पिछले वर्षों में ‘इंटरनेट मीडिया’ ने समाज की अवधारणा को काफी बदला है, जिससे वास्तविक समाज के समक्ष कई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। इंटरनेट मीडिया पर विभिन्न माध्यमों से जुड़े लोगों के समूह को ‘हाइपर-कनेक्टेड नेटवर्क सोसाइटी’ कहा जाता है। डिजिटल अंतःक्रियाओं के जरिए संचालित इस समाज में भौगोलिक दूरियां कोई मायने नहीं रखती, इसे वैश्विक नागरिकता वाला समाज भी कहा जाता रहा है। मगर क्या यह समाज भी है? समाज लोगों की साझी स्मृतियों और समान परंपरा से बनता है- एक जगह खड़े होने या किसी माध्यम से जुड़ने मात्र से लोग समाज नहीं बन जाते हैं। समाज एक तरह के मूल्य, नैतिकता और परंपरा से जुड़ा होता है।
तकनीक ने जो ‘जन-समाज’ पैदा किया है, वह उत्पादन और उपभोग पर टिका हुआ समाज है, संबंधों पर नहीं। इसे एक ही तरह की व्यवस्था के अधीन लोग मिलकर बनाते हैं। ऐसे समाज सामूहिक अस्तित्व नहीं बना पाते, बस शासन व्यवस्था या अन्य किसी समानता की वजह से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसमें मनुष्य भीड़ का एक हिस्सा भर है, अपने मनुष्यत्व की गरिमा को धारण करने वाला प्राणी नहीं। इस भीड़ का कोई व्यक्तित्व, पहचान और संस्कृति नहीं होती। वह चलन के अनुसार बदलता रहता है। इसमें लोग किसी एक के साथ और दूसरे के विरुद्ध खड़े होकर ही प्रतिबद्धता का भ्रम पाल सकते हैं।
कनेक्टिविटी बढ़ी, लेकिन संवाद घटता गया
आभासी दुनिया के जन-समाज का मनुष्य संबंधों में स्थित मनुष्य नहीं होकर निरपेक्ष स्वकेंद्रित मनुष्य होता है। आमतौर पर यह इतिहास और समाज से कटकर केवल अपने बारे में सोचता है। यह समाज व्यक्तित्व, चरित्र और मूल्य आधारित नहीं होकर छवियों और अवधारणाओं पर अधिक निर्भर है। मनुष्य और उसके समाज, दोनों के लिए संवाद आवश्यक है। संवाद मनुष्य के पारस्परिक संबंधों पर निर्भर करता है। मगर यह जन-समाज स्वतंत्रता और निजता के नाम पर इस संवाद को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।
संवाद के न रहने से मनुष्य की अपनी पहचान का उन्मूलन होता है और वह तकनीक द्वारा दी गई जानकारी को ग्रहण करते हुए मनुष्य से एक छवि में तब्दील होने लगता है। यह छवि एक ऐसी भीड़ का हिस्सा है, जहां मनुष्य से कुछ भी करवाया जा सकता है। इस भीड़ से बने आभासी समाज में बातों के अलावा ठोस कार्यों की जरूरत नहीं होती। यहां जवाबदेही से अलग हमारा दिखना और लिखना अधिक महत्त्व रखता है। हमारे शब्दों के कोई अर्थ हो या नहीं, इस बात से फर्क नहीं पड़ता। यहां किसी मुद्दे पर अपनी बात रख देने मात्र से कर्तव्य की इतिश्री समझने वाली मानसिकता अधिक होती है।
इसीलिए इन माध्यमों पर सबके प्रति संवेदना जताने वाले लोग असल जिंदगी में संवेदनहीन बने रह सकते हैं। इनके मूल्यों में शब्दों को अर्थों से, कर्मों से और परिणाम से जोड़ने की बाध्यता नहीं है। यहां सिर्फ कहते जाना है। कहे-सुने का तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं होता। यथार्थ को जानने-समझने की कोशिश करने के बजाय यहां तात्कालिकता को ज्यादा महत्त्व मिलता है। इस समाज में ‘वायरल’ होने की आकांक्षा ही अधिकतर लोगों को जोड़े रखती है।
