1 मार्च 2026 को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी ख़ामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों में हत्या कर दी गई। जारी वार्ताओं के बीच किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक गंभीर दरार का संकेत है। किंतु इस घटना की स्तब्धता से परे, जो बात उतनी ही स्पष्ट रूप से सामने आती है, वह है नई दिल्ली की चुप्पी।

भारत सरकार ने न तो इस हत्या की निंदा की है और न ही ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन पर स्पष्ट आपत्ति दर्ज की है। प्रारंभ में, अमेरिकी-इजरायली हमले की अनदेखी करते हुए, प्रधानमंत्री ने केवल ईरान द्वारा यूएई पर की गई जवाबी कार्रवाई की निंदा तक स्वयं को सीमित रखा, और उससे पहले घटित घटनाक्रम पर मौन साधे रखा। बाद में उन्होंने “गहरी चिंता” और “संवाद एवं कूटनीति” की बातें कहीं—जबकि ठीक यही प्रक्रिया उन बड़े और उकसावे रहित हमलों से पहले जारी थी जिन्हें इज़राइल और अमेरिका ने शुरू किया। किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या पर यदि हमारा देश संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में स्पष्ट आवाज़ नहीं उठाता और निष्पक्षता से हटता हुआ दिखता है, तो यह हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

इस संदर्भ में चुप्पी को तटस्थता नहीं माना जा सकता। यह हत्या बिना औपचारिक युद्ध-घोषणा के और एक चल रही कूटनीतिक प्रक्रिया के दौरान की गई। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या उसकी धमकी को निषिद्ध करता है। किसी वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष की हत्या इन सिद्धांतों के मूल पर प्रहार करती है। यदि ऐसे कृत्य विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ओर से सिद्धांतनिष्ठ आपत्ति के बिना गुजर जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का क्षरण सामान्यीकृत होना आसान हो जाता है।

महज 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजरायल यात्रा से लौटे

स्थिति की गंभीरता समय-परिस्थिति से और बढ़ जाती है। हत्या से महज 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इज़रायल यात्रा से लौटे थे, जहाँ उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के प्रति अपना स्पष्ट समर्थन दोहराया-जबकि गाज़ा में भारी नागरिक हताहतों को लेकर वैश्विक स्तर पर आक्रोश जारी है, जिनमें महिलाएं और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक दक्षिण के कई देश, साथ ही ब्रिक्स में भारत के साझेदार रूस और चीन, इज़राइल से दूरी बनाए हुए हैं, भारत का यह उच्च-प्रोफ़ाइल राजनीतिक समर्थन नैतिक स्पष्टता के बिना एक चिंताजनक विचलन प्रतीत होता है। इस घटना के प्रभाव केवल भू-राजनीति तक सीमित नहीं हैं; इसकी प्रतिध्वनियाँ महाद्वीपों में दिखाई दे रही हैं। और भारत की स्थिति इस त्रासदी के प्रति मौन स्वीकृति का संकेत देती प्रतीत होती है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ईरानी भूमि पर बमबारी और हत्याओं की स्पष्ट शब्दों में निंदा की है, और इसे क्षेत्रीय तथा वैश्विक स्तर पर गंभीर परिणामों वाली खतरनाक वृद्धि बताया है। हमने ईरानी जनता तथा विश्वभर के शिया समुदायों के प्रति संवेदना व्यक्त की है, और दोहराया है कि भारत की विदेश नीति विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांत पर आधारित है, जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में परिलक्षित होता है। संप्रभु समानता, अहस्तक्षेप और शांति के संवर्धन जैसे सिद्धांत ऐतिहासिक रूप से भारत की कूटनीतिक पहचान का अभिन्न अंग रहे हैं। वर्तमान संकोच इसलिए केवल सामरिक नहीं, बल्कि हमारे घोषित मूल्यों से असंगत प्रतीत होता है।

भारत के लिए यह प्रकरण विशेष रूप से चिंताजनक है। ईरान के साथ हमारे संबंध सभ्यतागत होने के साथ-साथ रणनीतिक भी रहे हैं। 1994 में, जब इस्लामिक सहयोग संगठन के कुछ तत्वों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर को लेकर भारत के विरुद्ध प्रस्ताव लाने का प्रयास किया था, तब तेहरान ने उस प्रयास को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस हस्तक्षेप ने भारत के आर्थिक परिवर्तन के संवेदनशील दौर में कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण को रोका। ईरान ने ज़ाहेदान में, पाकिस्तान सीमा के निकट, भारत की कूटनीतिक उपस्थिति को भी सक्षम बनाया-जो ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के विकास के प्रति एक रणनीतिक संतुलन का कार्य करता है।

