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विकास नारायण राय उन्नीस नवंबर की रात रामपाल की गिरफ्तारी से अनिश्चित त्रासद संभावनाओं वाले आश्रम प्रकरण के पटाक्षेप पर सभी को संतोष व्यक्त करना चाहिए। न्यायिक दबाव, पुलिस घेरेबंदी, मानव कवच और मीडिया फोकस के बीच दस दिन तक चला कानून-व्यवस्था का यह खेल बेहद खूनी भी सिद्ध हो सकता था। गनीमत है कि […]

Author November 22, 2014 10:08 am

विकास नारायण राय

उन्नीस नवंबर की रात रामपाल की गिरफ्तारी से अनिश्चित त्रासद संभावनाओं वाले आश्रम प्रकरण के पटाक्षेप पर सभी को संतोष व्यक्त करना चाहिए। न्यायिक दबाव, पुलिस घेरेबंदी, मानव कवच और मीडिया फोकस के बीच दस दिन तक चला कानून-व्यवस्था का यह खेल बेहद खूनी भी सिद्ध हो सकता था। गनीमत है कि खट््टर सरकार और हरियाणा पुलिस के धैर्य के दायरे में ही यह निपट गया। लेकिन छल-पाखंड की सीनाजोरी से भरी रामपाल की सामाजिक-राजनीतिक पैंतरेबाजी के समाधान का यह कानूनी सबक स्थायी भी हो, यह जरूरी नहीं।

कानून के मुकाबले में दुस्साहसी तेवरों की ‘संत’ रामपाल की सुरक्षा मोर्चेबंदी को देख कर आज शायद ही लगे कि यह वही व्यक्ति है जो अतीत में एक दिन कानून की बांह पकड़े अपनी असुरक्षा में थरथराता खड़ा था। अभी वह बरवाला, हिसार के अपने सतलोक आश्रम से पुलिस के निकाले नहीं निकल रहा था, जबकि जुलाई 2006 में वह करोंथा, रोहतक, सतलोक आश्रम से पुलिस के आसरे बच कर निकल जाने की व्यग्रता से भरा हुआ था। तब का रामपाल-प्रसंग महज कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती था, अब वह समूची न्याय-व्यवस्था के लिए पहेली सिद्ध हो रहा है।

कानून को ठेंगा दिखाने वाले इस शख्स को पूर्व में कानून से ही सुरक्षा और राहत दोनों मिल चुकी है। शुरुआत में रामपाल का मुख्यालय करोंथा में होता था। खाप मूल्य-मान्यता की जकड़न वाले इलाके में रामपाल के ‘उन्मुक्त’ जीवन-शैली के आश्रम का आसपास के गांव वालों से स्वाभाविक तनाव का रिश्ता अरसे से चला आ रहा था। वर्ष 2006 में इस ‘कबीरपंथी’ आश्रम का कई दिन का हिंसक घेराव उसी की परिणति थी- न केवल रामपाल और उसके हथियारबंद अंगरक्षक आर्यसमाजियों के उग्र निशाने पर आश्रम में बंद और घिरे हुए थे, उसके तकरीबन चार हजार अनुयायी भी, मुख्यत: स्त्रियां और बच्चे, जो मासिक सत्संग के लिए वहां इकट्ठा थे, फंसे थे।

उस दौरान आश्रम को घेर कर बार-बार आक्रामक पत्थरबाजी तो हुई ही, कई बार हिंसक भीड़ ने अंदर घुसने की कोशिश भी की। ऐसी ही एक कोशिश को विफल करने में आश्रम के अंदर से गोलियां चलाई गर्इं और बाहर एक व्यक्ति की मौत हो गई, कुछ घायल भी हुए। मौके पर पहुंचे डिवीजन के कमिश्नर और रोहतक जिले के पुलिस अधीक्षक भी पुलिस दल के साथ वहीं घेर लिए गए। चारों ओर मीलों तक स्थानीय घेरेबंदी इतनी विकट और उग्र हो गई थी कि मौके पर नई पुलिस टुकड़ियां भेज पाना संभव नहीं हो पा रहा था। इलाके की खापें गोलबंद हो रही थीं और पुख्ता सूचना थी कि अगर रातोंरात रामपाल और उसके अनुयायियों को सुरक्षित न निकाला गया तो अगले दिन आश्रम पर बड़े जानलेवा हमले का आह्वान है।

शाम तक रोहतक शहर के दक्षिण-पश्चिमी छोर की झज्जर चुंगी पर, करोंथा से करीब दस किलोमीटर दूर, पर्याप्त अतिरिक्त पुलिस बल इकट्ठा हुआ और एक कंपनी केंद्रीय रिजर्व बल की भी शामिल की गई। इस अभियान को सिरे चढ़ाने के लिए मुझे उसी शाम मधुबन, करनाल से भेजा गया था। तकरीबन आठ माह पूर्व ही मैं रोहतक रेंज के आइजी की तैनाती से पदोन्नत होकर निदेशक, हरियाणा पुलिस अकादमी, मधुबन बना था। पिछले दस वर्षों के दौरान भी, मैं रोहतक में एक बार बतौर डीआइजी रेंज और दो बार बतौर जिला एसपी तैनात रह चुका था। मुझे विश्वास था कि लोग मुझे जानते हैं, और रामपाल विरोधियों से बातचीत में सहयोग के लिए मैंने एक प्रमुख खाप के वरिष्ठ पदाधिकारी और चंद स्थानीय गणमान्य व्यक्तियों को भी अभियान में चलने के लिए राजी कर लिया। उस अंधेरी रात के चार घंटे के करोंथा तक के बेहद धीमे सफर में हमने दसियों हजार उत्तेजित लोगों से इतनी गालियां झेलीं जितनी मैंने अपने पुलिस जीवन के पैंतीस वर्षों में कुल मिलाकर भी नहीं सुनी होंगी।

