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जब भी हम किसी शिव मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो सबसे पहले हमारी नजर एक शांत और स्थिर मुद्रा में बैठे नंदी बैल पर जाती है। उनका चेहरा सदा शिवलिंग की ओर होता है। नंदी को केवल भगवान शिव का वाहन मानना उनके महत्व को कम आंकने जैसा होगा। वे शिवभक्ति, संयम, विवेक और आत्मज्ञान का प्रतीक हैं। चलिए जानते हैं कि शिव मंदिरों में नंदी का स्थान इतना खास क्यों है और उनके दर्शन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है। (Photo Source: Pexels)
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नंदी क पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि शिलाद ने तपस्या करके भगवान शिव से एक ऐसा पुत्र मांगा जो जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो। उनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र अयोनिजा (बिना गर्भ के जन्मा), अमर और स्वयं भगवान शिव के समान तेजस्वी हो। (Photo Source: Pexels) -
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान दिया और कुछ समय बाद, जब ऋषि शिलाद खेत जोत रहे थे तब धरती से एक बालक प्रकट हुआ, जिसका नाम पड़ा नंदी। एक दिन ऋषि शिलाद से मिलने ऋषि मित्र और वरुण आए। बालक नंदी ने दोनों का बहुत सत्कार किया। (Photo Source: Pexels)
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मगर जब दोनों ऋषि वापस जाने लगे तो उन्होंने ऋषि शिलाद से कहा कि आपका पुत्र सर्वगुण संपन्न है, लेकिन हमें दुख है कि वह सिर्फ 8 वर्ष तक ही जीवित रहेगा। ऋषियों कि ये बात सुनकर ऋषि शिलाद रोने लगे। अपने पिता को रोते देख नंदी ने उनसे रोने का कारण पूछा। (Photo Source: Pexels)
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जब नंदी को यह ज्ञात हुआ कि उनका जीवन कुछ समय का है, तो उन्होंने मृत्यु को जीतने के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिवजी उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अमरता का वरदान देते हैं और अपने गणों का अधिपति बनाते हैं। तभी से उन्हें नंदीश्वर के नाम से जाना जाता है। (Photo Source: Pexels)
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शिव मंदिर के बाहर ही क्यों विराजते हैं नंदी?
शिव मंदिर में नंदी हमेशा बाहर ही क्यों विराजमान होता है? इसका कारण यह है कि नंदी हमेशा अपने इष्ट भगवान शिव को अपनी आंखों के सामने देखना चाहता है। इसका अर्थ है, भक्त को अपने इष्ट से दृष्टि नहीं हटानी चाहिए। (Photo Source: Pexels) -
वहीं, भगवान शिव अर्धनारीश्वर के रूप में माता पार्वती के साथ हैं, इसलिए, नंदी कभी मंदिर के अंदर नहीं होते, बल्कि मंदिर के बाहर स्थापित रहते हैं, ताकि भगवान शिव और माता पार्वती दोनों का दर्शन एक साथ हो सके। (Photo Source: Pexels)
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वह एक भक्त और पुत्र के रूप में बाहर बैठते हैं, लेकिन सदैव अपने इष्ट के दर्शन में मग्न रहते हैं। नंदी के दर्शन का एक और महत्व है। उनका यह स्वरूप हमें यह सिखाता है कि मनुष्य को अपना हर क्षण परमात्मा को अर्पित करना चाहिए। (Photo Source: Pexels)
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भक्ति के सर्वोच्च स्तर को प्राप्त करने के बाद नंदी ने भगवान शिव से यह वरदान प्राप्त किया कि जहां भी वह होंगे, वहां भगवान शिव होंगे। यही कारण है कि नंदी हर शिव मंदिर के बाहर स्थापित होते हैं और शिव के साथ पूजे जाते हैं। (Photo Source: Pexels)
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सुनते हैं भक्तों की मनोकामना
श्रद्धालु नंदी के कान में अपनी इच्छाएं कहते हैं, मान्यता है कि नंदी सीधे शिव तक यह संदेश पहुंचाते हैं। इसका भाव है, आपका संकल्प, आपकी प्रार्थना जब भक्ति और विश्वास के साथ कही जाती है, तो वह ईश्वर तक जरूर पहुंचती है। (Photo Source: Pexels) -
आत्मा और शरीर का संबंध
नंदी को शिव का वाहन कहा गया है। जैसे शरीर आत्मा का वाहन है, वैसे ही नंदी शिव का वाहन हैं। नंदी का शिव की ओर देखना यह दर्शाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिकता नहीं, बल्कि स्पिरुचल प्रोग्रेस है। (Photo Source: Pexels) -
नंदी और कर्तव्य
कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा के अनुसार, नंदी बल, संयम, धैर्य और सेवा का प्रतीक हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि हर व्यक्ति को जीवन में पुरुषार्थ (कर्तव्य) करना चाहिए, सच्चाई, निष्ठा और भक्ति के साथ। नंदी के नेत्र स्थिर हैं, शांत हैं। वे सिखाते हैं कि भक्ति के मार्ग पर तभी सफलता मिलती है जब मनुष्य क्रोध, अहंकार और लोभ जैसे दुर्गुणों को त्याग दे। (Photo Source: Pexels)
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