदोलन के, नाम ‘आप’ का, ऐसी रणनीति बनाई।

यही सब तो है जिसके लिए राजनीति की जाती है! लेकिन दोनों धड़ों ने जो बात भुला दी वह यह थी कि ‘आप’ ने राजनीति भले की हो लेकिन वह कोई राजनीतिक दल नहीं था। वह दल बना तो इस दावे के साथ कि वह राजनीतिक दलों की परिभाषा बदल देगा। हम नई राजनीति के लिए आए हैं, बार-बार कहने वाले अरविंद एक बार भी यह कहते हुए देश के सामने नहीं आए कि यह व्यक्तिवाद ‘आप’ पार्टी के लिए जहर का काम करेगा। नई राजनीति का यह दावा ही है जो आज उसके गले की हड््डी बना है। आदर्श जब भीतर नहीं होते हैं तब बाहरी शब्द बहुत भारी साबित होते हैं और कदम-कदम पर आपकी पोल खोलते रहते हैं। ‘आप’ के साथ भी ऐसा ही हो रहा है।

वर्ष 2013 से शुरू हुए राजनीतिक सफर में ‘आप’ ने जितना खोया है, उससे कहीं ज्यादा पाया है और कहा जा सकता है कि आसानी से ही पाया है। स्थापित राजनीतिक दलों की हमेशा यही कोशिश रहती है कि उनके खेल में कोई नया खिलाड़ी शामिल न हो। इससे एकाधिकार बंटता है। वे अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं और इसलिए 2013 में भी जब ‘आप’ ने अपना पहला चुनाव लड़ा और जीता था और उनचास दिनों की सरकार बनाई थी, और फिर 2015 में भी, जब उसने फिर से दिल्ली का चुनाव लड़ा, सारे स्थापित राजनीतिक दलों ने एक स्वर से उसे खारिज ही नहीं किया था बल्कि इस मैदान में नहीं उतरने की सलाह भी दी थी।

लेकिन फिर जो हुआ और जैसे हुआ वह हम सब जानते हैं और हम यह भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने की घोषित लालसा से जो चुनाव नरेंद्र मोदी ने लड़ा और अपूर्व आंकड़ों के साथ जीता, ‘आप’ की यह जीत उतनी ही बड़ी और चमत्कारी रही। इसलिए हमने देखा कि इस जीत से सबसे अधिक आहत भी भारतीय जनता पार्टी ही हुई और जनता के फैसले का सम्मान करने वाले मुखौटानुमा बयानों के बाद भी उसकी कड़वाहट कभी, किसी भी स्तर पर छिपी नहीं रही।

लेकिन ‘आप’ की अपनी कड़वाहट भी कहां छिपी! दिल्ली चुनाव की तैयारियों के दरम्यान ही ऐसी खबरें आ रही थीं कि पार्टी के भीतर बहुत कुछ ठीक नहीं चल रहा है और उसके कई वरिष्ठ नेता बस इसी इंतजार में हैं कि कब चुनाव खत्म हों, नतीजे आएं और फिर वे अपना फैसला सुनाएं! हवा में चर्चा थी कि कई लोग पार्टी छोड़ेंगे या फिर पार्टी की कार्यशैली में बदलाव होगा। देखें तो पार्टी की कार्यशैली में कोई वैसी गड़बड़ नहीं थी। देश के सारे ही राजनीतिक दल जिस शैली में चलते आ रहे हैं, और जो शैली सबको मुफीद पड़ती है, वही शैली तो ‘आप’ की भी थी और है। इस शैली में सारे दल लोकतंत्र का नाम लेते हैं और उसे मजबूत करने के लिए सत्ता में आना चाहते हैं लेकिन उनके भीतर कहीं, कोई लोकतंत्र नहीं होता है।

हम देखते हैं कि हर पार्टी में एक व्यक्ति है जिसकी चलती है और उसके आगे-पीछे करने वाले लोग हैं जो उसके नाम से अपनी चलाते हैं। बहुत सारी पार्टियां पारिवारिक जागीर बन कर रह गई हैं। टिकट वितरण में परिजनों, रिश्तेदारों, मित्रों का नंबर पहले आता है, उनसे बच गया तभी दूसरों का हिस्सा लगेगा। जहां दलों का यह चरित्र हो, वहां आंतरिक लोकतंत्र और मुद््दों पर खुले मन से विचार-विमर्श की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है।

दलों के इस स्वरूप और कार्य-प्रणाली को लेकर कोई व्यापक बहस नहीं चलती, तो उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि बहुत-से लोग मान बैठे हैं कि यह सब पार्टियों का आंतरिक मामला है। मगर हमारा लोकतंत्र ठीक से चले और उसका संवर्धन हो, इसके लिए यह अनिवार्य है कि उसके औजार लोकतांत्रिक ढंग से काम करें।

अगर पार्टियों का चरित्र लोकतांत्रिक नहीं होगा, तो लोकतंत्र का ढांचा भले रहे, उसकी आत्मा नहीं रहेगी। यों इन सबको लोकतंत्र बहुत प्रिय है लेकिन तभी तक जब तक उसका ठीकरा उनके अपने सिर पर न फूटने लगे। ऐसा होते ही सब इस लोकतंत्र को गंदे कपड़ों की गठरी की तरह फेंक देते हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, उमर अब्दुल्ला, नीतीश कुमार आदि की मुट््ठी में जो पार्टी आती है उसके आंतरिक लोकतंत्र को धता बता कर, ये बाह्य लोकतंत्र के लिए लड़ते हैं। अरविंद केजरीवाल ने भी ‘आप’ को इसी मॉडल से चलाना चाहा और चुनावी सफलताएं भी हासिल कीं।

कहा जाता है कि ‘आप’ एक प्रभावी जनांदोलन से जनमी पार्टी है। यह छवि है लेकिन सच नहीं है। अण्णा हजारे ने जन लोकपाल आंदोलन को जो दिशा दी और लोक-आंदोलन की जिस रणनीति से उसे चलाना चाहा उससे असहमत होकर ही अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने ‘आप’ बनाई। मतलब यह कि ‘आप’ आंदोलन से पैदा हुई पार्टी नहीं है बल्कि आंदोलन की निराशा से पैदा हुई पार्टी है। अगर यह सच है तो ‘आप’ में जो हो रहा है वह स्वाभाविक है। लेकिन उनका क्या जो उस छवि से खिंच कर ‘आप’ के साथ हुए, जो यथार्थ थी ही नहीं? उन्हें अपने गलत चयन की पीड़ा भोगनी ही होगी। हम उसका बोझ अरविंद केजरीवाल पर नहीं डाल सकते।

अरविंद केजरीवाल स्वस्थ होकर लौटें और हमें अपने वादे पूरे करने वाली ईमानदार सरकार चला कर दिखाएं, तो बस है। लोग अपना आपा कहीं और खोज लेंगे।

 

कुमार प्रशांत

 

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