एक कहावत है, ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़े’। बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान पहले देश की समस्याओं से दो-चार हों, या अमेरिका से? यह सवाल सबको परेशान किए हुए है। अंतरिम सरकार और अमेरिका के बीच हुए आपसी व्यापार समझौते ने बांग्लादेश की आर्थिक संप्रभुता पर सवाल उठाए हैं, खासकर व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में।
मुहम्मद यूनुस की सलाह वाली अंतरिम सरकार को सिर्फ कुछ दिनों तक रहना था, उसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव सुचारु रूप से कराने तक थी। इसलिए यह सवाल उठा है कि मुख्य सलाहकार अमेरिका से समझौता कैसे कर सकते थे! तारिक रहमान के शपथ लेने के बाद यों भी मुहम्मद यूनुस का नई सरकार से कोई लेना-देना नहीं रह जाता है, फिर उन्होंने जल्दबाजी में अमेरिका से बाध्यकारी समझौता कैसे कर लिया?
आलोचक कई बाध्यकारी शर्तों वाले प्रावधानों की ओर इशारा करते हैं, जो यह बताते हैं कि अगर बांग्लादेश वाशिंगटन की शर्तों पर नहीं चला, तो भारी शुल्क फिर से आयद हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, समझौते में डिजिटल कारोबार सुविधा के प्रावधानों को देखा जा सकता है। अमेरिका से हुए समझौते में कहा गया है कि अगर बांग्लादेश किसी ऐसे देश के साथ नया डिजिटल व्यापार समझौता करता है, जो अमेरिका के जरूरी हितों को खतरे में डालता है, तो वाशिंगटन इस समझौते को खत्म कर सकता है और बांग्लादेशी निर्यात पर 37 फीसद शुल्क फिर से लगा सकता है।
यही शुल्क दर अमेरिका ने अप्रैल 2025 में प्रस्तावित की थी। नए समझौते में कहा गया है कि अगर बांग्लादेश के साथ बातचीत से अमेरिकी चिंताओं का समाधान नहीं होता है, तो अमेरिका इस समझौते से हट सकता है। इसके बाद अगर वह 37 फीसद शुल्क फिर से लागू कर दे, तो यह इतना ज्यादा है कि बांग्लादेश का अमेरिका को किया जाने वाला निर्यात तेजी से कम हो जाएगा।
यह एक महंगा सौदा है, क्योंकि यह दक्षिण एशियाई देश अपने निर्यात राजस्व का लगभग पांचवां हिस्सा अमेरिकी खरीदारों को बेचे जाने वाले कपड़ों और दूसरे सामान से कमाता है। एक तरह से डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते के जरिये बांग्लादेश को आर्थिक नकेल पहना दी है।
ऐसा लगता है कि नई सरकार के आने तक ट्रंप प्रशासन को सब्र नहीं था। और इसी वजह से यह आशंका जताई जा रही है कि अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस वाइट हाउस के दबाव में काम कर रहे थे। यूनुस चाहते तो इस समझौते को कुछ दिन टाल सकते थे। नौ फरवरी को अंतरिम सरकार और ट्रंप प्रशासन के बीच हुआ समझौता बांग्लादेश को ‘किसी ऐसे देश से कोई भी परमाणु संयंत्र, फ्यूल राड या संवर्धित यूरेनियम खरीदने से भी रोकता है, जो अमेरिका के जरूरी हितों को ‘खतरे में’ डालता है।’
बांग्लादेश ने अतीत में जो समझौते किए, उसे जारी रखने में कोई बाधा नहीं है, लेकिन नए समझौतों में उसे अमेरिकी हितों का ध्यान रखना होगा। उदाहरण के लिए रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। इसमें दो रिएक्टर हैं। यह परमाणु ऊर्जा संयंत्र ढाका से लगभग 160 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में पद्मा नदी के किनारे ईश्वरदी उपजिला के रूपपुर में बन रहा है। रूसी सहयोग से यह बांग्लादेश का पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र होगा। इसकी दो इकाइयों में से पहली इकाई मार्च 2026 में चालू होने की उम्मीद है।
