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शहीदों की याद में

चीन के साथ 1962 में हुई जंग के बाद पहली बार रणभूमि में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों की याद में युद्ध स्मारक बनाने की मांग उठी थी।

चीन के साथ 1962 में हुई जंग के बाद पहली बार रणभूमि में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों की याद में युद्ध स्मारक बनाने की मांग उठी थी। करीब आधी सदी गुजर जाने और चीन के युद्ध के बाद भी कई युद्ध होने के बाद अब राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का सपना सच होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने आखिर राष्ट्रीय स्मारक और युद्ध संग्रहालय के निर्माण की मांग को मंजूरी प्रदान कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। आजादी के बाद देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों की याद में यह स्मारक और संग्रहालय दिल्ली में इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्कमें बनेगा।

पर यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि युद्ध स्मारक बनाने का फैसला लेने में इतना वक्त क्यों लगा। पूछा जा सकता है कि जब एशियाई खेलों से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों तक के आयोजन में भारी धनराशि खर्च हो सकती है, तो फिर शहीदों की याद में स्मारक बनाने के रास्ते में क्या चीज आड़े आ रही थी!

आजादी के बाद देश की सेनाओं ने चीन के खिलाफ 1962 में और पाकिस्तान के खिलाफ 1948, 1965, 1971 और 1999 में जंग लड़ी। 1987 से 1990 तक श्रीलंका में आॅपरेशन पवन के दौरान भारतीय शांति सेना के शौर्य को भी नहीं भुलाया जा सकता है। 1948 में 1110 जवान, 1962 में 3250 जवान, 1965 में 364 जवान, श्रीलंका में 1157 जवान और 1999 में 522 जवान शहीद हुए। ऐसे जवानों की भी कमी नहीं, जो अलगाववाादियों को पस्त करते हुए शहीद हुए, लेकिन बदले में बेरुखी के अलावा उनके परिजनों को कुछ नहीं मिला।

अभी चंद रोज पहले की बात है जब राजधानी के इंडिया गेट के करीब से गुजरते हुए देखा कि उससे सटे हुए प्रिंसेस पार्कमें सब कुछ सामान्य है। वहां पर रहने वाले रह रहे हैं। वहां पर जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही है। लगता है कि इधर काम करने वालों या रहने वालों को मालूम भी नहीं कि इधर ही मोदी सरकार ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाने का फैसला किया है। प्रिंसेस पार्क को देख कर हैरानी इसलिए हुई क्योंकि इधर ही नेशनल वॉर मेमोरियल यानी राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण होना है। अब माना जा सकता है कि इधर स्मारक को लेकर काम तेजी से चालू हो जाएगा।

बीते लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के समय भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने राजधानी में युद्ध स्मारक के निर्माण का बार-बार वादा किया था। उसके बाद उनके नेतृत्व में केंद्र में राजग सरकार का गठन हुआ। राजग सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने स्मारक तथा संग्रहालय के निर्माण के लिए अपने पहले अंतरिम बजट में सौ करोड़ रुपए रखे भी थे। पर उसके बाद स्मारक के काम पर विराम-सा लग गया था।

कुछ दिन पहले भारत-चीन युद्ध के नायक रिटायर्ड कर्नल वीएन थापर से मुलाकात हुई। वे करगिल युद्ध में शहीद हुए अपने बेटे विजयंत थापर के नाम पर बनी नोएडा की एक सड़क पर लगे तमाम पोस्टरों को उखाड़ कर लौटे थे। हर हफ्ते उनका यह तय कार्यक्रम होता है। दरअसल, उस सड़क पर, जहां शहीद विजयंत थापर का नाम लिखा है, पोस्टर लगा दिए जाते हैं। डबडबाई आंखों से कर्नल थापर कहने लगे कि युद्ध के बाद शहीदों की कुर्बानी अक्सर भुला दी जाती है। सिर्फ करीबी रिश्तेदार और दोस्त उन्हें याद करते हैं। वे आंखें पोंछें, उससे पहले उनकी पत्नी तृप्ता थापर शिकायती लहजे में बोल पड़ती हैं, अपने योद्धाओं को याद करने के लिए हम एक राष्ट्रीय युद्ध स्मारक तक नहीं बना सके। इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है! अलबत्ता, इसे लेकर वादे खूब होते रहे हैं।

हालांकि कुछ बुद्धिजीवी युद्ध स्मारक बनाने के पक्ष में नहीं हैं। वे मानते हैं कि यह एक तरह से भारत का अमेरिकीकरण करने की दिशा में एक और कदम होग। वे युद्ध स्मारक की मांग को सिरे से खारिज करते हैं। उनका मानना है कि युद्ध स्मारक के अपने आप में दो पहलू हैं। पहला, शहीदों को याद रखना। दूसरा, युद्ध के विचार को जीवित रखना। क्या दूसरे विचार को सही माना जा सकता है? कतई नहीं। जंग की विभीषिका के विचार को खत्म करना होगा।

