हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जो लोकतंत्र को मानव शासन का अंतिम विकास मान कर जोर-शोर से उसका उत्सव मनाता है। दुनिया भर में लिखित संविधानों की प्रतिष्ठा है। कई देशों में उसी के आधार पर नीतियों की दिशा तय होती है। संसदों को लोक सत्ता का केंद्र माना जाता है। मतदान की आवधिक प्रक्रिया को इस बात का सबूत समझा जाता है कि आधुनिक देश या राज्य अपने नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है।

यदि हम इस समकालीन राजनीतिक रंगमंच की सतह को थोड़ा टटोलें, तो एक परेशान करने वाली निरंतरता सामने आती है। ऐसा लगता है कि कुछ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का अंतर्निहित तर्क मध्यकालीन राजाओं की प्रवृत्तियों से जकड़ा हुआ है, जिनकी वैधता जनता की सहमति से नहीं, बल्कि विजय, क्षेत्रीय प्रभुत्व और असीम शक्ति के प्रदर्शन से सिद्ध होती थी। आज की महाशक्तियां, चाहे उनकी वैचारिकता कुछ भी हो, अक्सर बहुलतावादी समाजों के संरक्षक के रूप में कम और आधुनिक संस्थागत आवरण में छिपे साम्राज्यवादी शासकों की तरह अधिक व्यवहार करती हैं। मतदान की प्रक्रिया ने सत्ता के मुकुट को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उसे केवल छिपा दिया है।

यह समझने के लिए कि आधुनिक देश प्राचीन साम्राज्यों की तरह क्यों दिखते हैं, हमें देखना होगा कि वे युद्ध कैसे लड़ते हैं और शक्ति का प्रदर्शन कैसे करते हैं। अमेरिका की बात की जाए, तो वेनेजुएला के प्रति उसका आक्रामक रुख, क्यूबा पर दशकों लंबा प्रतिबंध और मध्य-पूर्व में उसकी सैन्य व खुफिया गतिविधियां केवल ठंडी रणनीतिक जरूरतें नहीं हैं। वे वैश्विक प्रभुत्व के भव्य प्रदर्शन हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को अमेरिका की जीवंतता दिखाने के लिए मंचित किया जाता है।

इसी तरह, रूस का यूक्रेन पर आक्रमण, जिसे क्रेमलिन ने अपने ऐतिहासिक ‘प्रभाव क्षेत्र’ की रक्षा बताया और ईरान की क्षेत्रीय चालें प्राचीन प्रतिशोध चक्र की याद दिलाती हैं। वैश्विक मंच पर ये संघर्ष अक्सर प्राथमिक विद्यालय के खेल मैदान की प्रतिशोधी लड़ाई जैसे लगते हैं—‘तुमने मेरे साथी को मारा, तो मैं तुम्हें मारूंगा।’ मगर इस हिंसा के क्या मायने हैं? यह प्रतिद्वंद्वियों को डराने की तरह भी है।

यह सब पुराने राजाओं की किताब से उठाया गया है। कई सुल्तान, चीनी सम्राट और यूरोपीय राजा केवल जमीन या संसाधनों के लिए युद्ध नहीं करते थे। वे युद्ध में उतरते थे, ताकि अपनी सामरिक और राजनीतिक ताकत साबित कर सकें। जो राजा अपनी सीमाओं का विस्तार करने या दुश्मनों को दंडित करने में विफल रहता, वह कमजोर दिखता और यह कमजोरी विद्रोह को आमंत्रित करती।

आज के निर्वाचित या केंद्रीकृत नेता, चाहे वे कितने ही आधुनिक दिखें, उसी संरचनात्मक दबाव में हैं। वैधता पाने के लिए उन्हें बाहरी आक्रामकता और भू-राजनीतिक प्रदर्शन करना पड़ता है। यह प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र, तानाशाही और मिश्रित शासन सभी में समान रूप से काम करती है।

यदि लोकतंत्र को केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया और मतगणना की आवधिक रस्म के रूप में परिभाषित किया जाए, तो दुनिया की कई महाशक्तियां आसानी से परीक्षा पास कर लेती हैं। मगर लोकतंत्र की असली आत्मा मतदान की यांत्रिकी में नहीं है। वह सह-अस्तित्व, गहरी बहुलता और विविध समुदायों की गरिमा में है। जब शासक चुनावी जनादेश, नौकरशाही तंत्र या निगमित संपत्ति का उपयोग करके सत्ता केंद्रीकृत करते हैं, असहमति को कुचलते हैं या वैश्विक साम्राज्यों के अधीन हो जाते हैं, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है। जो बचता है, वह केवल प्रदर्शन है, यानी आधुनिक शब्दावली में छिपा हुआ राजतंत्र।

