आमतौर पर व्यावहारिक रूप से देखें तो काम करे बिना, कुछ कमाए बिना दुनिया में बने रहना बेहद मुश्किल है। बहुत से लोगों के लिए तो आजीविका चलाने भर के लिए हर वक्त काम करना जरूरी होता है। मगर काम के प्रति लत की हद तक आसक्ति महत्त्वाकांक्षाओं से शुरू होती है। शुरुआत में लगता है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं हो सकता, इसलिए इसे असामान्य व्यवहार की तरह नहीं देखा जाता।
हर बड़ी सफलता बहुत कठिन मेहनत मांगती है, इसलिए मेहनती होना हमेशा से सामाजिक रूप से भी प्रशंसनीय स्थिति रही है, उसके पीछे के मनोविज्ञान में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली जाती। मगर यह स्थिति एक मनोवैज्ञानिक समस्या की तरफ ध्यान दिलाती है। अपने कार्य के प्रति गंभीरता जरूरी है, लेकिन वही जीवन नहीं हो सकता। आज जब तकनीक ने जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश करते हुए निजता की गरिमा को लगातार चोट पहुंचाई है, तो ऐसे में सीमा रेखा तय हो जाना जरूरी हो जाता है।
दरअसल, पिछले दिनों दिल्ली मेट्रो के फर्श पर अपने दफ्तर की मीटिंग में शामिल होते हुए एक व्यक्ति का वीडियो सुर्खियों में आया और उसके बाद सोशल मीडिया पर काम के प्रति समर्पण बनाम निजता के मुद्दे पर चर्चा होने लगी। आमतौर पर काम की लत को ‘वर्कहोलिज्म’ कहा जाता है, लेकिन यह सिर्फ उत्साह तक सीमित नहीं होकर एक ऐसी मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है, जिसमें मनुष्य अपने अस्तित्व मात्र को काम करने या उत्पादकता से जोड़कर देखने लगता है।
आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी समस्या अक्सर प्रतिभाशाली और ज्यादा संवेदनशील लोगों के साथ होती है। किसी भी अन्य लत की तरह काम की लत भी व्यवहार में असंतुलन को बताती है। कई लोग खाली बिल्कुल भी नहीं रह पाते, इसलिए कुछ न कुछ करते रहते हैं।
चूंकि आजकल लोग समय बिताने के लिए मोबाइल या स्मार्टफोन के साथ इंटरनेट का प्रयोग करते हैं, इसलिए काम की लत वाले लोगों का मुद्दा कहीं पीछे रह जाता है। मगर जिन लोगों को काम करने के अलावा जीने का कोई तरीका नहीं आता, उन लोगों के साथ ऐसी स्थिति बनती है कि वे हमेशा किसी न किसी कार्य में लगे रहना चाहते हैं। वे काम करते रहना चाहते हैं, ताकि उन्हें कुछ भी सोचना न पड़े।
यह एक तरह का नशा है जिसमें डूबकर व्यक्ति खुद और दुनिया को भुलाने का जतन करता है। ऐसी स्थिति एकाकी और सामाजिक व्यवहार का सामना करने में परेशानी महसूस करने वाले लोगों में भावनात्मक तनाव से बचने की बाध्यता से शुरू होती है। मगर धीरे-धीरे यह स्थिति व्यक्ति को अलग-थलग और अंतर्मुखी बना देती है। काम करना उनके लिए जीवन जीने की शर्त हो जाता है। जब व्यक्ति कुछ नहीं कर रहा होता है, तो वह स्वयं को धिक्कारता रहता है।
ऐसे लोग लगातार मेहनत करते हुए भी खुद से कभी संतुष्ट नहीं होते। वे हर वक्त समय बर्बाद करने और कुछ न कर पाने के अपराध बोध से घिरे रहते हैं। उनके पास परिणाम होते हैं, वे बहुत मेहनती होते हैं और दुनियावी नजर में बेहद सफल भी। इसके बावजूद उन्हें यह सब कभी भी संतोषजनक नहीं लगता। आगे बढ़ते रहने और कुछ नया करते रहने के लिए यह जरूरी है कि व्यक्ति में संतुष्टि न आए, लेकिन हर वक्त का अपराधबोध बेहद प्रतिकूल स्थिति बनाता है। यह स्वयं से ही दुश्मनी निभाने जैसी स्थिति है।
सच यह है कि जीवन में कार्य करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी आराम करना भी है। प्रकृति ने दिन और रात को बराबर बांटकर मनुष्य के लिए संतुलन को स्वाभाविक स्थिति की तरह बना दिया है। यह जरूरी है कि मनुष्य जो काम किसी लक्ष्य को लेकर कर रहा है, उस लक्ष्य को हासिल करने के बाद वह उस आनंद को महसूस करने लायक भी बचा रहे, जो कुछ हासिल करने से मनुष्य के भीतर पैदा होता है।
आखिर जीवन का लक्ष्य काम करना मात्र नहीं है, कार्य को करना एक प्रक्रिया है, लेकिन साधन को साध्य मानने से हम कहीं न कहीं मशीनी हो जाते हैं। मशीन और मनुष्य में बहुत फर्क है और यह फर्क बने रहना चाहिए। मनुष्य की संवेदना ही उसे दुनिया के सबसे बेहतरीन प्राणियों में से एक बनाती है। उस संवेदना से बचने के लिए स्वयं को कहीं भी झोंके रखना कैसे उचित हो सकता है?
कार्य जीवन नहीं है। जीवन का केंद्र नहीं है। वह अन्य अनेक गतिविधियों में से एक गतिविधि है। हालांकि वह केंद्रीय गतिविधि है, जिस पर अन्य तमाम गतिविधियां निर्भर होती है, वही उन्हें संतुलित करती है। मगर खुद उसका महत्त्व अन्य के साथ मिलकर ही बनता है, अकेले नहीं। मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि उसके जीवन में कोई भी एक चीज केंद्रीय भूमिका में नहीं रह सकती। कार्य के प्रति जूनून एक अच्छी चीज है, लेकिन अन्य गतिविधियों की कीमत पर नहीं।
काम की लत से परेशान व्यक्ति काम न करने पर बहुत तनाव और अपराधबोध महसूस करता है। ऐसे लोग न रिश्तों को और न ही खुद को वक्त देना जरूरी समझते हैं। संबंध जीवन की धुरी हैं और हर तरह के संबंध में संतुलन आवश्यक है।
अपने काम के साथ व्यक्ति के संबंधों में भी संतुलन होना चाहिए। करिअर के प्रति अटूट प्रतिबद्धता आज के प्रतिस्पर्धा भरे समय में एक सराहनीय गुण है। इसके अनेक फायदे हैं- यह सफलता, आर्थिक सुरक्षा और प्रेरणा देता है, लेकिन अपना शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य भी अहम है, उसे ताक पर रखकर लंबे समय तक नहीं चला जा सकता है।
