-
खेलते-कूदते या अन्य काम करते वक्त कई हाथ, पैर या शरीर के अन्य हिस्सों पर चोट लग जाती है। कई बार घुटने छिल जाते हैं या फिर कहीं कट लग जाता है। इन चोटों को ठीक होने में कई बार कई हफ्ते का समय लग जाता है। इसके साथ ही कई बार घाव तो ठीक हो जाता है लेकिन निशान रह जाता है। लेकिन आपको कैसे लगेगा कि चोट लगने बाद कुछ ही मिनटों में आपका घाव भर जाता है और निशान भी नहीं रह जाता है। यह आपको असंभव लगे लेकिन एक जेलीफिश ऐसी है जो खुद-ब-खुद अपना घाव भर सकती है। आइए जानते हैं इसके बारे में: (Photo Source: Pexels)
-
डिस्कवर वाइल्डलाइफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 1991 में नासा ने दो हजार से अधिक बेबी जेलीफिश को स्पेस शटल कोलंबिया के साथ अंतरिक्ष में भेजा था। इसका उद्देश्य यह जानना था कि ग्रैविटी की कमी का उनके शरीर में संतुलन महसूस करने वाले अंगों के विकास पर क्या असर पड़ता है। (Photo Source: Pexels)
-
इसके कई साल बाद इसी पारदर्शी जेलीफिश क्लाइटिया हेमिस्फेरिका पर एक और अध्ययन हुआ, जिसमें पता चला कि यह छोटी चोटों को कुछ ही मिनटों में और बड़ी चोटों को एक घंटे से भी कम समय में बिना किसी निशान के भर सकती है। (Photo Source: Pexels)
-
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 1991 में नासा ने शून्य ग्रैविटी में मानव विकास को समझने के लिए बेबी जेलीफिश को अंतरिक्ष में भेजा था। वहीं, तथाकथित अमर जेलीफिश पर इस बात का अध्ययन किया जा रहा है कि उसकी कोशिकाएं दोबारा अपने शुरुआती जीवन चरण में कैसे लौट जाती हैं। (Photo Source: Pexels)
-
हेमचंद्राचार्य नॉर्थ गुजरात यूनिवर्सिटी (HNGU) के जूलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हेरिस पटेल कहते हैं कि यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसे अभी इंसानों के इलाज में होने वाली बड़ी सफलता मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह जीव विज्ञान को बेहतर तरीके से समझने की दिशा में एक अहम कदम है। (Photo Source: Pexels)
-
हेरिस पटेल का कहना है कि, क्लाइटिया हेमिस्फेरिका की सबसे खास बात यह है कि वह खुद को तेजी से ठीक कर लेती है और बिना कोई निशान छोड़े करती है। उनके मुताबिक, छोटी चोट कुछ ही मिनटों में भर जाती है, जबकि बड़ी चोट भी एक घंटे से कम समय में ठीक हो जाती हैं और उसके बाद कोई दाग या निशान नहीं बचता। (Photo Source: Pexels)
-
उपचार प्रक्रिया दो चरणों में होती है पूरी
जेलीफिश की उपचार प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है। पहले चरण में घाव के किनारे मौजूद कोशिकाएं अपनी उंगली जैसी छोटी-छोटी संरचनाएं बाहर निकालती हैं , जो धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए घाव वाली जगह को ढकने लगती हैं और बाकी कोशिकाओं को भी अपनी ओर खींच लाती हैं। इससे जीवित टिश्यू फैलकर घाव को ढक देते हैं। (Photo Source: Pexels) -
दूसरा चरण
इसके बाद दूसरा चरण शुरू होता है, जिसमें विशेष प्रकार के रेशे (फाइबर) एक डोरी की तरह सिकुड़ते हैं और घाव के किनारों को खींचकर पूरी तरह बंद कर देते हैं। यानी पहले कोशिकाएं घाव पर फैलकर उसे ढकती हैं और फिर विशेष रेशे उसे कसकर बंद कर देते हैं। इसी वजह से यह जेलीफिश इतनी तेजी से और बिना किसी निशान के ठीक हो जाती है। (Photo Source: Pexels) -
इंसानों के घाव जेलीफिश की तरह क्यों नहीं भरते
इंसानों और जेलीफिश के शरीर में चोट लगने पर प्रतिक्रिया अलग-अलग होती है, क्योंकि दोनों की जैविक (बायोलॉजिकल) प्राथमिकताएं अलग हैं। हेरिस पटेल के अनुसार, जब इंसानों को चोट लगती है तो शरीर की पहली कोशिश खून बहना रोकने और संक्रमण से बचाने की होती है। इसके लिए शरीर घाव वाली जगह पर सूजन पैदा करने वाली कोशिकाएं भेजता है और वहां मजबूत कोलेजन फाइबर की परत जमने लगती है। यही बाद में निशान बन जाता है। (Photo Source: Pexels)
Also Read: 7 सबसे जहरीले पक्षी, पंख और शरीर में होता है घातक जहर