रूस वह देश है, जहां लियो टाल्स्टाय ने ‘युद्ध और शांति’ की रचना के जरिए मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति और शांति की आकांक्षा को उजागर किया था। आज उसी धरती पर युद्ध जैसे समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध चौथे वर्ष से आगे निकल चुका है और मध्य-पूर्व में अमेरिका तथा ईरान के बीच महीनों से जारी संघर्ष ने वैश्विक अस्थिरता को और गहरा कर दिया है।

सवाल केवल यह नहीं कि युद्ध कब खत्म होंगे, बल्कि यह है कि आधुनिक दुनिया में शांति की राह लगातार इतनी कठिन क्यों होती जा रही है। सितंबर में रूस के संसदीय चुनाव के अंतिम दिन यूक्रेन ने वहां बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले किए। रूस का दावा है कि इस दौरान डेढ़ हजार से अधिक ड्रोन मार गिराए गए। हमलों में कुछ लोगों की मौत हुई और एक प्रमुख तेल प्रतिष्ठान को भी नुकसान पहुंचा।

यह हमला ऐसे समय हुआ, जब रूस में 18 से 20 सितंबर तक स्टेट ड्यूमा के चुनाव हो रहे थे। रूस की सत्तारूढ़ यूनाइटेड रशिया पार्टी ने चुनाव में स्पष्ट बहुमत हासिल किया और 450 सदस्यीय ड्यूमा में 355 सीटें जीतने का एलान किया। इन चुनावों को क्रेमलिन ने युद्ध के बीच अपने शासन और नीतियों के लिए समर्थन के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि आलोचकों और कुछ पर्यवेक्षकों ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

यहां चुनाव और युद्ध का यह संयोग एक असहज प्रश्न खड़ा करता है कि क्या लंबे समय से चल रहे युद्धों में राजनीति और सैन्य रणनीति एक-दूसरे से इतनी गहराई से जुड़ जाती हैं कि शांति की संभावना लगातार पीछे खिसकती जाती है? इसका उत्तर किसी एक देश या नेता के व्यवहार में नहीं, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में तलाशना होगा, जहां सुरक्षा, सत्ता, संसाधन और रणनीतिक हित एक-दूसरे में उलझ चुके हैं। मध्य-पूर्व की स्थिति इस जटिलता को और बढ़ाती है।

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे संघर्ष ने होर्मुज जलमार्ग को वैश्विक चिंता का केंद्र बना दिया है। यह दुनिया के महत्त्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसके आसपास तनाव बढ़ने का असर केवल युद्धरत पक्षों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि तेल, गैस, जहाजरानी, बीमा और आपूर्ति-व्यवस्था के जरिए उसका प्रभाव दूर-दूर तक पहुंचता है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थों के जरिए बातचीत भी हुई, लेकिन युद्ध समाप्त करने और होर्मुज से आवागमन सामान्य बनाने पर अभी पूर्ण सहमति नहीं बन सकी है।

युद्धों की आधुनिक त्रासदी यह है कि उनके लक्ष्य अक्सर सीमाओं से आगे निकल जाते हैं। कभी युद्ध भू-भाग पर कब्जे के लिए होते थे, अब उनमें ऊर्जा-सुरक्षा, व्यापारिक मार्ग, रणनीतिक संसाधन, आपूर्ति-शृंखला और तकनीकी वर्चस्व जैसे हित भी शामिल हो गए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर युद्ध के पीछे केवल आर्थिक स्वार्थ होता है।

राष्ट्रों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं, ऐतिहासिक विवाद और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मगर यह भी उतना ही सच है कि युद्ध जितना लंबा खिंचता है, उसके आर्थिक दुष्परिणाम भी उतने ही व्यापक होते जाते हैं। इसका बड़ा बोझ युद्धक्षेत्र से बाहर का आम नागरिक भी उठाता है। ऊर्जा के दाम बढ़ते हैं, परिवहन महंगा होता है, खाद्य वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होती हैं और सरकारी धन का बड़ा हिस्सा विकास के बजाय रक्षा और पुनर्निर्माण पर खर्च होने लगता है। युद्ध केवल सैनिकों और हथियारों को नहीं निगलता। वह अस्पताल, विद्यालय, सड़कें, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों की संभावनाओं को भी लील लेता है।

