पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के आरक्षण को तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान लाखों महिलाएं स्थानीय शासन का हिस्सा बनी हैं। जिन परिवारों में महिलाओं का सार्वजनिक जीवन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, वहां से निकलकर उनका चुनाव लड़ना और निर्वाचित होना सामाजिक बदलाव का संकेत है। मगर हकीकत कुछ और ही है।
पंचायतों में अक्सर ऐसी स्थितियां दिखती हैं, जहां महिला सरपंच निर्वाचित तो होती है, मगर कामकाज पति संभालता है। कहीं ससुर, कहीं जेठ और कहीं पुत्र बैठकों में मौजूद होते हैं। कई बार महिला जनप्रतिनिधि की कुर्सी पर उसका पति या कोई दूसरा पुरुष बैठा दिखता है। तब सवाल केवल इतना नहीं रह जाता कि महिला प्रतिनिधि कहां है, बल्कि यह होता है कि जनता ने किसे चुना और उसके हिस्से का कार्य कौन कर रहा है?
उदाहरण के तौर पर देखें, तो राजस्थान में पंचायत चुनावों की तैयारियों के मद्देनजर सरपंच और वार्ड पंच के लिए महिलाओं के आरक्षित पदों की घोषणा भी कर दी गई है। आने वाले दिनों में गांवों में चुनावी हलचल बढ़ेगी और आरक्षित सीटों पर महिलाएं चुनाव मैदान में उतरेंगी। जीत के बाद उनके नाम के आगे सरपंच, वार्ड पंच या पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्य जैसे पद जुड़ जाएंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था के आंकड़ों में महिलाओं की भागीदारी मजबूत दिखेगी। मगर आंकड़ों से आगे एक बुनियादी सवाल खड़ा है- क्या निर्वाचित होने के बाद महिलाएं वास्तव में पंचायत की सत्ता अपने हाथ में ले पाएंगी?
परिवार का सहयोग और प्रतिनिधि की जगह ले लेना एक बात नहीं है। नई महिला प्रतिनिधि को प्रशासनिक प्रक्रियाएं समझने, सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने, दस्तावेज तैयार करने या अधिकारियों से संवाद करने में परिवार का कोई सदस्य मदद करे, तो इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं। कठिनाई वहां शुरू होती है, जहां मदद धीरे-धीरे अधिकार में बदल जाती है और सहयोगकर्ता निर्वाचित प्रतिनिधि की भूमिका ही अपने हाथ में ले लेता है। पति अधिकारियों से मिलने लगे, पंचायत की बैठकों में महिला की जगह बैठने लगे, फैसले खुद लेने लगे और पंचायत से जुड़े लोग भी उसी को वास्तविक प्रतिनिधि मानने लगें, तो यह परिवार की सहायता नहीं, निर्वाचित अधिकार का अतिक्रमण है।
परिवार के भीतर सत्ता संबंध हमेशा बराबरी के नहीं होते। अनेक मामलों में महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से पति या परिवार के दूसरे सदस्यों पर निर्भर होती हैं। गांव में पुरुष रिश्तेदार का प्रभाव भी अधिक हो सकता है। ऐसे में किसी महिला के लिए पति, ससुर या पुत्र को यह कहना कि पंचायत का काम वह स्वयं देखेगा, उतना सरल नहीं होता जितना बाहर से दिखता है। इसलिए महिला के नाम पर पुरुष द्वारा पंचायत चलाने की समस्या को केवल महिला की इच्छा या उसकी प्रशासनिक क्षमता का प्रश्न मानना अधूरा होगा।
यदि निर्वाचित महिला की जगह उसका पति या कोई पुरुष रिश्तेदार पंचायत की बैठक में मौजूद रहता है, तो क्या केवल महिला को दंडित करना न्यायसंगत होगा? मध्य प्रदेश में कुछ वर्ष पहले महिला सरपंचों और पंचों की जगह उनके पति या दूसरे परिजनों के पंचायत बैठकों में शामिल होने पर रोक लगाने के लिए प्रशासनिक आदेश जारी किया गया था। ऐसे मामलों में महिला प्रतिनिधि के विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान चर्चा में आया। मगर प्रश्न यह है कि यदि निर्वाचित महिला की जगह रिश्तेदार पुरुष पद का इस्तेमाल कर रहा है, तो जवाबदेही का केंद्र वही पुरुष क्यों न बने?
