एक स्त्री सुबह उठती है। चूल्हा जलाती है, बच्चों को स्कूल भेजती है, खेत में काम करने निकलती है या दफ्तर के लिए बस पकड़ती है। रात को लौटती है, थकी हुई, चुप। और फिर सो जाती है, अगली सुबह के लिए। उसके सपनों में एक सवाल बार-बार दस्तक देता है, क्या मेरा जीवन सिर्फ इतना ही है? क्या मुझे वह नहीं मिलेगा, जिसका मुझे हक है? यह सवाल भारत की करोड़ों महिलाओं की साझा पुकार है।

इसी पुकार की गूंज में हर साल दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाती है, लेकिन जब उत्सव का शोर थम जाता है, तब भी स्त्री उसी देहरी पर खड़ी मिलती है, अधिकारों का बोझ सीने पर लिए, न्याय की प्रतीक्षा में। सवाल उठता है कि क्या वाकई कुछ बदल रहा है, या बस एक रस्म अदायगी बन गई है, जिसमें नेता भाषण देते हैं, कंपनियां रंग-बिरंगे विज्ञापन देती हैं और शाम होते-होते सब कुछ पहले जैसा हो जाता है?

इस वर्ष के महिला दिवस पर संयुक्त राष्ट्र का ध्येय-वाक्य है- ‘अधिकार, न्याय और कार्रवाई, सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए।’ ये केवल तीन शब्द नहीं, एक आईना हैं, जो हमें असलियत दिखाते हैं।

भारत का संविधान दुनिया के सबसे प्रगतिशील दस्तावेजों में गिना जाता है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है और अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का हक देता है।

हकीकत क्या है? जब एक पीड़िता थाने की सीढ़ियां चढ़ती है, या एक दहेज-पीड़िता न्याय पाने के लिए गवाह ढूंढ़ती है, एक कामकाजी स्त्री दफ्तर में उत्पीड़न की शिकायत करती है, तो उसे इन अनुच्छेदों की नहीं, जमीनी हकीकत की दीवार से टकराना पड़ता है। यही दीवार सबसे ऊंची है।

इस दीवार की ऊंचाई राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े मापते हैं। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में दोषसिद्धि की दर 30 फीसद से भी कम है। बलात्कार के मामलों में तो यह और भी कम है। थाने में प्राथमिकी दर्ज होने से लेकर अदालत में फैसला आने तक का सफर इतना लंबा, थकाने वाला और कई बार अपमानजनक होता है कि अधिकांश पीड़ित महिलाएं बीच रास्ते में ही हार मान लेती हैं।

गौरतलब है कि देश के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में महिला न्यायाधीशों की संख्या मात्र 14 से 17 फीसद के बीच है। जब न्याय देने की कुर्सी पर ही उनकी आवाज नहीं होगी, तो न्याय की परिभाषा किस नजरिए से गढ़ी जाएगी?

वहीं, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 30 फीसद से अधिक विवाहित महिलाओं ने शारीरिक या यौन हिंसा झेली है। इनमें से बहुत कम पुलिस या किसी सरकारी संस्था के पास जाती हैं। कई जंजीरें हैं, जो लोहे की नहीं, समाज की बनाई हुर्इं, जिन्हें तोड़ना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। सदियों से बनाई सोच को तोड़ने के लिए एक अलग किस्म का साहस चाहिए।

यह हिंसा बच्ची के जन्म के बाद शुरू हो जाती है। भारत के कई हिस्सों में आज भी बेटियों की शादी 18 वर्ष से पहले करा दी जाती है। कल तक जो लड़की स्कूल की किताबें पढ़ती थी, अगली सुबह ‘घर-गृहस्थी’ की जिम्मेदारी उठाने लगती है। उसका बचपन एक रात में खत्म हो जाता है, बिना उसकी मर्जी और उसके सपनों की परवाह किए।

इसके अलावा, दहेज का दानव खड़ा रहता है। कानूनन अपराध होते हुए भी दहेज सामाजिक परंपरा के नाम पर अब भी जारी है। हर साल कितनी ही महिलाएं इस आग में जलती हैं, कुछ शाब्दिक रूप से, कुछ भीतर से, चुपचाप।

