-
मोबाइल गेम्स और वीडियो गेम्स के दौर से बहुत पहले भारत में ऐसे कई ट्रेडिशनल बोर्ड गेम्स खेले जाते थे, जो सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं थे बल्कि रणनीति, नैतिकता और बुद्धिमत्ता का भी पाठ पढ़ाते थे। घरों से लेकर राजमहलों तक इन खेलों की खास जगह थी। (Photo Source: Pexels)
-
दिलचस्प बात यह है कि आज दुनिया में लोकप्रिय कई आधुनिक खेलों की जड़ें भारत के इन्हीं प्राचीन खेलों में छिपी हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ भारतीय बोर्ड गेम्स के बारे में, जिन्होंने चेस, लूडो और स्नेक्स एंड लैडर्स जैसे खेलों को प्रेरित किया। (Photo Source: Pexels)
-
चतुरंग
चतुरंग को आधुनिक शतरंज का सबसे पुराना रूप माना जाता है। इसकी शुरुआत भारत में लगभग छठी शताब्दी के आसपास हुई थी। इस खेल में सेना के चार प्रमुख अंग – पैदल सैनिक, घुड़सवार, हाथी और रथ शामिल होते थे। यही कारण है कि इसे ‘चतुरंग’ कहा गया। समय के साथ यह खेल फारस पहुंचा, जहां इसे ‘शतरंज’ कहा जाने लगा और बाद में यह पूरी दुनिया में ‘चेस’ (Chess) के रूप में प्रसिद्ध हो गया। यह खेल रणनीति, धैर्य और दूरदृष्टि सिखाने के लिए जाना जाता था। (Photo Source: @ministryofculturegoi/Instagram) -
पल्लंगुझी
पल्लंगुझी दक्षिण भारत का एक बेहद लोकप्रिय पारंपरिक खेल है, जिसे लकड़ी के विशेष बोर्ड पर खेला जाता है। इस बोर्ड में 14 छोटे गड्ढे होते हैं, जिनमें बीज, सीपियां या कंचे रखे जाते हैं। खिलाड़ियों को गिनती, चालाकी और रणनीति के आधार पर खेल जीतना होता है। यह खेल बच्चों और महिलाओं के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय था। माना जाता है कि इससे गणितीय क्षमता और एकाग्रता बेहतर होती थी। (Photo Source: @ministryofculturegoi/Instagram) -
अष्टा चम्मा
अष्टा चम्मा आंध्र प्रदेश और कर्नाटक का पारंपरिक बोर्ड गेम है, जिसे आधुनिक ‘लूडो’ (Ludo) का प्रेरणास्रोत माना जाता है। इस खेल में पासों की जगह कौड़ियों का इस्तेमाल किया जाता था। खिलाड़ी क्रॉस आकार के बोर्ड पर अपनी गोटियों को आगे बढ़ाते हुए विरोधियों को हराने की कोशिश करते थे। यह खेल रणनीति और किस्मत दोनों का अनोखा मेल था और अक्सर चार खिलाड़ी मिलकर इसे खेलते थे। (Photo Source: Kreeda Games) -
सोलह सीढ़ी
सोलह सीढ़ी, जिसका अर्थ ’16 कदम’ होता है, उत्तर भारत का एक प्राचीन रेस-स्टाइल बोर्ड गेम माना जाता है। इस खेल में खिलाड़ी पासों या कौड़ियों की मदद से अपनी गोटियों को तय रास्ते पर आगे बढ़ाते हैं। जीत के लिए केवल किस्मत ही नहीं, बल्कि सही रणनीति और धैर्य की भी जरूरत होती है। इसे ’16 सैनिकों का खेल’ भी कहा जाता है। (Photo Source: @Kreeda_games/X) -
कट्टायम-विलायट्टू
कट्टायम-विलायट्टू केरल और तमिलनाडु क्षेत्रों में लोकप्रिय पारंपरिक खेलों में से एक था। यह खेल कौड़ियों और गोटियों के साथ खेला जाता था। रंग-बिरंगे बोर्ड और प्रतिस्पर्धात्मक शैली के कारण यह हर आयु वर्ग के लोगों के बीच पसंद किया जाता था। इसमें किस्मत के साथ-साथ चालों की समझ भी बेहद जरूरी होती थी। (Photo Source: Kreeda Games) -
मोक्षपटम
मोक्षपटम वह प्राचीन भारतीय खेल है जिसने आगे चलकर ‘स्नेक्स एंड लैडर्स’ (Snakes and Ladders) यानी सांप-सीढ़ी को जन्म दिया। यह खेल केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि इसका उद्देश्य नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा देना था। खेल में सीढ़ियां अच्छे गुणों और सद्गुणों का प्रतीक थीं, जबकि सांप बुराइयों और अवगुणों को दर्शाते थे। अंतिम लक्ष्य केवल जीतना नहीं, बल्कि ‘मोक्ष’ प्राप्त करना माना जाता था। (Photo Source: @ministryofculturegoi/Instagram) -
भारतीय खेलों की विरासत आज भी जिंदा
भारत के ये प्राचीन बोर्ड गेम्स केवल खेल नहीं थे, बल्कि संस्कृति, शिक्षा और जीवन मूल्यों का हिस्सा थे। आज भी कई परिवारों और गांवों में ये खेल पारंपरिक रूप से खेले जाते हैं। आधुनिक गेमिंग की दुनिया में भी इन खेलों की झलक साफ दिखाई देती है। यही कारण है कि भारतीय पारंपरिक खेलों की विरासत आज भी पूरी दुनिया को प्रेरित कर रही है। (Photo Source: Unsplash)
(यह भी पढ़ें: सिख रहे हैं जापानी या दूसरी भाषा, बस अपनाएं ये स्मार्ट मेमोरी ट्रिक्स, शब्द रहेंगे हमेशा याद)