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आज की घटनाएं इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करती हैं। पश्चिम एशिया में इजराइल और लेबनान के बीच हालिया संघर्ष ने दिखाया कि कैसे चुनावी वैधता और साम्राज्यवादी ताकत एक-दूसरे में घुलमिल जाती हैं। इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में भारी सैन्य कार्रवाई की, जिसके बाद एक अस्थायी युद्धविराम की घोषणा हुई। मगर हिज्बुल्लाह ने इसे अस्वीकार कर दिया और पूर्ण वापसी की मांग की। इजराइल के रक्षा मंत्री ने साफ कहा कि अभियान जारी रहेगा।

इस बीच अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाया, जबकि तेहरान ने खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों पर हमले को ‘आत्मरक्षा’ बताया। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मार्च 2026 से अब तक 3,500 से अधिक लोग मारे गए और 10,700 लोग घायल हुए हैं, जबकि 12 लाख से अधिक नागरिक विस्थापित हो चुके हैं। यह मानवीय संकट किसी भी लोकतांत्रिक आदर्श से परे जाकर साम्राज्यवादी शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बन गया है।

वाशिंगटन में भी राजनीतिक तनाव बढ़ा है। अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध शक्तियों को सीमित करने के लिए मतदान किया, जिसमें कुछ रिपब्लिकन भी डेमोक्रेट्स के साथ खड़े हुए। राष्ट्रपति ने उन्हें दिखावटी कह कर निंदा की। इस बीच तेल की कीमतें 98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जिससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी। यह वही साम्राज्यवादी दबाव है, जो कभी मध्यकालीन राजाओं की विजय यात्राओं से जुड़ा था।

रूस-यूक्रेन युद्ध भी इसी तर्क को उजागर करता है। मई 2026 में यूक्रेन ने उस क्षेत्र को मुक्त कराया, जिस पर रूस ने कब्जा कर लिया था। यह 2023 के बाद पहली बार हुआ है। रूस की आक्रामकता थोड़ी थम गई है, जबकि यूक्रेन ने रूसी क्षेत्र में गहरे हमले शुरू कर दिए हैं। दो जून को रूस ने एक बड़ा हवाई हमला किया, जिसमें 22 नागरिक मारे गए और करीब 130 घायल हुए। यूक्रेन ने जवाबी कार्रवाई में सेंट पीटर्सबर्ग के पास क्रोनस्टाट नौसैनिक अड्डे पर रूसी युद्धपोत में आग लगा दी और तेल ठिकानों पर हमला किया।

वहीं, जापोरिज्जिया के बिजली संयंत्र पर हमलों ने परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। फरवरी 2026 में ‘न्यू स्टार्ट संधि’ की समाप्ति के बाद अब अमेरिका और रूस के परमाणु शस्त्रागार पर कोई सीमा नहीं बची है। यह स्थिति दिखाती है कि आधुनिक साम्राज्यवादी युद्ध केवल सीमाओं की लड़ाई नहीं, बल्कि वैश्विक अस्तित्व का खेल बन चुके हैं।

इन घटनाओं को देखें, तो वाशिंगटन और मास्को दोनों ही लोकतांत्रिक या अधिनायकवादी मुखौटे के पीछे वही पुराना मुकुट पहने हुए हैं। अमेरिका अपने अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों से वैश्विक प्रभुत्व दिखाता है, जबकि रूस चुनावी आवरण में तानाशाही को वैध ठहराता है। चीन जनलोकतंत्र की भाषा में अपने साम्राज्यवादी केंद्रीकरण को छिपाता है। भारत में भी हाल की प्रवृत्तियां अत्यधिक केंद्रीकरण और बहुसंख्यकवाद की ओर इशारा करती हैं। यूरोप अपने औपनिवेशिक प्रभाव के क्षेत्रों पर वित्तीय और तकनीकी दबाव बनाए रखता है। खाड़ी की राजशाहियां आधुनिक निगमित शासन का मुखौटा पहन कर वंशानुगत सत्ता चलाती हैं।

प्राचीन और आधुनिक दुनिया के बीच समानता साफ है। मध्यकालीन राजा ईश्वरीय अधिकार का दावा करता था। आधुनिक नेता बहुमत या तकनीकी जनादेश का। दोनों का उद्देश्य एक ही है—असीमित सत्ता और आलोचकों का मौन। सच्चा लोकतंत्र केवल मतगणना नहीं हो सकता, बल्कि वह सह-अस्तित्व, समान अधिकार और संप्रभुता के सम्मान की जीवंत प्रतिबद्धता है।

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अपने समाज या राष्ट्र को हम कितना जानते हैं? पिछले डेढ़ सौ वर्षों से भारत के अभिप्राय पर चर्चा, विवाद और टकराव चल रहा है। इसमें रवींद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की परिभाषाएं हैं, तो दूसरी ओर संसद में इस पर होने वाली बहस भी शामिल है। पर यह अपूर्ण है। इसका कारण दूसरे प्रश्न में छिपा है। ‘हम भारत को कितना जानने का प्रयास करते हैं?’ पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक