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प्रधानमंत्री का बैंक

कुमार प्रशांत जनसत्ता 12 सितंबर, 2014: प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त को लाल किले से अपनी जिन हसरतों का जिक्र किया, उनमें एक थी कि इस देश के हर ग्रामीण और गरीब के पास अपना बैंक खाता होना चाहिए। फिर एक पखवाड़े से भी कम समय में, अट््ठाईस अगस्त को एक करोड़ से अधिक लोगों का […]

Author July 6, 2017 5:01 PM

कुमार प्रशांत

जनसत्ता 12 सितंबर, 2014: प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त को लाल किले से अपनी जिन हसरतों का जिक्र किया,
उनमें एक थी कि इस देश के हर ग्रामीण और गरीब के पास अपना बैंक खाता होना चाहिए। फिर एक पखवाड़े से भी कम समय में, अट््ठाईस अगस्त को एक करोड़ से अधिक लोगों का बैंक खाता खुलना, उनका जीवन बीमा होना, उन्हें क्रेडिट कार्ड मिलना आदि कई बातें हुर्इं जिनकी दूसरी मिसाल खोजे नहीं मिलेगी। इन सारे कीर्तिमानों में जो सबसे बड़ी बात दिखाई दी वह यह कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यही नौकरशाही काम करती है। जहां तक देश को चलाने का सवाल है, खोट औजारों में नहीं, कारीगरों में रही है। बहुत समय तक खराब कारीगर ही अगर औजार का इस्तेमाल करते रहते हैं तो औजार भी खराब हो जाता है। हमारे यहां अधिकांशत: यही हुआ है।

सबसे पहले हमें तय यह करना चाहिए कि बैंक हैं क्या? जनसेवा के उपकरण हैं या बाजार में कूद कर कमाई करने की पागल होड़ में पड़े तिकड़मबाजों का अड्डा हैं? प्रधानमंत्री बैंकों को कल्याणकारी राज्य के आर्थिक तंत्र को पुख्ता करने का उपकरण मानते हैं या समाज के सर्व-सामर्थ्यवान वर्ग के हाथ में एक दूसरा औजार कि जिससे वह औने-पौने ढंग से कमाई करे और फिर सरकार के साथ उसकी बंदरबांट कर ले? यह तय हो ले तभी यह भी तय हो सकेगा कि प्रधानमंत्री जन धन योजना में जन कौन है और धन किधर है!

इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो तथाकथित अर्थशास्त्रियों में तालियां बजाने वाले और धिक्कार करने वाले दोनों थे। इसमें अर्थशास्त्र बहुत कम था और अर्थशास्त्रियों की अपनी-अपनी राजनीति बहुत ज्यादा थी। लेकिन तब देश में एक आवाज जयप्रकाश नारायण की भी उठी थी कि सरकारीकरण को राष्ट्रीयकरण मानने की भूल हम न करें! उनका सीधा मतलब यह था कि बैंकों के राष्ट्रीय-सामाजिक उद्देश्य क्या हैं और वे कैसे प्राप्त किए जाएंगे, यह सुनिश्चित किए बिना बैंकों के राष्ट्रीयकरण के तीर से कांग्रेस की अंदरूनी राजनीतिक उठा-पटक में सिंडिकेट को हराया और मिटाया तो जा सकता है, लेकिन राष्ट्रीय धन का राष्ट्र-निर्माण में इस्तेमाल नहीं हो सकता है!

तब जयप्रकाश नारायण ने कहा था, अब नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि बैकों के राष्ट्रीयकरण के सपने कहीं पीछे छूट गए और बैंक कहीं और ही निकल गए। क्यों निकल गए? किधर निकल गए? कैसे निकल गए? अगर इंदिरा गांधी के साथ ऐसा हुआ तो नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा क्यों नहीं होगा? जवाब बैंकिंग के दिग्गजों को और तथाकथित अर्थशास्त्रियों को देना चाहिए।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद, येनकेन प्रकारेण निजी बैकों ने फिर से जगह बनानी शुरू की; हाल-फिलहाल में हमने देखा कि हमारी वित्त-त्रिमूर्ति मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक ने महसूस किया कि हमारे पास पैसों की नहीं, बल्कि बैंकों की कमी है! बहुत सारे बैंक होंगे तो हमारा धन जन तक पहुंचेगा। तो बैंक खोलने के आवेदन आमंत्रित किए गए और आप देखेंगे कि देश का शायद ही कोई कॉरपोरेट घराना होगा जो आवेदन लेकर लाइन में नहीं खड़ा हुआ! आखिर कॉरपोरेट घरानों को क्या हुआ कि वे सब के सब जनसेवा की बीमारी से ग्रस्त हो गए! यह आर्थिक इबोला कहां से फैला?

हमने बहुत सारी व्यवस्थाओं की तरह बैंकिंग की व्यवस्था भी अंगरेजों से उठा ली है। बैकों को जनसेवा का उपकरण बनने देना न वे चाहते थे और न हमने कभी चाहा। उनके लिए बैंक उपनिवेशों का शोषण करने की व्यवस्था थी, हमारे लिए भी वही रही।
कॉरपोरेटों के लिए बैंक एक उद्योग है जिसमें निवेश कर वे मुनाफा कमाना चाहते हैं; सरकार के लिए बैंक जन से धन एकत्रित कर, उसका राजनीतिक इस्तेमाल करने के साधन हैं। कॉरपोरेट घराने साधारण मुनाफे की तरफ आकर्षित नहीं होते, वे मुनाफाखोरी की संभावनाओं का आकलन करते हैं और चार लगा कर कम से कम चालीस पाने की जहां आशा न हो वहां वे फटकते भी नहीं हैं। ऐसे कॉरपोरेट अगर बैंक खोलने के लिए लाइन लगाते हैं तो इसका मतलब समझने के लिए हमारा खगोलशास्त्री होना जरूरी नहीं है। सामान्य समझ ही बहुत कुछ बता देती है।

सरकार इतना ही आंकड़ा देश के सामने रखे तो बात आईने की तरह साफ हो जाएगी कि आजादी के बाद से अब तक, सरकारी और निजी बैंकों ने कॉरपोरेट घरानों को कितना, मझोले और लघु उद्यमियों को कितना ऋण दिया है; उनकी वापसी की दर कितनी रही है और किसके माथे कितना बकाया है?

यह आंकड़ा भी कई सारे रहस्य खोल देगा कि समय-समय पर चुनावी फसलें काटने के लिए ‘ऋण-माफी तथा दूसरी जनहित की घोषणाओं’ के तहत बैंकों को कितना पैसा, कहां और किन्हें, किन शर्तों पर बांटने पर मजबूर किया गया है और बैंकों ने उसका कैसे वहन किया?

एक बार यह तस्वीर देश के सामने रख ही दी जाए कि हमारे जितने भी वित्तीय संस्थान हैं उन सबके वित्तीय व्यवहार की सच्चाई क्या है? प्रधानमंत्री का इतना कहना काफी नहीं है कि अमीरों की तुलना में गरीबों को पांच फीसद से ज्यादा दर पर ऋण मिलता है बल्कि यह बताना भी जरूरी है कि अमीरों को ऋण किसलिए, किन शर्तों पर मिला और उनकी वापसी की स्थिति क्या है? यह भी बताया जाए श्रीमान कि सरकार और वित्तीय संस्थानों ने अब तक किसकी कितनी रकम खट्टूस- राइट ऑफ- कर दी है?

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