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भारत अब वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नेतृत्व में भारत दुनिया भर में स्थित प्राचीन हिंदू मंदिरों के पुनरुद्धार (restoration) का अभियान शुरू कर रहा है। इस पहल की शुरुआत इंडोनेशिया के ऐतिहासिक प्रंबानन मंदिर से होगी, जो दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे महत्वपूर्ण धरोहर स्थलों में से एक है। (Photo Source: Pexels)
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इतिहास और महत्व
प्रंबानन मंदिर इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है, जो जावा द्वीप के योग्याकार्ता क्षेत्र के पास स्थित है। इसे 9वीं शताब्दी में संजय वंश द्वारा बनवाया गया था। स्थानीय भाषा में इसे ‘रोरो जोंग्रांग’ यानी ‘Slender Maiden’s Temple’ भी कहा जाता है। (Photo Source: Pexels) -
यह मंदिर हिंदू त्रिमूर्ति- ‘भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा’ को समर्पित है। सदियों तक यह परिसर उपेक्षित और मिट्टी में दबा रहा, जिसके बाद 19वीं सदी में इसकी फिर से खोज हुई और धीरे-धीरे इसका पुनरुद्धार शुरू हुआ। साल 1991 में इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) का दर्जा दिया गया। (Photo Source: Pexels)
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आर्किटेक्चर और विशेषताएं
प्रंबानन मंदिर अपनी भव्य और जटिल वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। यह परिसर लगभग 240 मंदिरों से मिलकर बना है, जिसमें Javanese और दक्षिण भारतीय (पल्लव स्टाइल) का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। इस मंदिर के मुख्य परिसर में 8 बड़े और 8 छोटे मंदिर हैं। (Photo Source: Pexels) -
इसमें सबसे प्रमुख शिव मंदिर है, जिसकी ऊंचाई करीब 47 मीटर है। वहीं, विष्णु और ब्रह्मा मंदिर इसके दोनों ओर स्थित हैं। मंदिरों की दीवारों पर रामायण और अन्य हिंदू ग्रंथों की कहानियां उकेरी गई हैं। यह पूरा परिसर संतुलित और सममित (symmetrical) डिजाइन का बेहतरीन उदाहरण है। (Photo Source: Pexels)
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भारत-इंडोनेशिया की साझा विरासत
भारत और इंडोनेशिया के बीच यह साझेदारी सिर्फ एक मंदिर के पुनरुद्धार तक सीमित नहीं है। इस परियोजना के तहत आसपास के महत्वपूर्ण मंदिरों जैसे सेवु मंदिर और प्लाओसान मंदिर को भी संरक्षित किया जाएगा, जो हिंदू और बौद्ध परंपराओं के संगम को दर्शाते हैं। यह पहल दोनों देशों के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करेगी और वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति के प्रभाव को भी उजागर करेगी। (Photo Source: Pexels) -
आधुनिक तकनीक से होगा संरक्षण
इस परियोजना में ‘एनास्टाइलोसिस’ (anastylosis) जैसी आधुनिक पुरातात्विक तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इस विधि में मंदिरों को उनके मूल पत्थरों से दोबारा जोड़ा जाता है, जिससे उनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता बनी रहती है। (Photo Source: Pexels) -
कल्चरल डिप्लोमेसी की दिशा में बड़ा कदम
भारत का यह कदम सिर्फ विरासत संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक कूटनीति (cultural diplomacy) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और दुनिया को भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के साझा इतिहास के बारे में और गहराई से जानने का अवसर मिलेगा। (Photo Source: Pexels)
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