जब समाज ने घर और बाजार में स्त्री को असुरक्षित किया, तो यह उम्मीद थी कि शायद डिजिटल दुनिया एक खुला आसमान होगी। मगर वहां भी वही पुरानी मानसिकता नए औजारों के साथ पहुंच गई।

आनलाइन उत्पीड़न, अश्लील तस्वीरें प्रचारित कर देने की धमकी, सोशल मीडिया के मंचों पर लगातार पीछा, ये सब महिलाओं को डिजिटल संसार से दूर धकेलने का काम कर रहे हैं। इस संकट को कृत्रिम मेधा ने और विकराल बना दिया है।

छद्म तकनीक से बनाए जा रहे नकली वीडियो और तस्वीरें महिलाओं की जिंदगी बर्बाद करने का सबसे ताजा और भयावह हथियार हैं। पीड़िता न चाहते हुए भी एक ऐसी लड़ाई लड़ने पर मजबूर हो जाती है, जिसे उसने शुरू ही नहीं की थी। जिस रफ्तार से तकनीक बदल रही है, उस रफ्तार से हमारी कानूनी व्यवस्था नहीं बदल रही और इस अंतर की कीमत महिलाएं चुकाती हैं।

दरअसल, जो महिला आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर है, वह हिंसा, अन्याय और शोषण के सामने मजबूर हो जाती है। वह जानती है कि अगर घर छोड़ा, तो जाएगी कहां, बच्चों को पालेगी कैसे। यही मजबूरी उसे उस घर में रोके रखती है, जो कई बार उसके लिए कैद साबित होता है।

भारत की महिला श्रम भागीदारी दर दुनिया के सबसे निचले पायदानों में से एक है। असुरक्षित परिवहन, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, बच्चों की देखभाल के लिए सुविधाओं का अभाव- सब मिलकर उसे बाहर निकलने से रोकते हैं।

कानून तो काफी हैं, लेकिन कमी उनके ईमानदार क्रियान्वयन की है। हर थाने में महिला सहायता कक्ष हो, जो वास्तव में काम करे। द्रुत न्यायालयों की संख्या बढ़े और महिलाओं के मामले तय समयसीमा में निपटें।

जब व्यवस्था की नींव मजबूत होगी, तभी उस पर न्याय का महल खड़ा हो सकेगा। जब सोच बदलेगी, तभी व्यवस्था सुधरेगी। सोच बदलती है शिक्षा से।

स्कूल के पाठ्यक्रम में लड़के-लड़कियों के लिए लैंगिक समानता और स्त्री सम्मान की शिक्षा अनिवार्य हो। बचपन से बेटों को यह सिखाया जाए कि स्त्री का सम्मान उनकी जिम्मेदारी है, कोई एहसान नहीं।

अज्ञानता उत्पीड़कों की सबसे बड़ी ताकत है और जागरूकता उनकी सबसे बड़ी कमजोरी। शिक्षा से जागरूकता आएगी और जागरूकता से भागीदारी।

इन सबसे ऊपर जो बात है, वह है घर की दहलीज से शुरू होने वाली मानसिकता। कानून ढांचा देते हैं, राजनीति रास्ता खोलती है, लेकिन असली बदलाव तब आता है, जब सोच बदलती है।

जब ‘बेटी बचाओ’ का नारा केवल दीवारों पर नहीं, दिलों में उतरेगा… जब किसी लड़की का आगे पढ़ना, नौकरी करना, अपनी पसंद से जीवन चुनना, इन सब पर समाज की नहीं, उसकी अपनी मर्जी चलेगी, जब एक बच्ची के पैदा होते ही घर में वही रोशनी होगी जो बेटे के जन्म पर होती है, तब समझना चाहिए कि हम सभ्य होने की राह पर चल पड़े हैं।

‘विकसित भारत’ का सपना तब तक अधूरा है, जब तक आधी आबादी न्याय और सम्मान के लिए संघर्ष करती रहेगी। कोई भी देश तब तक सही मायने में आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक उसकी बेटियां डर-डर कर जी रही हों। कोई समाज तब तक सभ्य नहीं कहा जा सकता, जब तक महिलाएं रात को अकेले बाहर निकलने में असुरक्षित महसूस करती हों।