इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां ‘शक्ति ही सत्य है’ की अवधारणा पुनर्जीवित हो गई है। दुनिया का सबसे धनी देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सबसे बड़ा वित्तपोषक होने के नाते अमेरिका ने स्वयं को एक ऐसे ‘वैश्विक दारोगा’ के रूप में स्थापित कर लिया है, जिसे रोकने का साहस वर्तमान में किसी भी अंतरराष्ट्रीय इकाई के पास नहीं दिखता।
संयुक्त राष्ट्र से लेकर विश्व बैंक तक, अधिकांश संस्थाएं अमेरिकी संसाधनों पर टिकी हैं। ऋण के जाल में फंसे देश हों या व्यापारिक समझौतों की बैसाखियों पर टिकी अर्थव्यवस्थाएं, कोई भी अमेरिका की नीतियों के विरुद्ध स्वर मुखर करने की स्थिति में नहीं है। इसी वर्चस्व की अगली कड़ी ईरान और अमेरिका-इजराइल के सैन्य संघर्ष के रूप में एक महीने से भी अधिक समय तक दिखती रही। मगर अब अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम पर समझौता हुआ है। इसके बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि स्थायी शांति की राहें निकलेंगी।
यह सहमति बीते कई दिनों से जारी भीषण संघर्ष के बाद एक अहम मोड़ मानी जा रही है। इसकी मुख्य शर्तों के अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर होने वाले सभी सैन्य हमलों को दो सप्ताह के लिए निलंबित करने की घोषणा की है। इसके साथ ही इजराइल ने भी ईरान के विरुद्ध अपने सैन्य अभियानों को रोकने पर सहमति जताई है। दूसरी ओर, ईरान होर्मुज जलमार्ग को खोलने के लिए सहमत हो गया है। जहाजों की आवाजाही ईरानी सैन्य प्रबंधन के तहत होगी। इस समझौते में पाकिस्तान ने मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। ईरान ने जो दस सूत्री प्रस्ताव दिया है, यह समझौता उसी पर आधारित है, जिसे अमेरिका ने चर्चा के लिए स्वीकार किया है। इसमें ईरान पर प्रतिबंधों को हटाने और उसे मुआवजा देने जैसी मांगें शामिल हैं। हालांकि इजराइल ने स्पष्ट किया है कि उसकी कार्रवाई लेबनान के विरुद्ध जारी रह सकती है। यह समझौता ट्रंप द्वारा दी गई उस समय सीमा के खत्म होने से कुछ ही घंटे पहले हुआ, जिसमें उन्होंने ईरान की सभ्यता को पूरी तरह नष्ट करने की धमकी दी थी।
डोनाल्ड ट्रंप के कड़े निर्णयों और दूसरों से अलग चलने की नीति ने बढ़ाई मुसीबत
भूमध्य सागर के समीप खाड़ी क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा का हृदय स्थल है। यहां सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देश न केवल ऊर्जा के अग्रणी उत्पादक हैं, बल्कि अमेरिका के रणनीतिक साझेदार भी हैं। अमेरिका ने अपनी कूटनीति से इन देशों को अपने हितों के अनुरूप साध लिया है, लेकिन ईरान इस समीकरण में हमेशा उसके लिए एक कांटा बना रहा। उसके परमाणु अनुसंधान में लिप्त होने और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना करने की आशंका अमेरिका के लिए सिरदर्द बनी हुई थी। समय के साथ अमेरिका का नेतृत्व बदला, तो डोनाल्ड ट्रंप के कड़े निर्णयों और दूसरों से अलग चलने की उनकी नीति ने इस सुलगती आग में घी का काम किया। फरवरी के अंतिम दिनों में इजराइल को ढाल बना कर अमेरिका ने जो मिसाइल हमला शुरू किया, उसने ईरान को सीधे युद्ध के मैदान में खींच लिया।
पिछले एक महीने से ज्यादा समय से पश्चिमी एशिया भीषण युद्ध का साक्षी है। अमेरिका ने ईरान के तेल और गैस संयंत्रों को निशाना बना कर उसकी आर्थिक रीढ़ तोड़ने की कोशिश की। इससे पूरी दुनिया को होने वाली तेल-गैस की आपूर्ति का ढांचा बुरी तरह ढह गया। ईरान ने भी बदला लेने की नीति अपनाई। प्रतिक्रिया स्वरूप उसने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर से होने वाली नियमित वैश्विक आपूर्ति शृंखला को भी बाधित कर दिया। अब कुछ समय के लिए युद्धविराम से तेल संकट दूर होने की उम्मीद की जा सकती है।
पिछले कई दिनों तक चले युद्ध में सबसे विचलित करने वाली खबर ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई और उनके परिवार से जुड़ी रही। अमेरिकी हमलों में खामेनेई, उनकी पत्नी और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के मारे जाने या गायब होने की खबरों ने ईरान में प्रतिशोध की ज्वाला को और भड़का दिया था। नए ईरानी नेतृत्व ने अपनी पूरी सैन्य शक्ति झोंकते हुए खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और ऊर्जा केंद्रों को भारी क्षति पहुंचाई। इजराइल और अमेरिका को भी इस युद्ध में ईरान से कम नुकसान नहीं हुआ।
अमेरिका की कार्रवाई के पीछे चार मुख्य उद्देश्य स्पष्ट थे। पहला, परमाणु शक्ति पर अंकुश। ईरान को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनने से रोकना। दूसरा, आतंकवाद का समूल नाश। अमेरिका की दृष्टि में ईरान समर्थित आतंकी गुट वैश्विक शांति के लिए खतरा हैं, जिन्हें वह जड़ से उखाड़ना चाहता है। तीसरा, सत्ता परिवर्तन। ईरानी जनता के एक वर्ग में खामेनेई शासन के प्रति असंतोष को भुना कर अमेरिका वहां एक ‘अनुकूल’ शासन व्यवस्था स्थापित करना चाहता है। चौथा, ऊर्जा संसाधनों पर आधिपत्य। अमेरिका का सबसे बड़ा उद्देश्य ईरान के विशाल तेल और गैस भंडारों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है, ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार की चाबी पूरी तरह उसके पास हो।
इस युद्ध का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि तीन देशों के इस अहंकार में पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था और ऊर्जा शृंखला पर गंभीर असर पड़ा। राहत की बात केवल इतनी रही कि अभी तक कोई चौथा देश प्रत्यक्ष रूप से युद्ध के मैदान में नहीं उतरा। न तो नाटो अमेरिका की ओर से खुल कर आया और न ही रूस या चीन ने ईरान के पक्ष में सीधे अपनी सेनाएं उतारीं। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी पर निर्भर हैं, वे तटस्थ रहे। भले ही रूस, चीन और उत्तर कोरिया प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में नहीं उतरे, किंतु उनकी भूमिका निष्क्रिय भी नहीं थी। वे अमेरिका और इजराइल को युद्ध रोकने की चेतावनी देते रहे।
दुनिया भर के देशों की मंशा को बारीकी से परखा जाए, तो एक कटु सत्य सामने आता है। अधिकांश देशों को इस बात से वास्तव में बहुत ज्यादा सरोकार नहीं दिखता कि अमेरिका को कितना नुकसान हुआ या ईरान में कितने लोग मारे गए। उनकी वास्तविक चिंता तेल और गैस की सुचारु आपूर्ति को लेकर है। दुनिया को डर है कि यदि ईरान ने प्रतिशोध में पूरे खाड़ी क्षेत्र के तेल कुओं को तबाह कर दिया, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का पहिया थम जाएगा। ईरान और खाड़ी क्षेत्र के ये संयंत्र केवल उन देशों की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के सबसे बड़े केंद्र हैं। यदि यह स्रोत सूख गया, तो विकसित से लेकर विकासशील राष्ट्रों तक, सभी का राष्ट्रीय शासन और अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं होता। ऊर्जा संयंत्रों के नष्ट होने से आने वाली कई पीढ़ियों की दुनिया अंधकार में डूब जाएगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत जैसे तटस्थ देश और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं आगे आएं और एक ऐसा व्यापक समाधान विकसित करें, जहां संप्रभुता का सम्मान हो और ऊर्जा संसाधनों का उपयोग युद्ध के हथियार के रूप में न किया जाए।
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ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध के नतीजे दिखने लगे हैं। ऊर्जा संकट गहराने के साथ पूरी दुनिया अब इसके व्यापक परिणामों से निपटने की तैयारी कर रही है। होर्मुज जलमार्ग से ईंधन आपूर्ति की जो शृंखला टूटी है, वह कब नियमित होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। मगर इससे कई देशों के सामने चौतरफा संकट जरूर पैदा हो गया है। वैश्विक स्तर पर ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ने लगी है। मुश्किल भरे इस दौर में विश्व बैंक, मुद्रा कोष और विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) ने सचेत किया है कि पश्चिम एशिया के वैश्विक ऊर्जा बाजारों में युद्ध ने जो व्यवधान पैदा किया है, उससे खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ेगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