‘मोदी सरकार को वाजपेयी की यात्रा याद रखनी चाहिए’

वर्तमान सरकार को यह स्मरण रखना चाहिए कि अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान की आधिकारिक यात्रा के दौरान ईरान के साथ भारत के गहरे, सभ्यतागत और समकालीन संबंधों की गर्मजोशी से पुनः पुष्टि की थी। उन दीर्घकालिक संबंधों की उनकी वह स्वीकृति और सराहना आज की सरकार के लिए मानो अप्रासंगिक प्रतीत होती है।

हाल के वर्षों में इजरायल के साथ भारत के संबंध रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में विस्तृत हुए हैं। किंतु यही तथ्य कि भारत तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध रखता है, उसे संयम की अपील करने का कूटनीतिक अवसर प्रदान करता है। परंतु ऐसा अवसर विश्वसनीयता पर निर्भर करता है। और विश्वसनीयता सिद्धांत-आधारित आचरण से आती है, न कि तात्कालिक सुविधा से।

यह केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी है। लगभग एक करोड़ भारतीय खाड़ी क्षेत्र में निवास और कार्य करते हैं। अतीत के संकटों, जैसे गल्फ युद्ध से लेकर यमन, इराक और सीरिया तक में अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भारत की क्षमता उसकी स्वतंत्र पहचान पर आधारित रही है, न कि किसी शक्ति-गुट के प्रतिनिधि के रूप में।

यह विश्वसनीयता संयोग से निर्मित नहीं हुई थी। स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित थी – निष्क्रिय तटस्थता के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता के सचेत आग्रह के रूप में। यह महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में समाहित होने से इनकार था। वर्तमान क्षण यह प्रश्न उठाता है कि क्या वह रुख कमजोर पड़ रहा है। शक्तिशाली देशों द्वारा एकतरफा सैन्य कार्रवाई पर अनालोचनात्मक मौन उस सिद्धांत से पीछे हटने जैसा प्रतीत होता है – और प्रभावतः हमारी विरासत से विमुखता का संकेत देता है।

यह केवल इतिहास का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की वर्तमान आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है। जो देश स्वयं को वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, उसके लिए मौन स्वीकृति की छवि नुकसानदायक होगी। यदि संप्रभुता की अवहेलना बिना परिणाम के संभव है, तो छोटे राष्ट्र शक्तिशाली देशों की इच्छाओं के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं। भारत बार-बार नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत करता रहा है, जो कमजोरों को बलपूर्वक दबाव से बचाए। किंतु यदि यह सिद्धांत तब न बोला जाए जब परीक्षा तत्काल और असुविधाजनक हो, तो वह तर्क खोखला प्रतीत होता है। यदि आज ईरान के संदर्भ में भारत संप्रभुता के प्रश्न पर मुखर नहीं दिखता, तो कल वैश्विक दक्षिण के अन्य देश अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए भारत पर क्यों विश्वास करेंगे?

‘इस संगति के समाधान का उपयुक्त मंच संसद’

इस असंगति के समाधान का उपयुक्त मंच संसद है। जब वह पुनः आहूत होगी, तब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के इस विघटन और उस पर भारत की चुप्पी पर खुली बहस होनी चाहिए। किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या, अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का क्षरण और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता—ये सब भारत के रणनीतिक हितों और नैतिक प्रतिबद्धताओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े प्रश्न हैं। भारत की स्थिति की स्पष्ट अभिव्यक्ति अब अनिवार्य है। लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व इसकी मांग करता है और रणनीतिक स्पष्टता भी।

भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के आदर्श का आह्वान करता रहा है और इस बात को दोहराता रहा है कि विश्व एक परिवार है। यह सभ्यतागत भावना केवल औपचारिक कूटनीति का नारा नहीं; यह न्याय, संयम और संवाद के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत है, भले ही वह असुविधाजनक क्यों न हो। जब नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था स्पष्ट दबाव में हो, तब मौन सिद्धांतों को तिलांजलि देने के समान है। भारत ने स्वयं को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति से अधिक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है; उसने संप्रभुता, शांति, अहिंसा और न्याय के पक्ष में बोलने वाली आवाज़ बनने की आकांक्षा की है, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों। आज आवश्यकता है कि हम उस नैतिक शक्ति को पुनः स्मरण करें और उसे स्पष्टता तथा दृढ़ता के साथ व्यक्त करें।

(सोनिया गांधी कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष और राज्य सभा सांसद हैं।)