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आज के समय में हम जो भी खरीदते हैं, उसकी कीमत सिर्फ उसकी असली लागत पर तय नहीं होती। असल में, कीमत तय होती है ब्रांडिंग, मार्केटिंग, और हमारी सोच से। कई ऐसी रोजमर्रा की चीजें हैं, जिन्हें बनाने में बहुत कम खर्च आता है, लेकिन बाजार में वे बेहद महंगे दाम पर बेची जाती हैं। सच यह है कि हम सिर्फ प्रोडक्ट नहीं खरीदते, बल्कि सुविधा, इमोशन और ब्रांड वैल्यू भी खरीदते हैं। अगर आप इस बात को समझ लें, तो आप अपने खर्च को काफी हद तक कंट्रोल कर सकते हैं। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ चीजों के बारे में:
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चश्मा
साधारण फ्रेम और लेंस बनाने की लागत काफी कम होती है। लेकिन बड़े ब्रांड्स और सीमित कंपनियों के कंट्रोल के कारण इनकी कीमत सैकड़ों से हजारों रुपये तक पहुंच जाती है। यहां आप क्वालिटी से ज्यादा ब्रांड के लिए भुगतान करते हैं। (Photo Source: Pexels) -
प्रिंटर इंक
छोटे से कार्ट्रिज में आने वाली इंक की कीमत हैरान कर देने वाली होती है। कई बार यह महंगे परफ्यूम या लग्जरी लिक्विड्स से भी ज्यादा कीमत पर बेची जाती है। असल में, प्रिंटर कंपनियां मशीन सस्ती और इंक महंगी बेचकर मुनाफा कमाती हैं। (Photo Source: Pexels) -
हीरे
हीरे उतने दुर्लभ नहीं हैं जितना हमें बताया जाता है। दशकों की मार्केटिंग ने इन्हें ‘प्यार और स्टेटस’ का प्रतीक बना दिया है। यानी आप एक पत्थर नहीं, बल्कि एक इमोशनल आइडिया खरीदते हैं। (Photo Source: Pexels) -
एपिपेन
एलर्जी के इलाज में इस्तेमाल होने वाला यह इंजेक्शन असल में सस्ती दवा से बनता है। लेकिन बाजार में सीमित विकल्प और कंपनियों के नियंत्रण के कारण इसकी कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है। (Photo Source: Pexels) -
कॉलेज टेक्स्टबुक्स
इन किताबों को छापने की लागत कम होती है, लेकिन छात्रों के पास विकल्प सीमित होते हैं। इसलिए प्रकाशक ऊंची कीमत वसूलते हैं, क्योंकि स्टूडेंट्स को ये खरीदनी ही पड़ती हैं। (Photo Source: Pexels) -
मूवी थिएटर पॉपकॉर्न
पॉपकॉर्न बनाना बेहद सस्ता होता है, लेकिन सिनेमाघरों में इसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है। क्योंकि एक बार अंदर जाने के बाद आपके पास दूसरा विकल्प नहीं होता। (Photo Source: Pexels) -
गद्दे
गद्दे साधारण मटेरियल से बनाए जाते हैं, लेकिन उनकी कीमत बहुत ज्यादा होती है। यहां भी असली खेल ब्रांडिंग और ‘कंफर्ट’ की कहानी बेचने का है। (Photo Source: Pexels) -
क्यों होती है इतनी महंगी कीमत?
इन सभी उदाहरणों से एक बात साफ होती है, कीमत का संबंध सिर्फ लागत से नहीं, बल्कि इन फैक्टर्स से होता है ब्रांड वैल्यू, कम प्रतियोगिता, कस्टमर की मजबूरी या जरूरत, सुविधा, स्मार्ट मार्केटिंग और इमोशनल अपील। (Photo Source: Pexels)
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