मान लिया जाए कि किसी महिला को स्वतंत्र रूप से पंचायत का कार्य करने नहीं दिया जा रहा। परिवार का कोई पुरुष सदस्य उसके स्थान पर फैसले कर रहा है और महिला आर्थिक या सामाजिक दबाव के कारण उसका विरोध नहीं कर पा रही। ऐसी स्थिति में उसे पद से हटाने की चेतावनी उसकी स्थिति को मजबूत करेगी या कमजोर? यदि समस्या ही यह है कि उसके निर्वाचित अधिकार पर किसी दूसरे का कब्जा है, तो समाधान उस महिला को सार्वजनिक जीवन से बाहर करना नहीं, बल्कि उसके अधिकार को सुरक्षित करना होना चाहिए।
महिला आरक्षण का उद्देश्य पंचायत की कुर्सी पर केवल महिला का नाम दर्ज कराना नहीं था। इसका मकसद निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करना था। इसलिए निर्वाचित महिला की जगह कोई पुरुष पंचायत चला रहा हो तो प्रशासन की जिम्मेदारी केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं हो सकती कि नियम टूटा या नहीं। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सके।
यहां कानून के साथ सामाजिक मानसिकता का सवाल भी जुड़ा है। कई जगह महिला के निर्वाचित होने के बाद भी परिवार और गांव का व्यवहार ऐसा होता है, मानो वास्तविक प्रतिनिधि उसका पति ही हो। अधिकारी अनौपचारिक रूप से उसी से बात करने लगते हैं। पंचायत से जुड़े ठेकेदार और दूसरे प्रभावशाली लोग भी उसी पुरुष को निर्णयकर्ता मान लेते हैं। गांव के लोग अपनी समस्याएं लेकर महिला के बजाय उसके पति के पास पहुंचते हैं। इस तरह धीरे-धीरे एक ऐसी समांतर व्यवस्था बन जाती है, जिसमें पद महिला का होता है और अधिकार पुरुष का।
फिर भी महिला आरक्षण की उपलब्धियों को केवल ऐसी विसंगतियों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। अनेक महिला प्रतिनिधियों ने पंचायत व्यवस्था को समझा, प्रशासनिक प्रक्रियाएं सीखीं और स्वतंत्र निर्णय लिए हैं। उन्होंने पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सड़कों और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को स्थानीय प्राथमिकताओं में जगह दी है। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या महिलाओं की क्षमता की नहीं, बल्कि उन्हें उपलब्ध निर्णय की स्वतंत्रता की है।
इसलिए महिला प्रतिनिधियों के काम का मूल्यांकन उनके फैसलों और पंचायत के कामकाज से होना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वे महिला हैं। यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि ग्रामसभा में स्वयं अपनी बात रखती है, अधिकारियों से सवाल करती है, योजनाओं को समझती है और गांव की प्राथमिकताएं तय करती है, तो यही लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वास्तविक कसौटी है।
राजस्थान में भावी पंचायत चुनावों के बाद हजारों महिलाएं स्थानीय शासन की जिम्मेदारी संभालेंगी। तब महिला प्रतिनिधित्व का आंकड़ा निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण होगा, लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण यह देखना होगा कि कितनी महिलाएं ग्रामसभा में स्वयं बोलती हैं, कितनी अधिकारियों से सीधे संवाद करती हैं, कितनी अपने गांव की प्राथमिकताएं तय करती हैं और कितनी अपने नाम पर चल रही किसी दूसरी सत्ता के साए में खड़ी रह जाती हैं।
आरक्षण ने महिलाओं के लिए पंचायत के दरवाजे खोल दिए हैं। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि उस दरवाजे के भीतर उनकी आवाज भी पहुंचे और निर्णय का अधिकार भी उनके हाथ में रहे। लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल कुर्सी तक पहुंचने का नाम नहीं है। वह अपने विवेक से निर्णय लेने की स्वतंत्रता का भी नाम है। जब महिला अपने नाम से मिली कुर्सी पर स्वयं बैठेगी, अपनी बात रखेगी और अपने निर्णय खुद करेगी, तभी संख्या में दिखाई देने वाला प्रतिनिधित्व वास्तविक सशक्तीकरण में बदलेगा। यही महिला आरक्षण की अगली और अधिक कठिन कसौटी है।