आभासी स्वतंत्रता के पीछे नियंत्रण का तंत्र
वास्तविक जीवन में भावनाओं से जुड़े संबंध यहां महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकते, क्योंकि गहरे संबंधों में कुछ भी कहना मुश्किल हो जाता है। जबकि इस दुनिया में किसी के बारे में न जानते हुए भी, कुछ भी कहना एक अतिरिक्त योग्यता है। इन माध्यमों को अपनी स्वतंत्रता के प्रतीक स्वरूप इस्तेमाल करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि यह सब अपने-आप नहीं चलता। यह हर जगह से नियंत्रित हो रहा है और यह नियंत्रण किसी विशेष पक्ष की ओर झुका हुआ होता है। यहां अगर हम सत्ता की वैचारिकी को आगे बढ़ा सकते हैं, तब सामाजिक, नैतिक और मानवीय होने की भी जरूरत नहीं रहती। यह दुनिया कर्म के अनुसार फल मिलने वाली अवधारणा को आधार नहीं बनाकर लॉटरी-तंत्र को आधार बनाती है। इसमें लोकप्रिय होने की भूख में लाखों लोगों से वह सब करवाया जा सकता है, जो एक निश्चित पद्धति पर चलने वाले समाज में संभव नहीं हो सकता।
भीड़ होकर भी यह समाज बहुत बंद समाज है। यहां विषय, मुद्दे और पोस्ट सब कुछ तय हैं। यहां लोग उतने ही स्वीकृत हो सकते हैं, जितने से शासन को कोई खतरा नहीं हो। इस तरह यहां व्यक्तित्व के लिए जगह नहीं है। यह जगह छवि के लिए ही है। इस ‘नेटवर्किंग सोसाइटी’ में मनुष्य की हैसियत एक ‘यूजर-आईडी’ से अधिक नहीं है। समस्या यह है कि आभासी दुनिया और वास्तविक समाज के लोग एक ही हैं। उनकी अपनी पहचानें घुल-मिल गई हैं। इससे घिरे लोग वास्तविक समाज में अपनी भूमिकाएं भूलते जा रहे हैं। इन सबमें मनुष्य की चेतना बंट गई है, वह अलग-अलग जगहों पर अलग स्तरों पर जी रहा है। सही और गलत के ही नहीं, वास्तविक और आभासी के बीच की रेखाएं उसके लिए धुंधला गई हैं। वह उन चीजों से घिरा हुआ है, जिनका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे में वह वास्तविकता का सामना करने के लायक भी नहीं रह पा रहा।
आभासी और वास्तविक समाज के बीच का यह टकराव मनुष्य की चेतना को एक गहरे मनोवैज्ञानिक संकट की ओर धकेल रहा है, जहां उसका मन-मस्तिष्क एक ही समय में दो विपरीत दुनिया को जीने के लिए मजबूर है। जिस तकनीक ने मनुष्य को पूरी दुनिया से जोड़ दिया है, उसी ने उसे आंतरिक चेतना से अलग भी किया है। आभासी और वास्तविक समाजों के बीच मनुष्य स्वयं को पहचान नहीं पा रहा है। मनुष्य कोई आभासी प्राणी नहीं है, न ही वह भ्रम में रहकर बहुत दिनों तक जी सकता है। उसे सचमुच के समाज की जरूरत होती है। उसे स्पष्ट जुड़ाव, सुरक्षा और अपनापन चाहिए, जो उसे उसके आसपास के समुदाय में ही मिल सकता है। जब यह संभव नहीं होता, तो मनुष्य अकेला पड़ता जाता है। वह बेचैन, अधूरा और भटका हुआ महसूस करता है।
दोनों समाजों के बीच अपनी स्थिति की सही पहचान उसे नहीं रही है, वह दोनों जगह होकर भी नहीं है। इससे मनुष्य की भावनाओं को नियंत्रित करने वाले ‘डोपामाइन’ का चक्र गड़बड़ा गया है। मनुष्य धीरे-धीरे गहरे संशय से घिरता जा रहा है। जहां डर ने उसे जकड़ रखा है उसमें प्रतीक्षा खत्म हो गई है और उसकी जगह खतरे की आहट ने ले ली है। इन सबका असर व्यावहारिक जीवन पर पड़ रहा है। अपनी भीतरी और बाहरी दुनिया से उसका संबंध संतुलित नहीं रहा है।