इस विस्तार में इसलिए जा रहा हूं कि उस सामाजिक वैमनस्य और सामुदायिक अविश्वास की खिचड़ी की एक झलक पेश कर सकूं जो इलाके की ताकतवर खापों और रामपाल जैसे आश्रमों के बीच पकती रही है और जिसका स्वाद निहित राजनीतिक स्वार्थों को चुनावी फायदे के रूप में रास आता रहा है। करोंथा तक सारे रास्ते में जगह-जगह पेड़ काट कर और सड़क तोड़ कर रुकावटें खड़ी की गई थीं। हर रुकावट पर सैकड़ों व्यक्ति, बहुत-से शराब में धुत, लाठियों और धारदार जेलियों के साथ पुलिस का रास्ता रोके खड़े थे। साथ ही, सड़क के दोनों ओर, आवेश से भरे, हम पर पत्थर चलाते गांव वालों के झुंड के बाद झुंड मिलते गए। गनीमत है, जन-विरोध की भरपूर परंपरा वाले इन इलाकों में ऐसे अवसरों पर बंदूकों का प्रचलन नहीं है। बंदूकें, एक दिन पहले, बेशक आत्मरक्षा के नाम पर, रामपाल आश्रम से उसकी निजी सेना ने ही चलाई थीं।

पहले अवरोधक पर ही स्पष्ट हो गया कि हमारे साथ वाले स्थानीय सहयोगियों को कोई सुनने को तैयार नहीं था। साहस कर वे आगे गए, पर भीड़ ने उन्हें गालियों और धक्कों से किनारे कर दिया। अंतत: बार-बार लाठियां चला कर ही हम तमाम अवरोधकों को एक-एक कर पार कर सके। और क्योंकि पत्थर फेंकने वाले खुले मैदान में थे, लगे हाथ उन्हें भी यथासंभव दूर खदेड़ कर तितर-बितर किया जा सका। हम अपने साथ बीसियों खाली बसें ले गए थे। स्वाभाविक था कि हमारे पहुंचने पर रामपाल समेत आश्रम में घिरे तमाम अनुयायी, जिनमें स्त्रियों-बच्चों की बड़ी संख्या थी, उन बसों में तुरंत निकल भागने को आतुर मिले। वापसी में आश्रम में मौजूद उनकी अपनी कारें, ट्रैक्टर, मोटर साइकिलें भी पुलिस सुरक्षा काफिले का हिस्सा बन गर्इं।

आश्रम से लाइसेंसी/अवैध बंदूकों और पंथी साहित्य के अलावा तमाम अन्य अवांछित सामग्री भी मिली, जिसका जिक्र आज के तनाव-भरे अवसर पर करना संगत नहीं होगा। हां तब तक इस बार बरवाला की तरह एसिड का इस्तेमाल करना रामपाल गिरोह ने शुरू नहीं किया था। रामपाल जैसे नामदान ब्रांड ‘संत’ के भक्त समुदाय के किसी भी जमावड़े में स्त्रियों और बच्चों की बड़ी संख्या में उपस्थिति एक सामान्य बात है। दरअसल, स्त्रियां ही इस ब्रांड की आध्यात्मिक सत्ता का मूल स्रोत हैं और बच्चे मांओं के साथ नत्थी रहते हैं। इस क्षेत्र में प्रचलित राधास्वामी, ब्रह्माकुमारी, राम रहीम जैसे बड़े पंथों के नाम चर्चा-घरों में भी इसी रुझान को देखा जा सकता है।

आध्यात्मिकता के नाम पर बेहद सतही बात करने वाले रामपालों की सामाजिक अपील के आधार को समझने के लिए ग्रामीण स्त्रियों की बड़े पैमाने पर भागीदारी के इस चलन को समझना जरूरी है। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान के गांवों में शराब और मादक पदार्थों की व्यापक मार इन स्त्रियों को ही झेलनी पड़ती है। परिवार के आर्थिक पतन के अलावा नशेबाज मर्दों के हाथों उनकी नियति से जुड़ा नियमित शारीरिक उत्पीड़न उन्हें घोर अवसादित रखता है। इस हताशा में नाम-चर्चा के समागम मनोवैज्ञानिक राहत देने वाले क्लब सिद्ध होते हैं, जहां दीक्षा की पहली ही शर्त है- नशे का बहिष्कार।

ग्रामीण अनुयायियों के लिए इन सामाजिक-सांस्कृतिक क्लबों की सदस्यता निभाना भी आसान होता है, क्योंकि ‘सदस्यता शुल्क’ उपज के रूप में और शारीरिक श्रम से चुकता है। समागम साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, वार्षिक होते रहते हैं और एक दिन, दो-तीन दिन या कभी और अधिक दिनों तक भी चलते हैं। नशेबाज पति की पिटाई से मुक्त उस ग्रामीण स्त्री की राहत की कल्पना कीजिए, जो इन समागमों में रोज के पशु-पानी-चूल्हे-खेत के हाड़तोड़ रूटीन से भी निजात पा जाती है। क्या वह इस ‘पिकनिक’ की प्रतीक्षा नहीं करेगी? उन युवा होते लड़के-लड़कियों के नजरिये से इन ‘क्लबों’ को देखिए, जो अपने गांवों की दमघोंटू खाप नैतिकता के समांतर एक स्वतंत्र वातावरण में मेल-मुलाकात का अवसर पाते हैं। एक बार परिवार की स्त्री इस समागम से जुड़ गई तो वह सारे परिवार को वहां खींच कर लाती रहती है।

खापों के उग्र रामपाल-विरोध की यही जमीन है, अन्यथा उनका भी विश्वास उस कानून के शासन में नहीं, जिसे वे रामपाल पर लागू होते देख मीडिया और पुलिस की जयकार कर रहे हैं, बल्कि नृशंस ‘इज्जत’ हत्याओं (आॅनर किलिंग) में है। यह भी समझना होगा कि अनुयायियों में नशे का बहिष्कार अपना प्रभावक्षेत्र बढ़ाने की रणनीति होती है, न कि उनका सामाजिक दर्शन। वे कभी भी जन-विरोधी सरकारी आबकारी नीतियों का विरोध नहीं करेंगे और न कभी राजनीतिकों के संरक्षण में चलते नशीले पदार्थों के कारोबार पर उंगली उठाएंगे। आध्यात्मिकता के आवरण में यह सिर्फ उनके और अनुयायी के बीच का मामला बना रहेगा।

अब यह भी साफ है कि पंथी आक्रामकता और राजनीतिक तेवरों के प्रदर्शन में रामपाल ने राम रहीम का चुनावी सौदेबाजी का ही रास्ता पकड़ा हुआ है। संयोग से नवंबर 2014 में रामपाल और राम रहीम एक साथ सुर्खियों में भी हैं। एक ओर राज्य की सारी कानून-व्यवस्था मशीनरी हिसार के सतलोक आश्रम में हजारों लोगों के घेरे से ‘संत’ रामपाल को धर पकड़ने की जद्दोजहद में लगी रही, तो पड़ोस के ही शहर सिरसा में सत्तारूढ़ भाजपा के नवनिर्वाचित सैंतालीस में से पैंतीस विधायक, ज्यादा बड़े ‘संत’ राम रहीम के चरणों में चुनावी समर्थन के लिए धन्यवाद ज्ञापन अर्पित कर रहे थे।
रामपाल और राम रहीम, दोनों के विरुद्ध हत्या, जालसाजी जैसे जघन्य आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं। क्या इसे विसंगति कहा जाए कि दोनों ही पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से जमानत पर बाहर हैं। जिस खुले अंदाज में रामपाल आज उच्च न्यायालय के लिए चुनौती पेश कर रहा है, राम रहीम वर्षों पहले कर चुका है। इन वर्षों में रामपाल भी अपना कद बड़ा करते हुए राम रहीम बनने की राह पर नहीं है? यह सवाल भी इतना असंगत नहीं होगा कि क्या राम रहीम प्रभुता के भस्मासुरी भिंडरांवाले मुकाम को नहीं छू रहा है? फिलहाल भाजपाई रणनीति में वह महत्त्वाकांक्षी रामदेव का स्थानापन्न तो बना ही दिया गया है।

रामपाल की कहानी में क्या पूर्णविराम आ चुका है? 2006 में रामपाल पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें सीबीआइ जांच की उसकी मांग छह वर्षों से उच्च न्यायालय में लंबित है। सर्वोच्च न्यायालय से अपने पक्ष में फैसले के बावजूद रामपाल समर्थक आठ वर्ष पूर्व खोया करोंथा आश्रम वापस नहीं ले सके हैं। अब रामपाल पर देश-द्रोह का मुकदमा बना है, पर उसके समर्थकों का सवाल हवा में रह गया कि उसे अदालती अवहेलना की जरूरत ही क्यों पड़ी? उच्च न्यायालय ने उसे आश्रम से ‘स्मोक आउट’ करने की चेतावनी दी थी; पुलिस ने यह स्वीकार करते हुए भी कि अंदर हजारों निर्दोष नागरिक भी हैं आश्रम पर आंसूगैस दागे और वहां की बिजली-पानी बंद कर दी। क्या रामपाल प्रकरण, जो धार्मिक और राजनीतिक पाखंड को शिद््दत से संदर्भित करता है, देश की कानून-व्यवस्था और न्याय-व्यवस्था के सामने भी जरूरी सवाल खड़े नहीं करता?

 

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