भारतीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का मूल ढांचा पूरी तरह से कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र में व्यापक जनसांख्यिकीय बदलाव देखने को मिला है। रोजगार और बेहतर आजीविका की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से पुरुषों का शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ा है। इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नई परिस्थिति को जन्म दिया है। आज खेत तैयार करने से लेकर बीज रोपने, निराई-गुड़ाई, कटाई और अनाज के सुरक्षित भंडारण तक के मामले में अच्छे-खासे अनुपात में जिम्मेदारी महिलाओं ने अपने कंधों पर ली है।

इसके बावजूद, यह एक गंभीर प्रशासनिक और नीतिगत विफलता है कि जो महिलाएं कृषि कार्यों का एक बड़ा हिस्सा हिस्सा संभाल रही हैं, उन्हें आज भी आधिकारिक रूप से किसान का दर्जा हासिल नहीं है। यह विचारणीय विषय है कि महिला किसान वर्तमान कृषि संकट के समाधान में एक अहम भूमिका निभा सकती हैं। अगर नीतिगत स्तर पर कुछ बाधाओं को दूर कर दिया जाए, तो महिलाएं देश की संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती हैं। मगर इसके लिए सबसे पहले कृषि क्षेत्र में महिलाओं के योगदान और उनकी पहचान के बीच की खाई को समझना आवश्यक है।

सरकारी आंकड़ों और राजस्व प्रलेखों में किसान उसे माना जाता है, जिसके नाम पर कृषि भूमि पंजीकृत होती है। हमारे पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे में भूमि का स्वामित्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों के नाम ही हस्तांतरित होता रहा है। भूमि का वैधानिक पट्टा हाथ में न होने के कारण व्यवस्था की नजर में महिलाएं केवल कृषि मजदूर या परिवार की सहायक मात्र बन कर रह जाती हैं। यह केवल पहचान का संकट नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी आर्थिक और ढांचागत बाधा है। जब एक महिला कानूनी रूप से कृषक नहीं होती, तो वह राज्य द्वारा दी जाने वाली किसी भी संस्थागत सुविधा की पात्र नहीं मानी जाती।

जब महिलाएं वित्तीय संस्थानों या सहकारी समितियों के पास ऋण के लिए जाती हैं, तो अचल संपत्ति या भूमि की गारंटी न होने के कारण उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है। ऐसे में उन्हें स्थानीय साहूकारों पर निर्भर होना पड़ता है, जिनकी ब्याज दरें बहुत अधिक होती हैं। इसके अतिरिक्त, सरकारी अनुदान, न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ और फसल नष्ट होने की स्थिति में मिलने वाला बीमा का पैसा भी उसी व्यक्ति के बैंक खाते में जाता है, जिसके नाम पर जमीन होती है। यानी खेत में मेहनत महिला भी करती है, लेकिन आर्थिक नियंत्रण और सुरक्षा जाल से वह पूरी तरह बाहर रहती है।

स्थानीय जलवायु और मिट्टी की प्रकृति के अनुसार बीजों का चयन, उनके संरक्षण और संवर्धन में महिलाओं की खासी भागीदारी रही है। आधुनिक कृषि में रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल ने मिट्टी की उर्वरक क्षमता को भारी नुकसान पहुंचाया है। इस संकट को देखते हुए बहुत सारी महिला किसानों ने तेजी से जैविक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों की ओर रुख किया है। वे जानती हैं कि रासायनिक खाद और कीटनाशकों का सीधा दुष्प्रभाव उनके परिवार के स्वास्थ्य और स्थानीय भूजल पर पड़ता है। इसलिए उन्होंने केंचुए से खाद तैयार करने, नीम और अन्य वनस्पतियों से कीटनाशक बनाने और फसल चक्र को वैज्ञानिक तरीके से अपनाने का काम शुरू कर दिया है।

जलवायु परिवर्तन आज कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और सूखे की मार का सीधा असर फसलों के उत्पादन पर पड़ता है। इन विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए महिला कृषकों ने व्यावहारिक और संसाधन-कुशल तरीके अपनाए हैं। उन्होंने जल संरक्षण के लिए खेत के चारों ओर मेड़बंदी करने, वर्षा जल संचयन के लिए छोटे पोखर बनाने और कम पानी में पकने वाली स्थानीय फसलों को प्राथमिकता देने की रणनीति अपनाई है। पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है। व्यावहारिक स्तर पर देखें, तो यह आमतौर पर महिलाओं के प्रबंधन पर निर्भर है। दूध उत्पादन से लेकर गोबर के कृषि उपयोग तक, हर एक चरण में उनका तकनीकी और व्यावहारिक ज्ञान किसी भी औपचारिक कृषि शिक्षा से कम नहीं है।

वर्तमान परिदृश्य में महिलाओं ने अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए सामूहिकता का सहारा लिया है। पूरे देश में लाखों स्वयं सहायता समूह और महिला सहकारी समितियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नई क्रांति ला रही हैं। जिन महिलाओं के पास व्यक्तिगत रूप से संसाधन नहीं थे, उन्होंने समूह बना कर छोटी-छोटी पूंजी एकत्रित की है। अब ये महिलाएं बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे बाजार से संपर्क कर रही हैं। वे सामूहिक रूप से उन्नत बीज खरीदती हैं, कृषि उपकरणों को किराए पर लेती हैं और अपनी उपज को सीधे थोक बाजार में उचित मूल्य पर बेचती हैं। स्थानीय स्तर पर अनाज की छंटाई, साफ-सफाई, मसालों की पिसाई और फलों-सब्जियों के प्रसंस्करण के छोटे कुटीर उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं। इससे न केवल फसल का बेहतर मूल्य मिल रहा है, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार का सृजन भी हो रहा है।

जब धन किसी महिला के हाथ में आता है, तो उसका वितरण परिवार के विकास और मानव संसाधन के निर्माण में सबसे अधिक होता है। एक सशक्त महिला किसान अपनी आय का सबसे बड़ा हिस्सा अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों की शिक्षा और परिवार के पोषण पर खर्च करती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता केवल उनकी उन्नति नहीं है, बल्कि यह कुपोषण, बाल विवाह और अशिक्षा जैसी गंभीर सामाजिक बीमारियों का सबसे प्रभावी उपचार है। जब गांव की आर्थिकी महिलाओं के नियंत्रण में आती है, तो संपूर्ण ग्रामीण समाज के स्वास्थ्य और शिक्षा के सूचकांकों में सुधार दर्ज किया जाता है।

राज्यों के राजस्व कानूनों में ऐसे प्रावधान किए जाने चाहिए जो महिलाओं के नाम पर या कम से कम पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर भूमि के पंजीकरण को अनिवार्य या प्रोत्साहित करें। संपत्ति पंजीकरण शुल्क में महिलाओं को दी जाने वाली छूट का दायरा और बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि परिवार स्वप्रेरणा से महिलाओं को भूमि का कानूनी अधिकार सौंपें। जब तक राजस्व दस्तावेजों में उनका नाम दर्ज नहीं होगा, तब तक किसी भी सरकारी योजना का सीधा लाभ उन तक पारदर्शी तरीके से नहीं पहुंच सकेगा।

दूसरा अहम सुधार कृषि उपकरणों और प्रौद्योगिकी के डिजाइन में होना चाहिए। आज बाजार में उपलब्ध ट्रैक्टर से लेकर हाथ से चलने वाले छोटे कृषि यंत्रों का निर्माण मुख्य रूप से पुरुषों की शारीरिक संरचना और क्षमता को ध्यान में रख कर किया गया है। चूंकि अब खेतों में मुख्य रूप से महिलाएं काम कर रही हैं, इसलिए कृषि अनुसंधान केंद्रों और अभियांत्रिकी संस्थानों को ऐसे उपकरण विकसित करने होंगे, जो वजन में हल्के हों, चलाने में आसान हों और महिलाओं के अनुकूल हों।

भारत की कृषि व्यवस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है। इस व्यवस्था को ढहने से बचाने और भविष्य की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने का एक जरूरी विकल्प महिला कृषकों को नीतिगत, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर मुख्यधारा में लाना है। खेती केवल मिट्टी और पानी का खेल नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाला एक ऐसा विज्ञान है जिसके लिए धैर्य, सूझबूझ और दूरदृष्टि की आवश्यकता होती है। इन सभी पैमानों पर ग्रामीण महिलाओं ने खुद को साबित किया है। जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज उनके इस मूक श्रम को पहचानें।

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केंद्र सरकार ने 1966 के गन्ना नियंत्रण आदेश को एक व्यापक नए नियामक ढांचे से बदलने का प्रस्ताव किया है। इसमें पहली बार एथनाल उत्पादन, डिजिटल अनुपालन और कारखानों की मंजूरी के लिए एक औपचारिक व्यवस्था को एक साथ लाया गया है। सरकार ने इस मसविदे पर 20 मई तक लोगों से सुझाव मांगे हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक