Elections Results Analysis: बंगाल में वैसी ही टक्कर बताई गई, जैसी बिहार में बताई गई थी, और बिहार में वैसी ही, जैसी दिल्ली में कही गई थी। आमतौर पर इसी पंक्ति पर अधिकांश विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अपनी राय रखते हैं, और राजनीतिक दलों के प्रवक्ता भी इसी लाइन को दोहराते हैं।

भारत में चुनाव विश्लेषण और नतीजों का आकलन इस कदर आधारहीन और तथ्यहीन होता जा रहा है कि निकट भविष्य में इसके सुधरने की उम्मीद कम ही दिखती है। इसकी एक वजह खुद भाजपा की रणनीति है, जिसने समाज को स्पष्ट खांचों में बांट दिया है। दूसरी वजह गैर-भाजपा दल हैं, जो यह समझने को तैयार नहीं हैं कि वे भाजपा की रणनीति में फंस चुके हैं।

अब पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों की बात करें, जिनके बाद अधिकांश विश्लेषक इस बात पर हैरान हैं कि जब मुकाबला कड़ा था, तो भाजपा जीत कैसे गई? सवाल यह है कि यह तथाकथित “कड़ी टक्कर” सिर्फ भाजपा-विरोधी विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों को ही क्यों दिखाई देती है? हमें जैसे कुछ विश्लेषकों को यह टक्कर क्यों नहीं दिखती?

जब मैंने इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की, तो पाया कि भाजपा ने यदि “अंधभक्तों” की एक फौज तैयार की है, तो गैर-भाजपा दलों ने “अंधविरोधियों” की एक फौज खड़ी कर दी है। फर्क इतना है कि अंधभक्त अपने नेतृत्व की स्पष्ट रणनीति पर चलते हैं, जबकि अंधविरोधियों के पास कोई स्पष्ट दिशा नहीं है। उदाहरण के तौर पर, उन्हें यह तक स्पष्ट नहीं होता कि दिल्ली में राघव चड्ढा का समर्थन करें, अरविंद केजरीवाल का, ममता बनर्जी की सरकार की सराहना करें या फिर इंडिया गठबंधन के अंतर्गत कम्युनिस्ट दलों का।

असम, केरल और तमिलनाडु की राजनीति में भी गैर-भाजपा दल अक्सर इसी अंधविरोधी मानसिकता के तहत काम करते दिखे—मानो उनका एकमात्र लक्ष्य भाजपा को हराना हो, लेकिन कैसे हराना है, इस पर स्पष्ट रणनीति का अभाव है। सिर्फ चुनाव के समय “कड़ी टक्कर” या “क्लोज मुकाबले” की थ्योरी देने के बजाय विश्लेषकों को यह भी समझना होगा कि भाजपा चुनावों से पहले संगठन स्तर पर व्यापक काम करती है, और पिछले वर्षों में उसके संगठन में क्या बदलाव हुए हैं।

उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में डीएमके सरकार के पांच वर्षों के कार्यकाल और एआईएडीएमके के आंतरिक बिखराव को देखें, तो स्पष्ट होता है कि द्रविड़ राजनीति नए विकल्प की तलाश में थी। भाजपा पारंपरिक रूप से सवर्ण मूड वाली पार्टी रही है, इसलिए उसे इस राज्य में विकल्प बनने में समय लगेगा। लेकिन कांग्रेस खुद विकल्प बनने के बजाय भाजपा-विरोध तक सीमित रही। इसी बीच, पिछड़े वर्ग से आने वाले तमिल सुपरस्टार विजय ने एक नया विकल्प प्रस्तुत किया, जिसे जनता ने स्वीकार भी किया।

कांग्रेस विकल्प बनने की जगह भाजपा के अंधविरोधियों जैसी रणनीति में फंसी रही और डीएमके एआईएडीएमके जैसे दगे कारतूसों के बीच भाजपा हराओ मुहिम पर लगी रही। और पिछड़े वर्ग से आने वाले तमिल सुपरस्टार विजय ने विकल्प पेश कर दिया, जनता ने स्वीकार भी कर लिया। केरल में दस साल से चली आ रही लेफ्ट सरकार को दम तोड़ना ही था, सो कांग्रेस ने उसे रिप्लेस कर दिया।

और बंगाल में भी भाजपा के अंधविरोधियों को ममता के सिवाय कुछ नहीं दिख रहा था। जुझारु ममता की शख्सियत को पिछले 12 साल से ढो रहे लोग इस बात से मुंह चुराते रहें कि सरकार में रहकर संघर्ष नहीं किया जाता है। जनता की सेवा किया जाता है, नीतियों से समाज का निर्माण किया जाता है। इसी भ्रम के कारण चुनाव परिणाम आने के बाद अंधविरोधी विश्लेषक चौंक जाते हैं। दूसरी ओर, अंधभक्त इसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की “मास्टर स्ट्रोक” रणनीति बताते हैं, जबकि विरोधी पक्ष धनबल, पुलिस, ईवीएम या अन्य संस्थाओं पर सवाल उठाने लगता है।

इस अंधभक्ति और अंधविरोध के बीच चुनावी विश्लेषण और आकलन की पूरी प्रक्रिया ही चौपट हो गई है। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का कोई ठोस विकल्प नहीं है। ऐसे में स्टालिन ने ब्राह्मण-विरोध की पृष्ठभूमि पर चुनावी विमर्श खड़ा किया, जो कई लोगों को उबाऊ लगा। टीवीके इस द्रविड़ राजनीति में एक ताजा, नया चेहरा बनकर उभरी। क्या ये सच नहीं कि तमिलनाडु में किसी भी दल ने एक भी ब्राह्मण को विधानसभा का उम्मीदवार नहीं बनाया था। ऐसे में यदि कुछ वर्ग नए विकल्प की ओर झुकते हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?

इसी तरह, 2001 से 2006 तक भाजपा के साथ गठबंधन में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2009 और 2011 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई थी—तब भी लोग चौंके थे। लेकिन यह मानने को तैयार नहीं हैं कि 2021 में भाजपा 77 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, और वहां से आगे बढ़ने के पीछे उसके संगठनात्मक विस्तार और टीएमसी के समर्थकों और ममता का भाजपा का अंधविरोध रहा है।

यदि ममता बनर्जी भाजपा की रणनीति में न फंसतीं और हिंदू-मुस्लिम संतुलन की राजनीति साधती, तो संभवतः भाजपा के अंधविरोधी विश्लेषकों और पत्रकारों को ईवीएम, एसआईआर या सीआरपीएफ जैसे मुद्दों का सहारा न लेना पड़ता।

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