बहरहाल, यह भी एक राय है। पर देश तो चाहता है कि युद्ध स्मारक बने। कहने की जरूरत नहीं कि रणबांकुरों को लेकर कुल मिला कर सरकारों का रुख बेहद ठंडा रहा है। इससे अधिक निराशाजनक बात क्या हो सकती है कि पाठ्य पुस्तकों में उन युद्धों पर अलग से अध्याय तक नहीं हैं, जिनमें हमारे जवानों ने जान की बाजी लगा दी। हां, गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर उन्हें याद करने की रस्मअदायगी हम जरूर कर लेते हैं।
सबसे दुखद पहलू यह है कि अब सेना को नीचा दिखाने की चेष्टा हो रही है। सुकना और आदर्श घोटालों के चलते सेना के तीनों अंगों को भ्रष्ट साबित करने की कोशिश की गई। मतलब, सेना के प्रति सम्मान का भाव रखना तो दूर, अब उसकी छवि के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब लुधियाना के मुख्य चौराहे पर 1971 की जंग के नायक शहीद फ्लाइंग आॅफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों की आदमकद मूर्ति के नीचे लगी पट्टिका को उखाड़ दिया गया था।

काफी दिनों के बाद ही नई पट्टिका लगाने की जरूरत महसूस की गई। जबकि लुधियाना सेखों का गृहनगर है और अदम्य साहस और शौर्य के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। सेखों के भतीजे अवतार सिंह कहते हैं, ‘लंबी जद्दोजहद के बाद लुधियाना प्रशासन ने पट्टिका लगाने के बारे में सोचा।’ यह सिलसिला यहीं नहीं थम जाता। मोदीनगर (उत्तर प्रदेश) में 1965 के युद्ध के नायक शहीद मेजर आशाराम त्यागी की मूर्ति देख कर तो किसी भी सच्चे भारतीय का कलेजा फटने लगेगा। इसी तरह से दिल्ली सरकार ने भी शायद ही कभी कोशिश की हो कि 1971 की जंग के नायक अरुण खेत्रपाल के नाम पर किसी सड़क या अन्य स्थान का नामकरण किया जाए।

आपको याद होगा कि करगिल युद्ध के बाद राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के निर्माण की मांग ने जोर पकड़ा था। हालांकि चीन के खिलाफ जंग के बाद भी स्मारक बनवाने की मांग हुई थी। पहले स्मारक को इंडिया गेट परिसर में बनी छतरी के पास ही बनाने की बात थी। सरकार का युद्ध स्मारक में पचास हजार शहीदों के नाम अंकित करने का प्रस्ताव है। इसमें वे शहीद भी शामिल होंगे जो अलगाववादियों से मुकाबला करते हुए शहीद हुए।

खैर, यह अफसोस की बात तो है कि अंग्रेजों ने विश्वयुद्ध में शहीद भारतीय सैनिकों की याद में इंडिया गेट बनवाया। वहां सभी शहीदों के नाम अंकित हैं, पर हमें अपने योद्धाओं के लिए स्मारक बनाने का निर्णय करने में इतना वक्त क्यों लगा। अब एक सवाल। क्या करगिल या इससे पहले 1965 या 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई जंग के किसी भारतीय नायक की पुस्तक का पाकिस्तान में विमोचन हो सकता है? कतई नहीं। पर इस लिहाज से हम वास्तव में बहुत उदारवादी हैं! हमने पाकिस्तान के 1965 की जंग के नायक फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान की किताब का नई दिल्ली में विमोचन करने की अनुमति दी।

यही नहीं, हम करगिल जंग के लिए जिम्मेदार परवेज मुशर्रफको अपने यहां सेमिनारों में सुनते रहे। उनका दिल्ली वाला होने पर गर्व महसूस करते रहे। बताते चलें कि अरशद पिता थे पार्श्व गायक अदनान सामी के। अब जब देश राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाने को लेकर सरकार के फैसले का जश्न मना रहा है तो यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि अरशद और परवेज मुशर्रफ को हम अतिरिक्त सम्मान क्यों देते रहे। यह कहां तक वाजिब है? फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान को पाकिस्तान अपने सबसे आदरणीय योद्धाओं की श्रेणी में रखता है। उनका खास तौर पर उल्लेख पाकिस्तान की वेबसाइट में किया गया है। उनकी तस्वीर के साथ उनकी बहादुरी का बखान किया गया है।

फ्लाइट लेफ्टिनेंट अरशद सामी खान के संबंध में किए गए इस दावे की जांच की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान अपने योद्धाओं के रणभूमि के कारनामों को महिमामंडित करने के लिए हमेशा उत्साही रहा है।

देखा जाए तो फ्लाइट लेफ्टिनेंट खान को अपने मुल्क में जितना भी सम्मान मिले, इससे हमें क्या फर्क पड़ता है। मगर उसी फ्लाइट लेफ्टिनेंट सामी की किताब का विमोचन राजधानी में होता है। यह बात है 28 फरवरी, 2008 की। पुस्तक का नाम था- ‘लाइफ पॉवर ऐंड पॉलिटिक्स’। उस विमोचन के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह समेत राजधानी के ‘सेमिनार सर्किट’ यानी बौद्धिक हलके के अनेक नामी-गिरामी लोग मौजूद थे।

क्या 1971 की जंग के भारतीय नायक सैम मानेक शॉह को पाकिस्तान में अपनी पुस्तक के लोकार्पण का मौका मिलता? बिल्कुल नहीं। बेशक, उदारवादी होना अच्छी बात है। पर याद रखिए कि अपने ऊपर हमला करने वालों या उसकी रणनीति बनाने वालों (मसलन परवेज मुशर्रफ) को सेमिनारों में बुला कर सुनना अपने शहीदों का अपमान करने से कम नहीं है।
विवेक शुक्ला
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