हम जो भी शब्द बोलते हैं, वह मूल्यवान तभी है जब उनके अनुसार ही हमारा व्यवहार हो, हमारे आचरण में वह उतरे। अपनी जुबान से कुछ और बोला जाए और व्यवहार में कुछ और दिखे या यों कहा जाए कि अपनी कथनी और करनी में अंतर हो, तो फिर उन शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। वह मात्र एक दिखावे से अधिक कुछ नहीं होता है। दिखावे से किसी को कुछ समय के लिए ही बेवकूफ बनाया जा सकता है।
कभी न कभी सामने वाले व्यक्ति को सब कुछ पता चल जाता है। इसके बाद वह ‘कथनी कुछ और करनी कुछ और’ वाले व्यक्ति का असली चेहरा देख लेता है। जाहिर है, उसके बाद दोहरे मानक वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। कई बार वह नजरों से गिर जाता है। झूठा आत्म-प्रदर्शन कभी भी किसी व्यक्ति को स्थायी सम्मान नहीं दिला सकता है। चाहे यह हम घरेलू जीवन में करें या सामाजिक जीवन में।
सच यह है कि शब्द व्यक्ति का परिचय देते हैं, लेकिन व्यवहार असल पहचान होती है। मान लिया जाए कि कोई शिक्षक दिन भर नैतिकता से भरी अच्छी-अच्छी बातें करता है। आचरण पर लंबे-लंबे भाषण देता है। सत्य, अहिंसा पर ज्ञान देता है, लेकिन अगर वह खुद व्यवहार में इन बातों पर अमल नहीं करता है, तो कोई भी उसका सम्मान नहीं कर पाता है- न विद्यार्थी, न समाज, न परिवार वाले।
सम्मान पाने के लिए या विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए हमारे शब्द और आचरण का एक समान रहना बहुत जरूरी है और यही सही भी है। इसलिए हम सभी को अंतरात्मा में झांक कर अपना अवलोकन करते रहना चाहिए कि हम जो बोल रहे हैं, वह हमारे आचरण से मेल खा रहा है या नहीं, इसका आत्मचिंतन जरूर करना चाहिए और अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है, तो उसमें सुधार के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।
शब्द हमारे विचारों की अभिव्यक्ति होते हैं और जो हम लोगों से अपने आचरण के जरिए करते हैं, हमारा व्यवहार उसका क्रियात्मक रूप होता है। सबसे अच्छा है कि जैसे हम वास्तव में हैं, वैसे ही दुनिया के सामने भी रहें। हो सकता है हमारे आचरण से कुछ लोग हमें पसंद करें और कुछ लोग नापसंद करें, लेकिन जो भी रहेगा, वह सत्य रूप में सामने रहेगा। कभी किसी के सामने शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा।
मनुष्य में विसंगति साधारण बात है, लेकिन सबसे गलत यह है कि हम उस बात को स्वीकार ही न करें और दुनिया को अपने बारे में झूठ परोसें। इससे बचना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। कुछ लोग अपने प्रचार और छद्म प्रदर्शन पर ही पूरा जोर देते हैं और लोगों के सामने अपनी ऐसी छवि प्रस्तुत करते हैं कि लोग भ्रम में पड़ जाएं।
ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर लोगों के शब्द और व्यवहार में अंतर क्यों होता है। इसका एक ही सबसे बड़ा कारण लगता है इंसान का स्वार्थी होना। जब हम स्वार्थी हो जाते हैं, तो हमारे शब्द और कर्म आमतौर पर कभी भी मेल नहीं खाते हैं। आदर्श बातें कहना या आदर्श बातों पर ज्ञान देना बहुत आसान है। उसके लिए कुछ नहीं करना होता है। बस जुबानी जमा-खर्च करना होता है, लेकिन अच्छा आचरण करने के लिए स्वार्थ का त्याग करना पड़ता है। अपने को संतोषी बनाना पड़ता है। खुद को अनुशासित रखना पड़ता है। अपने अंदर ईमानदारी रखनी पड़ती है। एक स्वार्थी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह अपने स्वार्थ का मोह छोड़ पाए।
अगर हमारे विचार और व्यवहार में साम्य नहीं होता है, तो इसका सबसे बुरा प्रभाव यह पड़ता है कि लोगों का हमारे ऊपर से विश्वास खत्म हो जाता है। हमारे अच्छे कर्म पर भी कोई भरोसा नहीं दिखा पाता है। दरअसल, किसी का भरोसा कमाना बहुत आसान है, लेकिन एक बार भरोसा टूट जाए तो उसको पूर्ण रूप से वापस पाना कई बार असंभव हो जाता है।
कहीं न कहीं व्यक्ति के मन में वह बात याद रहती है। इसीलिए भरोसा दोबारा स्थापित करना बेहद मुश्किल होता है। उसके लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है। सच यह है कि जो रिश्ते हमने भरोसे के बल पर कमाए होते हैं, वह हमारे शब्द और व्यवहार में अंतर की वजह से दूर हो जाते हैं।
सामान्य व्यक्ति के व्यवहार और विचार में अंतर है, तो उसका प्रभाव सिर्फ घर-परिवार या अपनी जान-पहचान वालों के बीच होता है, लेकिन वहीं पर कोई सार्वजनिक हस्ती या नेता हो और उसके शब्द और व्यवहार में अंतर रहता है, तो इसके समाज में व्यापक प्रभाव पड़ते हैं। अव्वल तो उसके नेतृत्व की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। दूसरा, समाज में पाखंड और अवसरवाद को बढ़ावा मिलता है। समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है। सोचकर देखा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति का दोहरा चरित्र समाज में कितना कुप्रभाव डालता है।
इस तरह की समस्याओं का समाधान किसी भी कानून या धारा के जरिए नहीं निकाला जा सकता, जिसकी बाहरी रूप के बदले किसी को सजा मिल पाए। इसकी अपनी अंतरात्मा की अदालत में ही सुनवाई होती है और फैसला आता है। भले ही दुनिया हमारा सच नहीं जाने, लेकिन हर व्यक्ति अपना सच स्वयं जानता है और दुनिया की हर अदालत से बड़ी अपनी अंतरात्मा की अदालत होती है। इसीलिए हर व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए कि वह जो शब्द बोल रहा है और जो व्यवहार कर रहा है, क्या वह समान है? अच्छे शब्दों से हम किसी से परिचय तो बना सकते हैं, लेकिन अपने अच्छे व्यवहार से हम व्यक्ति के दिल में जगह बना सकते हैं।
