भारतीय स्त्री का बिंब जो जीवन के यथार्थ से लेकर साहित्य में चित्रित होता रहा है, उसमें शक्ति के पूजन से लेकर मुक्तिवाहिनी तक की तस्वीर उभरती है। बदलते भारत में महिला, उसकी योग्यता और शक्ति एक बिल्कुल अलग वजूद रखती है, मगर उसे पुरुष वर्चस्ववादी समाज में आज भी समान अधिकार के साथ जगह नहीं मिल पाई है। महिलाओं ने जीवन के हर क्षेत्र में अपने आप को सिद्ध किया है, फिर भी पूर्वाग्रह से ग्रसित दृष्टि उन्हें पुरुषों के बराबर खड़ा होने में कई तरह की रुकावटें पैदा करती है। महिलाओं के अपहरण, बलात्कार और घरेलू हिंसा की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं।
विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अस्पतालों एवं स्वास्थ्य केंद्रों से गायब होने वाले बच्चों में लड़कों के बजाय लड़कियों की संख्या अधिक है, क्योंकि बाद में उन्हें देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। देश में हाल के वर्षों में स्त्री को उसका हक देने की बातें विभिन्न स्तरों पर जोर-शोर से की जा रही हैं। कहा जाता है कि महिलाओं ने शिक्षा के क्षेत्र से लेकर खेल के मैदान और प्रशासनिक व्यवस्था में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है, इसके बावजूद अधिकारों के मामले में ये आज भी पिछड़ी हुई हैं। प्रशस्ति और उपेक्षा का यह एक अजब संगम कई सवाल खड़े करता है।
हाल ही में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया गया। इस विधेयक में विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण और परिसीमन के जरिए लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। मगर इस विधेयक को सदन का जरूरी दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाने से यह पारित नहीं हो पाया। इसके लिए अब सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन असल में हुआ वही, जो पहले से होता आया है।
महिलाओं को विधायिका में आरक्षण से संबंधित नारी शक्ति वंदन अधिनियम वर्ष 2023 में संसद में पारित किया गया था, तब से लेकर वह लागू होने की बाट जोह रहा था। यानी राजनीति में महिलाओं को उचित भागीदारी देने का अधिकार खुद सियासत में ही उलझकर रह गया है। जब संसद में पहली बार यह विधेयक पेश किया गया था, तो इसे एक ऐसा असाधारण और प्रगतिशील कदम माना जा रहा था, जिसके जरिए सदियों से की जा रही महिलाओं की उपेक्षा को खत्म करने की राह खुल जाती। हालांकि तब यह विधेयक संसद में पारित भी हो गया, लेकिन अब करीब तीन वर्ष बाद इसे संशोधित रूप में पेश किया गया, जिसका हासिल शून्य रहा।
सत्तापक्ष की ओर से कहा जा रहा है कि अगर नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन आयोग की रपट का इंतजार किया जाता, तो वर्ष 2029 में अगले लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए तैंतीस फीसदी आरक्षण का प्रावधान लागू कर पाना संभव नहीं था, इसलिए सरकार की ओर से संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लाया गया। मगर विपक्ष के अपने सवाल और आपत्तियां हैं, जिन पर आगे भी बहस जारी रहेगी। लेकिन असल मुद्दा यह है कि वर्तमान में देश के कुल मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है और इस लिहाज से जब तक विधायिका में उनकी भागीदारी नहीं बढ़ाई जाती है, तब तक राष्ट्र के समावेशी विकास का संकल्प भी अधूरा ही रहेगा।
यह भारतीय राजनीतिक की एक अजब विसंगति रही है कि स्थानीय निकायों के चुनावों में तो महिलाओं को आरक्षण का अधिकार वर्षों पहले मिल गया था, लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनका यह हक आज भी सियासत के दांवपेच में फंसा हुआ है, जिस कारण देश की राजनीति में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या महिलाओं के लिए सिर्फ विधायिका और स्थानीय निकायों में आरक्षण का प्रावधान किए जाने से राष्ट्र के निर्माण में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित हो पाएगी? क्या शिक्षा एवं स्वास्थ्य से लेकर प्रशासनिक ढांचे तक में महिलाओं के लिए पर्याप्त अवसर सृजित किए जाने की जरूरत नहीं है? उच्च शिक्षा के मामले में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की औसत दर आज भी बहुत कम है। इसी तरह सरकारी महकमों में भी महिला कर्मियों की संख्या पुरुषों की तुलना में बेहद कम है। विभिन्न सर्वेक्षणों और अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं के काम करने के अवसरों में अपेक्षाकृत वृद्धि नहीं हुई है। कोरोनाकाल के दौरान नौकरी छिन जाने पर शहरों से गांवों की ओर लौटे पुरुषों को तो पुनः नौकरियां देने का अभियान चलाया गया, लेकिन महिलाएं इस मामले में भी पीछे रह गईं।
यह भी सच है कि घर के कामकाज से लेकर खेती में अहम भूमिका निभाने वाली महिलाओं के श्रम की कहीं गिनती ही नहीं हो पाती है। शहरों में लघु एवं कुटीर उद्योगों से लेकर बड़े उद्योगों में काम करने वाली महिलाओं को आज भी पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलता है और उन्हें अहम जिम्मेदारियों का काम देने से भी परहेज किया जाता है। इस तरह के पक्षपात को क्या महिलाओं के लिए अवसर के रूप में देखा जा सकता है। यहां तक कि सेना में भी नारी शक्ति को कम करके आंका जाता रहा है और उनके लिए स्थायी कमीशन से लेकर पदोन्नति के रास्ते भी अब जाकर खुले हैं। नारी शक्ति अगर यह मांग करती है कि युद्ध के अग्रिम दस्तों में उनके बल का इस्तेमाल भी उसी तरह होना चाहिए जैसे पुरुषों का होता है, तो इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
हालांकि, इसमें दोराय नहीं कि अगर स्थानीय निकायों की तर्ज पर विधायिका में भी महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू हो जाती है, तो यह महिला समाज को उचित प्रतिनिधित्व देने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। मगर, यह तभी संभव होगा, जब सभी दल अपनी राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर समाज के समावेशी उत्थान के लिए काम करेंगे। इससे महिलाओं में न केवल बढ़चढ़ कर मतदान करने का उत्साह पैदा होगा, बल्कि देश की विधानसभाओं और संसद में भी ये अपनी योग्यता और कौशल का योगदान दे सकेंगी।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो, राज्य या केंद्रीय मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी नाममात्र की है। मगर, जब महिलाएं अपने लिए आरक्षित सीटों पर चयनित होकर आगे आएंगी, तो अवश्य ही देश की राजनीति का चेहरा बदलेगा। अभी महिलाओं से जुड़े कई ऐसे मसले हैं, जिन्हें संसद और विधानसभाओं में आवाज ही नहीं मिल पाती है, और अगर कोई मसला उठाया भी जाता है, तो महिला प्रतिनिधियों की संख्या कम होने की वजह से वह शोर-शराबे में दब जाता है। इसलिए जरूरी है कि राजनीति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण के अन्य कार्यों में भी महिलाओं की उचित भागीदारी को प्राथमिकता दी जाए, ताकि उन्हें ये अधिकार मिल सकें, जिसकी वे हकदार हैं। सिर्फ घोषणाओं और नारों से महिला सशक्तीकरण नहीं होगा, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए उन्हें पूरी तरह लागू करने की हर मोर्चे पर इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
