घाव तो वक्त की धूल तले दब जाते हैं, लेकिन समय खुद जो घाव करता है, चाहे वह किसी प्रियजन के बिछड़ने का हो, ढलती उम्र का हो, या हाथ से छूटे हुए सुनहरे अवसरों का, सत्ता या ताकत छूटने का, उसे वह कभी पुराना नहीं होने देता। जब भी हम थोड़ा संभलने की कोशिश करते हैं, वह यादों की गलियों से कोई पुराना कांटा उठाकर फिर से चुभा देता है। यह उसका ‘तस्दीक’ कराने का तरीका है।
बाकी सारे घाव तो किसी न किसी तरह ढक जाते हैं, उन पर वक्त की गर्द जम जाती है, अपनों की झूठी-सच्ची हमदर्दी का लेप लग जाता है और धीरे-धीरे उन्हें पूरी तरह से भरने का एक मुकम्मल भरम भी हो जाता है। हम इंसान उस ढके हुए जख्म की खाल को देखकर मन ही मन तसल्ली की एक लंबी सांस लेते हैं और खुद को गुमराह करते रहते हैं कि चलो, बुरा दौर बीत गया, अब रास्ते सीधे हैं।
लेकिन समय जो घाव देता है, वह किसी मरहम की बिसात नहीं मानता। समय अपने दिए जख्मों को हमेशा हरा रखता है। जब भी हमारी जिंदगी अपनी आपाधापी में थोड़ा-सा संभलने की कोशिश करती है, वह चुपके से उन्हें हरा कर देगा।
समय कोई शांत बहती हुई नदी नहीं है, जो किनारों को सहलाकर गुजर जाए। वह एक बेहद शातिर, सजग और बेरहम शिकारी है। जब हम अतीत के मलबे से निकलकर एक नई दुनिया बसाने की कोशिश में मुस्कुराने को हों, जब लगे कि हम वक्त की मार से बहुत आगे निकल आए हैं, ठीक उसी दौरान हमारे निकट से गुजरते पल पुरानी, भूली-बिसरी राहों से चुन-चुनकर नुकीले और जहरीले कांटे बटोर लाता है।
वह हमारे कानों के बेहद पास आकर अपनी सर्द सांसों के साथ फुसफुसाता है कि मैंने जो घाव दिए हैं, तुम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उन्हें भरने की कोशिश मत करना। तुम्हारी हर कोशिश मेरी मुट्ठी में है।
ऊपरी तौर पर जमी हुई वह ठंडी परत हमें कुछ पलों के लिए, कुछ दिनों के लिए, या शायद कुछ सालों के लिए एक दिखावे की तसल्ली तो दे सकती है, हमें यह झांसा दे सकती है कि अब सब शांत है, लेकिन वह भीतर की आदिम आग को कभी बुझा नहीं सकती। वह सिर्फ एक अस्थायी आवरण है, एक कमजोर पर्दा है।
जैसे ही स्मृतियों की कोई हल्की-सी सरसराहट होती है, या जिंदगी की राह में कोई नया अप्रत्याशित झटका लगता है, वह ऊपरी परत ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह जाती है। भीतर से खौलता हुआ, लाल-तप्त, पिघला हुआ लावा फिर से पूरी शिद्दत के साथ बाहर उबल आता है और हम इंसान को एक ही झटके में अहसास हो जाता है कि हम जहां से चले थे, आज भी ठीक उसी जगह बेबस खड़े हैं।
अगर इस कड़वाहट को जीवन के यथार्थ पर कसकर देखा जाए, तो समय हमें इतने रूपों में तोड़ता है कि उनका कोई अंत नहीं है। जब वह हमारे किसी बेहद अजीज को, हमारी धड़कन के सबसे करीब रहने वाले इंसान को हमसे हमेशा-हमेशा के लिए छीन लेता है, तो वह जो खालीपन छोड़ जाता है, उसकी भरपाई कोई ताकत नहीं कर सकती।
साल पर साल गुजरते जाते हैं, कैलेंडर बदलते हैं, लोग हमारे चेहरे को देखकर झूठा दिलासा देते हैं कि अब तो हमें इसकी आदत हो गई होगी, लेकिन सच सिर्फ हमारा अकेलापन जानता है कि वह दर्द वक्त के साथ कम होने के बजाय और ज्यादा गाढ़ा और गहरा होता चला गया है।
उम्र के एक आखिरी पड़ाव पर आकर जब हम थककर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो समय के हाथों छूटे हुए बड़े फैसले, गलतियां और खोए हुए सुनहरे अवसर एक स्थायी और कभी न मिटने वाली टीस बन जाते हैं।
समय के ये न भरने वाले घाव ही वास्तव में हमें हमारी अंतिम सांस तक ‘मनुष्य’ बनाए रखते हैं। अगर समय के दिए सारे जख्म पूरी तरह भर जाते, हम सब कुछ भूलकर पूरी तरह बेफिक्र और चैन से सो जाते, तो हम एक संवेदनशील और जीवंत प्राणी न रहकर पत्थर की एक बेजान मूरत बन जाते।
यह कसक, यह लगातार सालने वाली टीस और भीतर चौबीसों घंटे सुलगता हुआ लावा ही हमारी जिंदा चेतना के सबसे बड़े प्रमाण हैं। समय का असल मकसद सिर्फ हमें दर्द देना नहीं है, बल्कि उस दर्द के बहाने हमें हर सुबह यह याद दिलाना भी है कि इस पूरी कायनात में कुछ भी स्थायी नहीं है।
न हमारी ये छोटी-छोटी खुशियां, न हमारा झूठा अहंकार, न हमारा यह अस्थायी साम्राज्य और न ही हमारा चाहा हुआ चैन। वह एक निष्ठुर और कठोर उस्ताद की तरह जिंदगी के हर मोड़ पर हमारे पुराने जख्मों की खाल को अपने नाखूनों से कुरेदकर हमें हमारी असली औकात और इस पूरी जिंदगी की नश्वरता का तीखा पाठ पढ़ाता रहता है।
हम इंसान के पास समय के इस बिछाए हुए जाल और उसके इस निर्मम चक्रव्यूह के सामने घुटने टेकने के अलावा कोई दूसरा विकल्प बचता ही नहीं है।
रास्ता बस इतना ही रह जाता है कि हम इस डरावनी हकीकत को पूरी शिद्दत के साथ गले लगा लें। जब हम यह पूरी तरह मान लेते हैं कि समय के दिए ये गहरे घाव अब कभी नहीं भरेंगे, तो हम उन्हें जबरदस्ती भरने की वह नाकाम और थका देने वाली व्यर्थ कोशिशें हमेशा के लिए छोड़ देते हैं।
हम उस दहकते हुए लावे के साथ, उस उठती हुई कसक के साथ और उस मद्धम दर्द के साथ ही अपनी सांसों का तालमेल बिठाकर जीना सीख लेते हैं। हमारे भीतर छिपी हुई जिजीविषा उस असहनीय दर्द को ही अपनी सबसे बड़ी ढाल और ताकत बना लेती है।
घाव भरे न भरे, पर उस दर्द की भट्टी में जलकर जो व्यक्तित्व कुंदन की तरह निखरता है, वही समय के इस अंतहीन अट्टहास को सहने का माद्दा रखता है। समय रोज नए घाव देता रहेगा, भीतर का लावा सुलगता रहेगा और हम इंसान इसी कड़वी हकीकत के साए में मुस्कुराते हुए अपनी सांसों का सफर पूरा करते रहेंगे।
