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खतरे में क्यों हैं डॉक्टर

पिछले पंद्रह वर्षों में भारत के उन्नीस राज्यों में डॉक्टरों एवं अस्पताल कर्मचारियों के साथ होने वाली हिंसा से निपटने के लिए कानून बनाए गए हैं। लेकिन एक आरटीआइ से पता चला कि अधिकांश मामलों में एफआइआर ही दर्ज नहीं हुई। जिन इक्का-दुक्का मामलों में एफआइआर दर्ज भी हुई उनमें या तो समझौता हो गया और मामला अदालत तक नहीं पहुंचा या फिर कोर्ट में आरोपी बरी हो गए।

Author July 1, 2019 2:25 AM
2006 से 2017 के मध्य भारत में डॉक्टरों पर सौ से ज्यादा हमले हुए और इनमें से 2015 एवं 2016 में सत्रह-सत्रह और 2017 में चौदह मामले दर्ज हुए।

राजू पांडेय

डॉक्टरों के प्रति असंतोष और आक्रोशित मरीजों की शाब्दिक और शारीरिक हिंसा कोई नई परिघटना नहीं है। सन् 1892 में अमेरिका की एक प्रसिद्ध शोध पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र ‘असॉल्टस अपॉन मेडिकल मैन’ की प्रारंभिक पंक्तियां हमें बताती हैं कि डॉक्टरों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति न तो नई है, न ही केवल हमारे देश तक सीमित है। शोध पत्र कहता है कि चिकित्सक कितना ही ईमानदार, कर्त्तव्य परायण और समर्पित क्यों न हो, वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसे अनावश्यक आक्रमण, दुर्भावनापूर्ण दोषारोपण, ब्लैकमेल और इलाज के दौरान मरीज को हुए कथित नुकसान के लिए मुकदमों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

भारत में डॉक्टरों के साथ हिंसा की घटनाएं पिछले चार साल में ज्यादा बढ़ी हैं। यह हिंसा डॉक्टरों के साथ मारपीट तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन पर जानलेवा हमले तक किए गए। अस्पतालों को नुकसान पहुंचाया गया और अन्य मरीजों के जीवन को भी हिंसक भीड़ द्वारा खतरे में डाला गया। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) ने 2015 में एक अध्ययन कराया था। इसमें यह सामने आया कि कार्य के दौरान पचहत्तर फीसद डॉक्टरों को हिंसा का सामना करना पड़ा। दिसंबर 2018 में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार 2006 से 2017 के मध्य भारत में डॉक्टरों पर सौ से ज्यादा हमले हुए और इनमें से 2015 एवं 2016 में सत्रह-सत्रह और 2017 में चौदह मामले दर्ज हुए। पिछले पंद्रह वर्षों में भारत के उन्नीस राज्यों में डॉक्टरों एवं अस्पताल कर्मचारियों के साथ होने वाली हिंसा से निपटने के लिए कानून बनाए गए हैं। लेकिन एक आरटीआइ से पता चला कि अधिकांश मामलों में एफआइआर ही दर्ज नहीं हुई। जिन इक्का-दुक्का मामलों में एफआइआर दर्ज भी हुई उनमें या तो समझौता हो गया और मामला अदालत तक नहीं पहुंचा या फिर कोर्ट में आरोपी बरी हो गए। इस तरह डॉक्टरों पर हिंसा के लिए किसी भी दोषी को सजा नहीं मिली।

