वर्षा ऋतु को लेकर भारतीय मानस में अप्रतिम लगाव रहा है। यही वह समय है जब किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए काले मेघों के घुमड़ने का इंतजार करते हैं। बरसात में देरी हो जाए, तो फसलों पर असर पड़ने की संभावना होती है। बारिश की बूंदें पड़ते ही तृषित धरती भी शीतल होने लगती है और चारों ओर फिर से हरियाली छाने लगती है।

भारतीय परंपरा में चौमासे का खास महत्त्व है। सावन का नाम लेते ही लोकगीत, झूले लहलहाती फसलों के साथ जीवन का उल्लास आंखों के सामने तैरने लगता है। मगर विडंबना देखिए कि यही बारिश आज शहरों में भय का पर्याय बनती जा रही है। बादल बरसते हैं, तो महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक सड़कें नदियों में बदल जाती हैं। कहीं वाहन बह जाते हैं, कहीं अस्पतालों में पानी भर जाता है, तो कहीं हवाईअड्डे ठप पड़ जाते हैं। कई बार तो लोग अपने घरों में कैद होकर रह जाते हैं। यह दृश्य अब अपवाद नहीं, लगभग हर मानसून में यह विवशता दिखाई देती है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत में सचमुच बारिश अधिक हो रही है या हमारी शहरी व्यवस्था सिकुड़ गई है? उत्तर दूसरा अधिक सटीक प्रतीत होता है। प्रकृति ने अपना स्वभाव पूरी तरह नहीं बदला। दरअसल, हमने अपने शहरों का चरित्र बदल दिया है। जिन तालाबों में पानी रुकना चाहिए था, वहां बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गईं। जिन नालों से वर्षा का पानी निकलता था, वहां मकान बना दिए गए। जिन आर्द्रभूमियों को शहर का ‘प्राकृतिक गुर्दा’ कहा जाता है, उन्हें कंक्रीट से ढक दिया गया। अब पानी अपने पुराने रास्ते खोजता है, तो हम उसे ‘आपदा’ कह देते हैं।

हमारी नगर योजनाओं में वर्षों तक एक गंभीर भूल होती रही। शहरों को केवल आबादी बसाने की जगह समझा गया, जबकि पानी के प्रवाह का विज्ञान लगभग भुला दिया गया। सड़कें चौड़ी होती गईं, लेकिन नालियां संकरी होती चली गईं। तालाब और बावड़ियां लुप्त होती चली गईं। सीमेंट और डामर ने धरती की सांसें बंद कर दीं। पानी के जमीन में उतरने के रास्ते खत्म होते गए। परिणाम यह हुआ कि कुछ घंटों की बारिश पूरे शहर की गति रोक देती है।

यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन ने कई चुनौतियों को और कठिन बना दिया है। अब वर्षा का स्वरूप बदल गया है। पहले जो पानी कई दिनों में गिरता था, वह अब कुछ घंटों में गिर जाता है। ऐसे में पचास-साठ वर्ष पुराने मानकों पर बनी सीवर व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। नाले उफनने लगते हैं। सड़कें नदी बनने लगती हैं। ऐसे में व्यवस्था से अपेक्षा करना स्वयं को धोखा देना है।

इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा अटल नवीकरण एवं शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत 2.0), वर्षा जल संचयन, शहरी बाढ़ प्रबंधन और ‘स्पंज सिटी’ जैसी अवधारणाओं को आगे बढ़ाना एक सकारात्मक पहल है। यदि इन योजनाओं का ईमानदारी से क्रियान्वयन हुआ, तो भारतीय शहरों की तस्वीर बदल सकती है, लेकिन भारत का अनुभव यह भी कहता है कि किसी योजना की सफलता उसकी घोषणा में नहीं, उसके धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों में होती है।

‘स्पंज सिटी’ शब्द सुनने में आधुनिक लगता है, पर उसकी मूल अवधारणा भारतीय परंपरा से बहुत दूर नहीं है। हमारे गांवों में जोहड़ थे, बावड़ियां थीं, तालाब थे, खुले मैदान थे और खेतों की मेड़ें थीं। तब बरसात का पानी जमीन में समा जाता था। शहरों ने इन सबको विकास की राह में बाधा मान लिया। अब वही शहर करोड़ों रुपए खर्च करके कृत्रिम जलाशय और ‘रेन गार्डन’ बनाने की योजना बना रहे हैं। इसे विडंबना कहें या विकास की अधूरी समझ? समस्या केवल तकनीकी नहीं, प्रशासनिक भी है।

