तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
-अदम गोंडवी
वैश्विक संकट वाले अध्याय को छोड़ दें तो आर्थिक सर्वेक्षण (2025-2026) के अध्यायों के पन्ने गुलाबी ही हैं। कल एक फरवरी को बजट पेश होगा और सस्ता-महंगा पर खूब चर्चा होगी। हालांकि यह हकीकत पूरे देश को कबूल है कि जीएसटी दरों के कारण अब बजट में पेश सस्ता व महंगा कुछ भी मायने नहीं रखता है। दिवाली के समय इलेक्ट्रानिक उपकरणों पर जीएसटी की दरें घटाई गई थी तो अब तांबे की कीमत दोगुनी होने के कगार पर है। तांबे की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण घरेलू उपकरण महंगे होने वाले हैं। खैरियत तांबे या पीतल की कीमतों से ही सब्र कर लेने में है। सोने-चांदी की बात कहीं दिल के अकस्मात रुक जाने का बायस न बन जाए। आर्थिक सर्वेक्षण के गुलाबी आंकड़े और महंगाई के लाल होते निशान पर बेबाक बोल

यकुम फरवरी है नया बजट है
जनवरी में पूछूंगा क्या हाल है…
बताने लगा रात बूढ़ा फकीर
ये दुनिया हमेशा से कंगाल है

अमीर कजलबाश की नज्म के शेर अक्सर नए साल की एक जनवरी को याद किए जाते हैं। नया साल मुबारक कहने वालों, नए प्रण लेने वालों के बीच कजलबाश सच का सामना करवाते हुए आते हैं कि आज तो एक ही जनवरी है। साल के अंत दिसंबर में आप लोगों से हाल पूछे जाएंगे।
पिछले कुछ सालों से एक जनवरी को बहुत से लोग यह कहते मिल जाते हैं कि ग्रेग्रोरियन कैलेंडर वाले नए साल से हमारा क्या मतलब है? हमारा नया साल तो…। तीन बिंदुओं का अर्थ है कि भारत की क्षेत्रीय विविधता की बात करें तो हर क्षेत्र का पारंपरिक नया साल उस क्षेत्र की भौगोलिक व सांस्कृतिक खासियत के अनुसार होता है। यह तिथि अलग-अलग हो सकती है।

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वहीं अर्थ, बटुआ, जेब, बजट की बात करें तो पूरे हिंदुस्तान का नया साल एक फरवरी से शुरू होता है। इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं है, एक तरह की वर्गीय व गर्वीय समानता है। वर्गीय शब्द का अर्थ तो आर्थिक स्तरीकरण के तौर पर स्पष्ट है। गर्वीय समानता को यहां पर स्पष्ट करना जरूरी है। एक फरवरी को बजट देख कर पूरे हिंदुस्तानियों का बटुआ गर्व करने की कोशिश करता है कि इस बार बिस्कुट, टीवी, फ्रिज, मोटरसाइकिल या टूथपेस्ट सस्ता होगा और हमें इतनी बचत होगी। टीवी के परदे पर एक फरवरी को जीवंत प्रसारण के साथ व दो फरवरी को अखबारों की सुर्खियों में सस्ते की चमक देखते बनती है।

लेकिन बसंत का मौसम बीतने के बाद सस्ते की आस लगाया बटुआ पतझर वाले हालात का सामना करने लगता है। उपभोक्ता का पूर्व गर्वित मन सोशल मीडिया के प्रभावशालियों से हौसला लेते हुए खुद को प्रेरित करते हुए कितनी बार भी दुहरा ले कि बसंत आता नहीं लाया जाता है, लेकिन आम मध्य-वर्ग के बटुए की हकीकत पतझर सरीखी ही रहती है। बसंत तो कुछ देर तक सत्ता और उसके समर्थकों द्वारा लाया जाता है, स्थायी भाव तो पतझर का ही है।

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वैसे जीएसटी ने यकुम फरवरी के सस्ते-महंगे वाले स्तंभ का भी सुख छीन लिया है। दिवाली के समय कह दिया गया कि जीएसटी बचत उत्सव मनाएं। दैनिक उपभोग की कुछ चीजों से जीएसटी बहुत कम कर दी गई, ये बताए बिना कि इसकी दरें इतनी ऊंची की ही क्यों गई थी। इसका तर्क तो यह दिया जा सकता है कि किसी चीज को अति महंगा खरीदेंगे तभी तो उसके सस्ते होने पर बचत उत्सव जैसी चीज मना पाएंगे। तो, हुआ यूं कि जीएसटी बचत उत्सव का एलान होते ही सरकार के एक सांसद ने कहा कि चीजें पचास फीसद तक सस्ती हो गई हैं।

सत्ता समर्थकों ने जीएसटी उत्सव को दिवाली के बजाए होली जैसे उत्सव में बदल दिया, जहां धोखे से भांग खाने-खिलाने के बाद लोग कुछ भी बोलने लगते हैं। जीएसटी की दरों के कम होने पर ऐसा उत्सवी माहौल था कि लगा दुकानदार लोगों के घरों में सामान फेंक कर जा रहे हैं कि भाई इतना सस्ता हो गया है कि क्या ही बेचें और क्या ही मुनाफा कमाएं। वैसे ही, जैसे आलू और प्याज के किसानों को करना पड़ता है। खास मौसम और समय में उनका मुनाफा इतना कम हो जाता है कि बाजार तक पहुंचाने की लागत उठाने के बजाय वे उन्हें सड़कों पर फेंकना पसंद करते हैं।