डॉक्टरों के खिलाफ होने वाली हिंसा के लिए चीन 2010 के बाद से निरंतर चर्चा में रहा है। ‘द लैंसेट’ पत्रिका ने 2014 में चीन में डॉक्टरों के साथ होने वाली बर्बरता और डॉक्टरों की हत्या की चर्चा की थी। इजराइल में 1999 में किया गया एक अध्ययन यह दर्शाता है कि इमरजंसी में काम करने वाले सत्तर फीसद डॉक्टरों और नब्बे फीसद सहायक कर्मचारियों को हिंसा का शिकार होना पड़ा। अमेरिका में तो 1980-90 के दशक में ही सौ से ज्यादा स्वास्थ्य पेशेवर हिंसा में मारे गए थे। यह आंकड़ा आने वाले दशकों में कमोबेश वैसा ही रहा। ब्रिटेन में हाल ही में छह सौ डॉक्टरों पर किए गए एक सर्वेक्षण में यह पता चला कि इनमें से एक तिहाई को किसी न किसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों में भी हालात कुछ जुदा नहीं हैं।
भारत में डॉक्टरों पर होने वाले हमले मरीजों के परिजनों, उनकी मदद के लिए आए बाहुबली की छवि रखने वाले तथाकथित समाजसेवियों या छुटभैये नेताओं-कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दिए जाते हैं। डॉक्टरों पर होने वाली हिंसा के कारण अनेक हैं। सरकारी अस्पतालों में जरूरी बुनियादी सुविधाओं का घनघोर अभाव रहता है। डॉक्टरों और सहायक कर्मियों की संख्या बहुत कम होती है। लंबी प्रतीक्षा के बाद मरीजों को डॉक्टर तक पहुंचने का अवसर मिलता है। काम के दबाव के कारण डॉक्टर उन्हें पर्याप्त समय नहीं दे पाते। ऐसे में मरीजों के साथ डॉक्टरों का मधुर व्यवहार कैसे संभव हो सकता है? सरकारी अस्पतालों में प्राय: इमरजंसी और आइसीयू में जीवन रक्षक उपकरण खराब होते हैं या समुचित मात्रा में नहीं होते। बिस्तरों की संख्या कम होती है। अनेक प्रकार की जांच और परीक्षणों की सुविधा सरकारी अस्पतालों में न होने के कारण मरीजों को बाहर निजी प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। मरीजों की देखरेख में कर्मचारियों की लापरवाही के किस्से जगजाहिर हैं। ये सारी परिस्थितियां मरीजों और उनके परिजनों के भीतर अंसतोष पैदा कर देती हैं। ऐसे में मामूली-सा विवाद बड़ी घटना का रूप धारण कर लेता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखल भी डॉक्टरों के प्रति असंतोष और आक्रोश को बढ़ाने का बड़ा कारण है। सरकारी डॉक्टर तबादले, मनचाहे स्थान पर पदस्थापना और अन्य लाभों के लिए राजनेताओं और अपने आला अधिकारियों की कृपा पर निर्भर होते हैं। ऐसे डॉक्टरों की भी कमी नहीं है जो सरकार में नौकरी करते हुए भी अपने क्लीनिक और नर्सिंग होम चला रहे हैं और मरीजों को अस्पताल के बजाय अपने यहां आने को बाध्य करते हैं। जब ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ असंतोष भड़क उठना स्वाभाविक है। पिछले तीन-चार साल में अस्पतालों में सुरक्षा प्रबंधों के संबंध में अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। कुछ क्षेत्रों को सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील माना गया है। इनमें इमरजंसी सर्वप्रमुख है जहां कार्य करते हुए सर्वाधिक डॉक्टर हिंसा का शिकार हुए हैं। आइसीयू और उसके आसपास का क्षेत्र, शिशु रोग वार्ड, बिलिंग एरिया और प्रतीक्षालय भी हिंसा के केंद्र रहे हैं। डॉक्टरों ने मरीजों के साथ आने वाले परिजन की संख्या को एक तक सीमित करने का सुझाव दिया गया है। संवेदनशील क्षेत्रों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था देने का सुझाव भी है। प्रत्येक अस्पताल में एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव है जिसमें हिंसा भड़कने पर खुद को बंद किया जा सके और जहां से पुलिस बल आदि को बुलाया जा सके। इसके अलावा डॉक्टरों और उनके सहायकों को प्रशिक्षण देने की भी जरूरत है, ताकि वे तनावपूर्ण परिस्थितियों का मुकाबला कर सकें। और सबसे बड़ा सुझाव तो यह कि डॉक्टरों और मरीज व उसके परिजनों के बीच बेहतर संवाद हो। अनेक मरीज व उनके परिजन अशिक्षित होते हैं। वे डॉक्टर की बात भी नहीं समझते। ऐसी दशा में स्थानीय भाषा समझने वाले दुभाषिये की मदद से इन्हें इलाज के दौरान अनहोनी की संभावना और संभावित खर्च के विषय में आगाह किया जा सकता है। छोटे कस्बों और गांवों में ग्राम सभाओं और स्थानीय संस्थाओं द्वारा डॉक्टरों पर हमला करने वालों पर जुर्माना आदि लगाया जा सकता है। चीन में डॉक्टरों पर हमले के दोषियों को राज्य की सबसिडी और कल्याणकारी योजनाओं के लाभों से वंचित कर दिया जाता है। ऐसा ही प्रयोग भारत में किया जा सकता है।

भारत रत्न डॉक्टर बिधान चंद्र रॉय के जन्म एवं निर्वाण दिवस एक जुलाई को मनाए जाने वाले ‘डॉक्टर्स डे’ के अवसर पर एक चर्चित प्रसंग का उल्लेख प्रासंगिक है। मई, 1933 में जब महात्मा गांधी पूना में इक्कीस दिन के उपवास पर थे। उनकी तबीयत बिगड़ रही थी। तब उनके मित्र और चिकित्सक डॉक्टर बीसी रॉय उन्हें देखने पहुंचे। बापू ने पहले तो दवा लेने से इंकार कर दिया, क्योंकि वे भारत में बनी हुई नहीं थीं। उन्होंने डॉ बीसी रॉय से कहा- तुम मेरी मुफ्त चिकित्सा करने आए हो, किंतु क्या तुम देश के चालीस करोड़ लोगों को मुफ्त इलाज दे सकते हो? डॉ रॉय ने उत्तर दिया- नहीं। मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं सबका मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। लेकिन यहां मैं मोहन दास करमचंद गांधी का इलाज करने नहीं आया हूं, बल्कि उस व्यक्ति का इलाज करने आया हूं जिसे मैं हमारे देश की चालीस करोड़ जनता का प्रतिनिधि समझता हूं। कहा जाता है कि इस उत्तर को सुन कर बापू ने हथियार डाल दिए और चिकित्सा के लिए सहमत हो गए। दुर्भाग्य से न तो अब बापू जैसे नेता हैं, न डॉ बीसी रॉय जैसे चिकित्सक। ‘डॉक्टर्स डे’ यह अवसर प्रदान करता है कि इन विभूतियों के बहाने भुलाए जा रहे उदात्त जीवन मूल्यों की महत्ता का स्मरण किया जाए।

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