हर वर्ष मानसून आने से कुछ दिन पहले नालों की सफाई का अभियान शुरू होता है। कैमरों के सामने कचरा निकलता है, प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। कुछ दिनों बाद पहली तेज बारिश सारी तैयारियों की पोल खोल देती है। यदि जल निकासी व्यवस्था बारह महीने की जिम्मेदारी न होकर केवल मानसून पूर्व औपचारिकता बनी रहेगी, तो स्थिति नहीं बदलेगी।

नगर निकायों की जवाबदेही तय किए बिना इस संकट का समाधान संभव नहीं है। किसी शहर में यदि हर वर्ष वही सड़कें डूबती हैं, वही अंडरपास जलमग्न होते हैं और वही इलाके जलभराव का शिकार होते हैं, तो इसे प्राकृतिक आपदा नहीं कहा जा सकता। यह प्रशासनिक विफलता है। दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां जिम्मेदारी तय करने की संस्कृति अभी भी कमजोर है। बारिश समाप्त होते ही फाइलें भी सूख जाती हैं और अगले मानसून तक सब कुछ भुला दिया जाता है।

समाज भी इस विफलता से पूरी तरह मुक्त नहीं है। नालियों में प्लास्टिक फेंकना, जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण करना, वर्षा जल संचयन की व्यवस्था न बनाना और सार्वजनिक स्थानों को कूड़ाघर में बदल देना भी जलभराव को आमंत्रित करता है। शहरों की देखरेख सरकार करती है, लेकिन नागरिकों की भी जिम्मेदारी बनती है। सबका अपना दायित्व है।

मुंबई, चेन्नई, बंगलुरु, कोलकाता और गुवाहाटी जैसे शहर वर्षों से इस मौसम में बाढ़ की मार झेल रहे हैं। राजस्थान जैसे अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले प्रदेश में भी जयपुर, जोधपुर और कोटा में कुछ घंटों की बारिश के बाद सड़कों का डूब जाना बताता है कि समस्या केवल बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि शहरी नियोजन की गुणवत्ता है। दूसरी ओर इंदौर, सूरत और कुछ अन्य शहरों ने यह संकेत भी दिया है कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो सुधार असंभव नहीं है।

यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2030 तक भारत पूरी तरह जलभराव मुक्त हो जाएगा। इतना बड़ा दावा तभी विश्वसनीय होगा, जब शहरों के मास्टर प्लान में प्राकृतिक जल निकासी को प्राथमिकता मिले, अवैध अतिक्रमण हटें, प्रत्येक नए भवन में वर्षा जल संचय अनिवार्य रूप से लागू हो, नालों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्निर्माण हो और शहरी विकास का हर निर्णय जल विज्ञान को ध्यान में रख कर लिया जाए। केवल योजनाओं के नाम बदलने या नई समय-सीमा घोषित करने से शहर नहीं बदलते। दरअसल, जलभराव का संकट हमें विकास की एक बड़ी भूल की याद दिलाता है। हमने शहरों को रहने योग्य बनाने के बजाय केवल फैलाने का प्रयास किया। भारत को यदि सचमुच विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे अपने शहरों को पानी से लड़ना नहीं, पानी के साथ जीना सिखाना होगा।

यह प्रश्न केवल जलभराव का नहीं, शासन की प्राथमिकताओं और विकास की दिशा का है। जिस देश ने सदियों पहले तालाबों, बावड़ियों, जोहड़ों और जलमार्गों की ऐसी परंपरा विकसित की थी, वही आज बारिश की कुछ घंटों की मार से पंगु हो जाता है। यह विडंबना किसी प्राकृतिक अभिशाप की नहीं, बल्कि नियोजन की भूलों की कहानी है। शहरों को स्मार्ट बनाने की होड़ में उन्हें संवेदनशील बनाना हम भूल गए। विकास तब तक अधूरा रहेगा, जब तक वह प्रकृति के साथ संवाद करना नहीं सीखता।

यदि अमृत 2.0, ‘स्पंज सिटी’ और वर्षा जल संचयन जैसी पहलें कागज से निकल कर ईमानदारी से जमीन पर उतरती हैं, तो आने वाले वर्षों में तस्वीर बदल सकती है, लेकिन यदि अतिक्रमण, लापरवाही और जवाबदेही का अभाव यों ही बना रहा, तो हर मानसून नई घोषणाएं करेगा और हर बरसात पुराने जख्म हरे करेगी। आखिर बारिश कब तक बेगुनाह होकर भी कठघरे में खड़ी रहेगी?