लाल, पीले, नीले, हरे.. कैसे दिल भरेगा रंगों से ? अगर ये रंग न हों, तो कैसी बेरंग लगेगी दुनिया!’ जीवन में रंगों की अहमियत को ‘शोले’ फिल्म का संवाद वाकई बखूबा जाहिर करता है। वायु, जल और भोजन की तरह हरेक के जीवन में रंग भी जरूरी हैं। वरना जीवन नीरस ही हो जाएगा। रंग तो अपने कई मशहूर मुहावरों और कहावतों में बिखरे हैं। अपना रंग जमाना, रंगे हाथों पकड़े जाना, असली रंग दिखाना, रंग बदलना और रंग में भंग डालना जैसे रंगारंग मुहावरे यदा-कदा हर कोई बोलचाल में भी इस्तेमाल करता है।
मुंह काला करना, सफेद झूठ बोलना, नीला पड़ जाना, नीला-पीला होना, लाल-पीला होना समेत खास रंगों पर आधारित मुहावरे भी कम रंगीले नहीं हैं। जैसे अलग-अलग रंग जुड़ने से मुहावरों के मायने बदल जाते हैं, वैसे ही लाल, पीला और नीला- तीन रंग मिलकर कई रंग बन जाते हैं। लाल और पीला मिलाने से नारंगी या संतरी, नीला और पीला मिला कर हरा और नीला तथा लाल मिल कर बैंगनी बनते हैं। ऐसे ही लाल, हरा और नीला केवल तीन रंगों को मिला-जुला कर सफेद और काला रंग तक बना सकते हैं।
मगर सच यह है कि रंग कोई बुरा या भला नहीं होता। लाल रंग अभय दान का प्रतीक है, तो पीला रंग स्नेह पूर्वक व्यवहार का अभिप्राय है। उधर हरा रंग प्रकृति की भांति सबके प्रति निष्काम भाव भरता है, जबकि नीले रंग से सृष्टि की अनंतता के दर्शन होते हैं।
सूर्य का प्रकाश रंगीन रोशनी का सबसे शुद्ध और प्रमुख स्रोत है। इसमें समाए बैंगनी, नीला, सफेद, हरा, पीला, संतरी और लाल सात विविध रंग सूर्य की किरणों के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं, तो रंग अपने-अपने कोनों में समा जाते हैं। शरीर तमाम रंग उचित अनुपात में सोख कर ही चुस्त-दुरुस्त रह सकता है। रंग चिकित्सकों का मानना है कि कई रोग अंगों में रंगों के अभाव की वजह से होते हैं। ऐसे रोगों को दूर भगाने का रामबाण उपाय अंगों को उनके खास-खास रंग पहुंचाना है। सूर्य से कुदरती रंग शरीर में प्रवेश करते हैं। लोग शरीर में रंगों के अभाव की आपूर्ति के लिए बढ़-चढ़ कर रंगीन नगीने भी धारण करते हैं। मोती स्लेटी रंग, माणिक लाल रंग, पन्ना हरे रंग, मून स्टेन या टोपाज नीले रंग, हीरा नीले रंग और नीलम बैंगनी रंग के बड़े स्रोत हैं।
विविध रंग आध्यात्मिक, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर रंग जमाते हैं। शारीरिक स्तर पर, लाल रंग इंसान के तनाव को बढ़ाने का काम करता है। जबकि नीला रंग सुकून और राहत देता है। उधर मानसिक स्तर पर, रंग हमारी सोच को बनाते या बिगाड़ते हैं। मिसाल के तौर पर, लाल रंग-रोगन किया कमरा नीले के मुकाबले खासा छोटा लगता है। भावनात्मक तौर पर, लाल रंग उत्तेजना पैदा करता है और नीला रंग शांति देता है। लाल रंग को देखने भर से गुस्से में आग-बबूला इंसान का पारा और चढ़ जाता है। इसके उलट नीला रंग गुस्से पर पानी डालने का काम करता है।
वास्तु शास्त्र घरों और दफ्तरों के रंगों के चयन का सुझाव देता है। वास्तु के मुताबिक घर-परिवार के मुखिया के शयनकक्ष की दीवारें आसमानी नीली होनी चाहिए। बच्चों के कमरे को सफेद, संतरी और पीले से रंगना बेहतर होता है। गुसलखाने की भीतरी दीवारें सफेद होनी चाहिए। शयनकक्ष और गुसलखाने में गुलाबी रंग भी किया जा सकता है। पूजा का कमरा पीला या नारंगी करवाना उचित है। रसोईघर में लाल, संतरी या हरा रंग अच्छा रहता है। घर की बाहरी दीवारों पर हल्का पीला, सफेद, गुलाबी या संतरी बराबर फलदायक रहते हैं। लोकप्रियता के लिहाज से, दीवारों को रंगने में नीला, हरा और भूरा रंग पसंद में ऊपर है।
वैज्ञानिक तथ्य है कि भीतर और ऊपर से सफेद छतों के नीचे रहने वालों को गर्मियों में बड़ी राहत मिलती है। सफेद रंगी छतों को छूकर, सूरज की तपिश लौट जाती है। सफेद छतों वाले भवनों की उम्र अपेक्षाकृत ज्यादा लंबी होती है। लाल रंग की पृष्ठभूमि वाले कमरे में सोने से देर-सवेर अनिद्रा की बीमारी घेर लेती है। बेहतर रोशनीदार कमरों में हल्के रंग कम जंचते हैं। कुछ रंग भी दूसरे रंग के पेंट के साथ कम या ज्यादा शोभा देते हैं। जैसे पीला रंग भूरे रंग के पेंट के सामने ठंडक प्रदान करता है। जबकि यही पीला रंग हरे के सामने गरमाहट महसूस करवाता है। नीला रंग सबसे शीतल है। लेकिन सुनहरे या गुलाबी के साथ मिला-जुला कर नीला रंग की शीतलता घट जाती है।
उधर तड़कीले-भड़कीले रंग रोशनी सोखते हैं। इसीलिए ऐसे रंगों का इस्तेमाल स्कूलों, कालेजों और दफ्तरों में कÞतई नहीं करना चाहिए। वास्तु शास्त्र अपनी जगह है, लेकिन रंगों की पसंद- नापसंद व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करती है। अमूमन अपने स्वभाव से विपरीत रंग के कपड़े पहनना हर किसी को अखरता है। लोग शिकायत करते भी सुने जाते हैं कि फलां रंग रास नहीं आता। बावजूद इसके फिल्मी गीत ‘मोहे रंग दो ..’ की तर्ज पर रंगों के अंग-संग रहने की हर कोई हिमायत करता है।
