विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में महिलाओं की असीम क्षमता को देखते हुए, उनके योगदान को सम्मानित करने तथा उनके सामने आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए विश्व स्तर पर पहल हो रही है। इसका उद्देश्य अधिक समावेशी और विविध वैज्ञानिक समुदाय का निर्माण करना है। यह प्रयास इन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सभी प्रतिभाओं का लाभ उठाने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। इससे अन्वेषण का मार्ग निकल रहा है। फिर भी महिलाओं को कई जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो उनकी प्रगति में बाधाएं उत्पन्न कर रहा है।
विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित विषयों में लैंगिक खाई पाट कर, समावेशी और सतत विकास में तेजी लाई जा सकती है। मगर हकीकत यह है कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल एक-तिहाई है। उन्हें पर्याप्त स्तर पर वित्तीय साधन उपलब्ध नहीं हैं। उनके लिए प्रकाशन अवसरों का अभाव है। विश्वविद्यालयों में भी शीर्ष पदों पर उनकी मौजूदगी कम है। महिलाओं को विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों से जितना दूर रखा जाएगा, वैश्विक चुनौतियां उतनी ही जटिल होती जाएंगी। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में उच्च शिक्षा की संभावना अधिक होती है, लेकिन आज भी विज्ञान स्नातक में उनकी हिस्सेदारी केवल पैंतीस फीसद है।
महिलाओं के प्रति उपेक्षा भाव और समानता के खिलाफ उग्र प्रतिक्रिया उनको पीछे धकेलने का काम करती है। इससे कड़ी मेहनत से हासिल की गई उपलब्धियां खतरे में हैं। महिला संगठनों और नागरिक समाज ने इन उपलब्धियों को हासिल करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। पूरी दुनिया में महिलाओं और लड़कियों को अब भी कई तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों पर खतरा मंडराना चिंताजनक है। दुनिया भर में, महिला अधिकारों की पैरोकारी करने वालों को उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ता है। इससे महिला अधिकारों के क्षरण के साथ सामाजिक-शैक्षिक जवाबदेही में गिरावट देखी जा रही है।
विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) की अवधारणा यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन ने वर्ष 2001 में प्रस्तुत की थी। इस संगठन ने ‘एसटीईएम’ का इस्तेमाल सर्वप्रथम ज्ञान और कौशल को एकीकृत करने वाले पाठ्यक्रम में करिअर को संदर्भित किया था। यह एक व्यावहारिक दृष्टिकोण से चार विशिष्ट विषयों- विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में विद्यार्थियों को शिक्षित करने के विचार पर आधारित पाठ्यक्रम है। भारत उन देशों में से एक है, जहां सबसे अधिक संख्या में वैज्ञानिक और इंजीनियर हैं। पिछले कुछ वर्षों से देश में इस दिशा में काफी तेजी आई है।
एक ताजा रपट के मुताबिक विश्व स्तर पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 33.3 से 35 फीसद है। इस क्षेत्र में यहां मात्र 29 फीसद हिस्सेदारी है। वैश्विक औसत के विपरीत, भारतीय शिक्षा में लगभग 43 फीसद महिलाओं के नामांकन के साथ उनकी उपस्थिति है, लेकिन नौकरी के क्षेत्र में उनकी भागीदारी घट कर केवल चौदह फीसद रह जाती है। गणित में आत्मविश्वास की कमी और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण प्रमुख बाधाएं हैं। भारत में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विज्ञान ज्योति योजना, जीएटीआइ योजना और किरण योजना जैसी पहल की जा रही हैं।
इस समय पूरी दुनिया में महिलाओं और लड़कियों को विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित में अपना भविष्य बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। नई डिजिटल तकनीक के विकास में मौजूदा परिस्थिति को देखा जा सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता समेत इस क्षेत्र में हर स्तर पर पुरुषों का दबदबा है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त एल्गोरिद्म और तकनीक में जुड़ी असमानताओं के कारण डिजिटल जगत में महिलाओं के प्रति पुरुष वर्चस्व को बढ़ावा मिलने का जोखिम है। इस क्षेत्र से महिलाओं को जितना बाहर रखा जाएगा, उतना ही तात्कालिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने की हमारी सामूहिक शक्ति जलवायु परिवर्तन से लेकर खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और तकनीकी क्षेत्र में बदलावों तक सीमित होती जाएगी।
दुनिया भर में ऐसे क्षेत्रों में आज भी महिलाओं और पुरुषों के बीच स्पष्ट अंतर बना हुआ है। इसके पीछे शोध के लिए सीमित संसाधन, सामाजिक रूढ़ियां और कार्यस्थलों पर भेदभाव जैसे कारण हैं। यह असमानता तकनीकी क्षेत्र में और अधिक गहरी है। डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े कार्यों में महिलाएं केवल 26 फीसद हैं, जबकि ‘क्लाउड कंप्यूटिंग’ में उनकी भागीदारी महज 12 फीसद है। यदि महिलाओं को विज्ञान से दूर रखा जाएगा, तो जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अंतरिक्ष सुरक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने की हमारी सामूहिक क्षमता कमजोर पड़ जाएगी।
बढ़ती असमानताओं के दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ), सामाजिक विज्ञान, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और वित्तीय क्षेत्र को एक साथ जोड़ कर, समावेशी एवं सतत विकास में तेजी लाई जा सकती है। इन क्षेत्रों में सहयोग से डिजिटल कौशल में लैंगिक अंतर कम किया जा सकता है। महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों को प्रोत्साहन मिल सकता है। एआइ संबंधी नीतियों को अधिक संवेदनशील बनाया जा सकता है और ऐसे निवेश को बढ़ावा दिया जा सकता है, जो सामाजिक समावेशन को प्राथमिकता दे। नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने से लेकर अगली महामारी को रोकने तक, हमारा भविष्य इस पर निर्भर है कि हम कितनी अधिक प्रतिभाओं को अवसर दे पाते हैं। हर दिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाएं अपने अधिकारों और सबकी भलाई के लिए वैज्ञानिक सपने साकार कर सकें।
किर्गिस्तान की रसायन वैज्ञानिक असेल सार्तबाएवा इसकी एक मिसाल हैं। वे ब्रिटेन में रसायन विज्ञान की सहायक प्रोफेसर हैं। साथ ही, वह जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी की सह-संस्थापक हैं। उनका शोध वैश्विक स्वास्थ्य की एक अहम समस्या पर केंद्रित है। वह ऐसे समाधान विकसित कर रही हैं, जिनसे ऊंचे तापमान में भी टीके सुरक्षित और प्रभावी रह सकें, ताकि उन्हें जटिल व्यवस्था के बिना दूरदराज के समुदायों तक आसानी से पहुंचाया जा सके। उनका कहना है कि विज्ञान में महिलाओं के लिए हालात पहले से बेहतर हुए हैं। जब वे पढ़ती थीं, तब महिला प्रोफेसर बहुत कम थीं। आज वह अधिक संतुलन और समावेशन को बढ़ावा देने वाली मजबूत नीतियां देखती हैं। फिर भी अभी और अधिक प्रतिभाओं की जरूरत है।
दुनिया को अगले दशक में सृजित नौकरियों में से अस्सी फीसद के लिए किसी न किसी रूप में गणित और विज्ञान कौशल की आवश्यकता होगी। शोध निष्कर्ष बताते हैं कि कई समुदायों में लड़कियों के भविष्य से जुड़े निर्णय परिवार, विशेषकर पिता प्रभावित करते हैं। अक्सर पिता की चिंता होती है कि अगर उसकी बेटी विज्ञान चुनेगी, तो वह परिवार नहीं बना पाएगी। यह धारणा सही नहीं है। लड़कियां करिअर और परिवार दोनों को साथ लेकर चल सकती हैं। ये एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सभी को समान अवसर मुहैया कराने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। इसके लिए छात्रवृत्तियां देने के अवसर बढ़ाने जरूरी हैं। उनके लिए प्रशिक्षण के दरवाजे खोलने होंगे। उनको आकर्षित करने वाला सुरक्षित कार्यस्थल तैयार करना अहम होगा। शुरुआत से ही लड़कियों को विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ाई-लिखाई के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
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भारत में संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं, पुरुषों की तुलना में ’36 फीसद’ अधिक समय तक अपनी नौकरी में टिकी रहती हैं। बुधवार को जारी एक नई रपट में यह जानकारी दी गई है, जो इस पुरानी धारणा को गलत साबित करती है कि महिलाएं जल्दी नौकरी छोड़ देती हैं। वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) मंच ‘सैलरी-से’ द्वारा किए गए इस अध्ययन के आंकड़े 47,800 से अधिक ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) रिकॉर्ड के विश्लेषण पर आधारित हैं। इनमें मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों के वेतनभोगी पेशेवरों को शामिल किया गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