लियो टाल्स्टाय के समय में युद्ध का मैदान अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता था। आज ड्रोन, मिसाइल, साइबर हमले और लंबी दूरी के हथियार युद्ध की सीमाओं को धुंधला कर देते हैं। किसी एक देश के भीतर शुरू हुई कार्रवाई का असर कुछ ही घंटों में दूसरे महाद्वीप के बाजारों और आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है।

युद्ध अब केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाता, उसकी कीमत बाजार, बंदरगाह, ऊर्जा-मार्ग और अर्थव्यवस्था भी चुकाती है। सबसे विचित्र स्थिति तब पैदा होती है, जब युद्धरत पक्षों की भाषा में शांति और जमीन पर संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। संवाद की अपील होती है, मध्यस्थ सक्रिय होते हैं, संयुक्त राष्ट्र में बहस होती है, लेकिन दूसरी ओर सैन्य तैयारी और हमले जारी रहते हैं। अमेरिका-ईरान संघर्ष में भी एक ओर बातचीत के रास्ते तलाशे जा रहे हैं और दूसरी ओर होर्मुज जलमार्ग तथा ऊर्जा ढांचे को लेकर दबाव बना हुआ है।

यहां यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि हर युद्ध केवल नेताओं की सत्ता बचाने या हथियार बेचने की इच्छा से चलता है। ऐसे निष्कर्ष अक्सर वास्तविक भू-राजनीतिक जटिलताओं को सरल बना देते हैं। फिर भी राजनीति और युद्ध का संबंध नकारा नहीं जा सकता। चुनावी समय-सारिणी, जनमत, राष्ट्रीय सुरक्षा की राजनीति और नेतृत्व की घरेलू मजबूरियां कई बार विदेश नीति के फैसलों को प्रभावित करती हैं। अमेरिका में संभावित मध्यावधि चुनाव नवंबर में हैं और ईरान युद्ध को लेकर वहां राजनीतिक बहस तेज हो चुकी है।

विडंबना यह है कि जिन युद्धों को निर्णायक विजय के लिए शुरू किया जाता है, वे अक्सर निर्णायक अंत तक पहुंच ही नहीं पाते। एक हमला दूसरे हमले को जन्म देता है, प्रतिशोध अगली कार्रवाई का आधार बनता है और फिर बातचीत की मेज तक पहुंचना पहले से अधिक कठिन हो जाता है। इस चक्र में सबसे कमजोर आवाज उसी नागरिक की होती है, जिसके घर पर मिसाइल गिरती है, जिसकी दुकान बंद हो जाती है, जिसका बच्चा स्कूल नहीं जा पाता और जिसकी रोजमर्रा की जिंदगी महंगाई के दबाव में टूटती जाती है।

आज दुनिया को केवल युद्धविराम की नहीं, युद्ध की राजनीति से बाहर निकलने की दीर्घकालिक दृष्टि की जरूरत है। सैन्य शक्ति किसी राष्ट्र को सुरक्षा का एहसास दे सकती है, लेकिन स्थायी शांति केवल हथियारों से नहीं आती। उसके लिए संवाद, पारस्परिक सुरक्षा की गारंटी, आर्थिक सहयोग और विवादों के राजनीतिक समाधान की इच्छा चाहिए।

युद्ध का अंत केवल तब नहीं होता, जब मिसाइलें चलना बंद हो जाएं, बल्कि उस वक्त होता है, जब भय की जगह भरोसा, प्रतिशोध की जगह बातचीत और विनाश की जगह पुनर्निर्माण की राजनीति शुरू हो। वरना टाल्स्टाय की ‘युद्ध और शांति’ की रचना मौजूदा समय में सचमुच उलटकर ‘शांति की तलाश में युद्ध’ बन जाएगी और मानवता अगली पीढ़ी से पूछती रहेगी कि युद्ध खत्म क्यों नहीं होते। बहरहाल, अब देखना यह है कि दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए किस तरह के प्रयासों को आगे बढ़ाया जाता है।