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शर्ट का कॉलर आज भले ही एक सामान्य डिजाइन का हिस्सा लगे, लेकिन इसकी कहानी काफी दिलचस्प और ऐतिहासिक है। समय के साथ कॉलर ने सिर्फ फैशन ही नहीं, बल्कि उपयोगिता और सामाजिक पहचान में भी अहम भूमिका निभाई है। (Photo Source: Pexels)
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कॉलर की शुरुआत कैसे हुई?
कॉलर की शुरुआत 15वीं शताब्दी में मानी जाती है, जब इसे धार्मिक वर्ग (क्लर्जी) के लोग पहनते थे। उस समय कठोर और भारी कपड़ों से गर्दन को होने वाली जलन से बचाने के लिए कॉलर का इस्तेमाल किया जाता था। यानी शुरुआत में इसका मुख्य उद्देश्य पूरी तरह व्यावहारिक था। (Photo Source: Pexels) -
फैशन और स्टेटस का प्रतीक बना कॉलर
रिनेसां काल (पुनर्जागरण काल) तक आते-आते कॉलर का रूप बदलने लगा। यह केवल जरूरत नहीं, बल्कि स्टाइल और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया। उस दौर में अमीर और उच्च वर्ग के लोग बड़े-बड़े रफ कॉलर पहनते थे, जो उनकी सामाजिक स्थिति को दर्शाते थे। (Photo Source: Pexels) -
कपड़ों को देता है बेहतर संरचना
कॉलर शर्ट को एक साफ-सुथरा और व्यवस्थित लुक देता है। यह चेहरे को फ्रेम करता है और पूरे आउटफिट को अधिक आकर्षक बनाता है। खासतौर पर फॉर्मल कपड़ों में कॉलर का होना एक जरूरी तत्व माना जाता है। (Photo Source: Pexels) -
मौसम और बाहरी प्रभाव से सुरक्षा
पुराने समय में कॉलर गर्दन को ठंड से बचाने और खुरदरे कपड़ों के संपर्क से होने वाली परेशानी को कम करने का काम भी करता था। यह एक तरह से सुरक्षा कवच की तरह काम करता था। (Photo Source: Pexels) -
डिटैचेबल कॉलर का ट्रेंड
19वीं शताब्दी में डिटैचेबल (अलग होने वाले) कॉलर का चलन शुरू हुआ। इसका फायदा यह था कि पूरे शर्ट को धोने की बजाय केवल कॉलर को साफ किया जा सकता था, जिससे समय और मेहनत दोनों की बचत होती थी। (Photo Source: Pexels) -
आज के समय में कॉलर का महत्व
आज भी कॉलर को प्रोफेशनल और फॉर्मल लुक का प्रतीक माना जाता है। ऑफिस, मीटिंग या किसी औपचारिक कार्यक्रम में कॉलर वाली शर्ट पहनना एक सुसंस्कृत और व्यवस्थित छवि बनाता है, जबकि बिना कॉलर के कपड़े अधिक कैजुअल माने जाते हैं। (Photo Source: Pexels)
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