लौटते हैं सस्ते होने के तात्कालिक महोत्सव पर। पिछली दिवाली के समय की ही तो बात है जब हर तरफ चीजें सस्ती होने का दावा किया गया। लेकिन हकीकत कुछ समय बाद पता चली। मान लीजिए कि आप खुश हो गए कि बने-बनाए कुर्ते पर इतनी फीसद जीएसटी कम हो गई। लेकिन थोड़े समय बाद पता चलता है कि जिस सूत या धागे से वह कुर्ता बनाया जाता है, उस पर जीएसटी बढ़ा दी गई। जब कच्चा माल ही महंगा हो जाएगा तो उससे बना उत्पाद तो दुकानों में पुराने भंडार रहने तक ही सस्ता रह पाएगा।

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अर्थव्यवस्था कोई इकहरी चीज नहीं होती है। हर एक उत्पाद कई परतों में होता है। पिछले साल के जीएसटी सुधारों के दावों के उलट नई हकीकत यह है कि कई अन्य धातुओं की तरह तांबे की कीमत ने भी आसमान को छुआ है। तांबा एक ऐसा धातु है जो ज्यादातर इलेक्ट्रानिक उपकरणों में इस्तेमाल होता है। इलेक्ट्रानिक वस्तुओं की कीमत का एक हिस्सा तांबे की कीमत पर भी निर्भर करता है। बीते कुछ समय में तांबे की कीमतों में चालीस फीसद तक का इजाफा हुआ है जो आगे और भी महंगा होगा।

सर्दी के मौसम को अलविदा कहजब लोग एसी, फ्रिज और पंखे की खरीदारी करने के लिए बाजार का रुख करेंगे, घरेलू उपकरणों पर 28 फीसद से कम होकर 18 फीसद का जीएसटी बचत उत्सव उनके लिए बीते जमाने की बात होगी। दिवाली के बाद होली का समय उनके लिए बचतोत्सव नहीं खर्चोत्सव में तब्दील हो जाएगा। खर्च के साथ उत्सव शब्द के साहचर्य को आर्थिक क्रूरता ही कहा जाएगा, लेकिन आम लोगों के बटुए और बजट के लिए यही क्रूरता अभी तक का सबसे बड़ा सच है।

कच्चा माल, डिब्बांदी और परिवहन की बढ़ी लागतों के कारण कई उत्पादों में जीएसटी खर्चोत्सव ही रहा है। पाम तेल और अन्य रसायनों की कीमत बढ़ने के कारण शैंपू जैसी चीज भी भारतीय उपभोक्ताओं के घरों में सस्ती नहीं पहुंच पाई थी। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों और बिस्कुट जैसी चीजों पर जीएसटी 18 फीसद से कम कर पांच फीसद पर आ गई थी। लेकिन कृषि आधारित कच्चे माल की कीमतों में तेजी व डिब्बाबंदी की लागत बढ़ने के कारण ये सस्ती नहीं हो सकीं। कापी-किताबों में भी कर में छूट मिली लेकिन कागज की लुगदी और कच्चे कागज के दाम बढ़ने से बटुआ हलकान ही रहा। यही हाल सीमेंट उद्योग का भी रहा।

यह एक आम भारतीय भी महसूस कर चुका है कि वैश्विक खींचतान का असर उसके घर के बजट पर किस तरह से पड़ रहा है। 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी वैश्विक खींचतान के संदर्भ में 2026 के संकटग्रस्त समय होने की आशंका जाहिर की गई है। दुनिया भर में व्यापार और सुरक्षा के नियम तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता आते ही बदल गए थे, 2026 के बाकी समय में इसके और बिगड़ने के आसार हैं।

दुनिया के सबसे शक्तिमान देश भी आर्थिक पाबंदियों के अलावा अर्थव्यवस्था के ‘अ’ में भी बदलाव नहीं कर पा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर हर तरह के वैश्विक तनाव का असर अंतिम स्तर तक के भारतीय की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है। सूचना तकनीक एकमात्र ऐसा क्षेत्र था, जिसमें भारत विश्व गुरु सरीखा बनने की राह पर चला था, अब उसकी नौकरियों का भविष्य भी कृत्रिम मेधा के भविष्य पर निर्भर है। वैश्विक तनाव की वजह से भी सूचना तकनीक की नौकरियों पर बुरा प्रभाव पड़ा है। 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में कृत्रिम मेधा से जुड़े मुश्किल हालात की भी तस्वीर पेश की गई है।

सर्वेक्षण में बताया गया है कि दुनिया भर की कई अर्थव्यवस्थाओं ने इसमें बेतहाशा पैसा लगाया है। जाहिर सी बात है कि निवेश किए गए पैसे का नतीजा 2026 में ही निकलेगा। बड़ी कंपनियों ने अरबों डालर के कर्ज लेकर डाटा केंद्रों पर निवेश किया है। भारत की भी नजरें इस क्षेत्र पर हैं। लेकिन यहां मुख्य सवाल डाटा बनाम आटा का रहेगा। चुनाव दर चुनाव सरकार अपने नागरिकों को मुफ्त आटा दे रही है और डाटा नौकरियों की मुश्किलें बढ़ा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण के सरकारी कागज तो गुलाबी रंग बिखेरते हैं, लेकिन हमें खतरे के निशान पर नजर रखनी होगी। गुलाबी गहरा होकर लाल बनता है।