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प्रकृति के अद्भुत चमत्कारों में से एक नीलकुरिंजी फूल इन दिनों फिर चर्चा में है। यह दुर्लभ नीला फूल दक्षिण भारत की पहाड़ियों में हर 12 साल में केवल एक बार खिलता है और जब यह खिलता है, तो पूरी घाटियां नीले रंग की चादर से ढक जाती हैं। इसकी खूबसूरती देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक, फोटोग्राफर और प्रकृति प्रेमी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। (Photo Source: Indian Express)
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क्या है नीलकुरिंजी फूल?
नीलकुरिंजी, जिसका वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलैंथेस कुंथियाना है, एकैंथेसी परिवार का एक झाड़ीदार पौधा है। यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के शोलावनों में पाया जाता है, खासकर केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक की पहाड़ियों में। (Photo Source: Indian Express) -
इस फूल का नाम तमिल भाषा से आया है, जहां ‘नीला’ का अर्थ है नीला और ‘कुरिंजी’ का अर्थ है फूल। माना जाता है कि नीलगिरी पर्वत श्रृंखला का नाम भी इसी फूल के कारण पड़ा, क्योंकि जब ये फूल खिलते हैं तो पूरी पहाड़ियां नीली दिखाई देती हैं। (Photo Source: Indian Express)
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हर 12 साल में क्यों खिलता है?
नीलकुरिंजी उन दुर्लभ पौधों में शामिल है जिन्हें प्लीटेसियल कहा जाता है। ये पौधे अपनी जिंदगी में सिर्फ एक बार सामूहिक रूप से फूल देते हैं, फिर बीज बनाकर सूख जाते हैं। इसके बाद नए पौधे उगते हैं और अगले 12 वर्षों तक फिर फूल आने का इंतजार करना पड़ता है। (Photo Source: Indian Express) -
नीलकुरिंजी के फूल खिलने का रिकॉर्ड 1838, 1850, 1862, 1874, 1886, 1898, 1910, 1922, 1934, 1946, 1958, 1970, 1982, 1994, 2006, 2018 और 2024 में दर्ज किया गया है। (Photo Source: Indian Express)
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कब और कहां खिलता है?
यह फूल आमतौर पर जुलाई से अक्टूबर के बीच खिलता है और 1300 से 2400 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में उगता है। इसकी ऊंचाई आमतौर पर 30 से 60 सेंटीमीटर होती है, लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में यह 180 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। (Photo Source: Indian Express) -
नीलकुरिंजी देखने के लिए केरल का मुन्नार सबसे प्रसिद्ध जगह है। यहां के राजामाला, कोविलूर, कडावरी और एराविकुलम नेशनल पार्क में इसकी सबसे खूबसूरत झलक देखने को मिलती है। (Photo Source: Indian Express)
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सांस्कृतिक महत्व भी है खास
तमिलनाडु के पलियन जनजातीय समुदाय इस फूल के खिलने के चक्र का उपयोग अपनी उम्र गिनने और जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को चिह्नित करने के लिए करते रहे हैं। संगम साहित्य में भी कुरिंजी शब्द का उपयोग पर्वतीय क्षेत्रों और वहां की प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाने के लिए किया गया है। (Photo Source: Indian Express) -
पर्यावरण के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
नीलकुरिंजी केवल सुंदरता का प्रतीक नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी के लिए भी बेहद अहम है। इसके फूलों से निकलने वाला रस मधुमक्खियों के लिए अमृत का काम करता है, जिससे औषधीय गुणों वाला दुर्लभ शहद तैयार होता है। इसके अलावा, इसका स्वस्थ विकास पश्चिमी घाट के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की संतुलित स्थिति का संकेत माना जाता है। (Photo Source: Indian Express) -
खतरे में है इसका अस्तित्व
एक समय था जब अनामलाई हिल्स, कार्डमम हिल्स, पलानी हिल्स, नीलगिरी और कुद्रेमुख जैसी जगहें नीलकुरिंजी से ढकी रहती थीं, लेकिन अब बढ़ते शहरीकरण, चाय-बागानों और निर्माण कार्यों के कारण इसका प्राकृतिक आवास लगातार सिमट रहा है। (Photo Source: Indian Express) -
इसी संरक्षण के लिए केरल के इडुक्की जिले में कुरिंजीमाला सैंक्चुअरी बनाई गई है, जहां इस दुर्लभ फूल और उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की कोशिश की जा रही है। (Photo Source: Indian Express)
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प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया था जिक्र
साल 2018 में नीलकुरिंजी ने आखिरी बार पश्चिमी घाट की पहाड़ियों को नीले रंग में रंग दिया था। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस फूल का जिक्र किया था। अब एक बार फिर प्रकृति प्रेमियों को उम्मीद है कि दक्षिण भारत की पहाड़ियां जल्द ही इस अद्भुत नीले फूल की खूबसूरती से भर जाएंगी। (Photo Source: Indian Express)
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