समझौते से पता चलता है कि रूसी स्टेट कार्पोरेशन रोसाटाम के जरिए रूसी तकनीक और वित्तीय सहायता से बने रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए आपूर्ति जारी रहने में दिक्कत नहीं है, लेकिन भविष्य में किसी भी परमाणु परियोजना पर कड़ी जांच हो सकती है। इस मसले पर बांग्लादेश के कुछ विशेषज्ञों ने भी चिंता जताते हुए कहा कि यह समझौते का सबसे जरूरी और विवादित हिस्सा है, क्योंकि यह हमारी संप्रभुता पर सवाल उठाता है।
अब अगर अमेरिका बांग्लादेश के साथ रक्षा समझौते को आसान बनाने और बढ़ाने के लिए काम करेगा, तो इससे बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो सकता है। दरअसल, यह समझौता दुर्लभ भू-धातुओं की खोज, उसे निकालने, उसे तैयार करने, भेजे जाने, वितरित करने और निर्यात करने के लिए अमेरिकी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का रास्ता भी खोलता है।
यही नहीं, समझौता यह भी सुनिश्चित कर गया कि बांग्लादेश को साढ़े तीन अरब डालर के अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने होंगे। इसमें पांच वर्ष तक हर साल कम से कम सात लाख टन गेहूं, 1.25 बिलियन डालर मूल्य के 2.6 मिलियन टन सोया और सोया उत्पाद और कपास खरीदने होंगे। बांग्लादेश को शुरू में 14 बोइंग एयरक्राफ्ट और 15 साल में 15 बिलियन की तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) भी खरीदनी होगी।
इसके अलावा, अमेरिकी सैन्य साजो-सामान की ज्यादा खरीद करनी होगी और कुछ देशों से रक्षा उपकरण की खरीद पर सीमा भी लगानी होगी। इस संदर्भ में देखें तो विशेषज्ञों की यह आशंका समझी जा सकती है कि यह मुक्त व्यापार के बजाय थोपी हुई जिम्मेदारी ज्यादा है। यह असल में अमेरिकी कंपनियों और वहां के किसानों के लिए मुनाफे को पक्का करता है।
इस संदर्भ में ‘साउथ एशियन नेटवर्क आन इकोनामिक माडलिंग’ की ओर से उठाई गई चिंता भी गौरतलब है कि बांग्लादेश को सस्ते विकल्प मौजूद होने पर भी ज्यादा महंगा सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जा सकता है। इससे बांग्लादेश के विदेशी लेनदेन पर और दबाव पड़ेगा। सवाल है कि फिर बांग्लादेश एयरक्राफ्ट खरीदने और ऊर्जा आयात के लिए पूंजी कैसे लगाएगा?
स्वाभाविक तौर पर इससे विदेशी ऋण पर निर्भरता बढ़ने का खतरा है। ऐसी चिंताएं भी सामने आई हैं कि अमेरिका से समझौते के बाद बांग्लादेश को अब कच्चे माल के लिए चीन पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। कुल मिलाकर, ‘यूनुस गए, मगर समस्या छोड़ गए’ वाली स्थिति पैदा हो चुकी है। मुहम्मद यूनुस को ‘अमेरिका के करीबी’ के तौर पर देखा जाता रहा है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए बिल क्लिंटन परिवार से उनकी निकटता के कई उदाहरण दिए जाते हैं।
हालांकि यह भी एक सार्वजनिक तथ्य है कि यूनुस का अकादमिक करिअर अमेरिका में बना। बिल क्लिंटन ही नहीं, बाद के राष्ट्रपतियों, जो बाइडन से लेकर डोनाल्ड ट्रंप तक से उन्होंने बेहद करीबी संबंध बनाए रखा। इन अन्योन्याश्रय संबंधों का फायदा उनके परिवार को मिलने के भी आरोप लगाए जाते रहे हैं।
सच यह है कि मुहम्मद यूनुस ने अपने कार्यकाल में जो कुछ किया, उसकी सही से जांच हो, तो कई नकारात्मक सूचनाएं भी लोगों को निराश करेंगी। मगर जो सकारात्मक पक्ष है, वह यह है कि बांग्लादेश में समय पर शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव हो गया। यह दीगर बात है कि तेरह फरवरी को बांग्लादेश में चुनाव के नतीजे आने के ठीक बाद मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के विशेष सहायक फैज अहमद तैयब जर्मनी चले गए।
इस ‘अचानक प्रस्थान’ ने यूनुस के साथियों के ‘सुरक्षित निकलने’ की बातों को पुख्ता करना शुरू कर दिया है। अब आशंका यह भी जताई जा रही है कि क्या मुहम्मद यूनुस भी अमेरिका या यूरोप के किसी देश में जाने की तैयारी में हैं!
