पहली बात यह कहना चाहती हूं कि मैं ज्ञानेश कुमार होती तो अपना इस्तीफा देती कुछ बची-खुची इज्जत समेटने के लिए। ऐसा करते हैं अभी भी तो हंगामा बढ़ने से पहले ही रूई की बत्ती की तरह उड़ जाएगा। ऐसा करने से मोदी सरकार की भी इज्जत बच जाएगी। अच्छा होता अगर सरकार इस्तीफा मांगती ज्ञानेश कुमार का। लेकिन ऐसा करने के बदले लगातार गलती कर रहे हैं प्रधानमंत्री के समर्थक।

पहली गलती है कि चुनाव आयोग की तरफदारी करने के लिए भाजपा के प्रवक्ता सामने आए। जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी पत्रकारिता से सारा देश जान गया कि चुनाव आयोग में मतभेद थे तो भाजपा के प्रवक्ता दिखे ज्ञानेश कुमार के कवच बनते। ऐसा करके साबित किया कि ज्ञानेश उनका अपना बंदा है। चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। जब इसका कवच कोई एक राजनीतिक दल बन जाता है, तो बदनाम होता है।

दूसरी गलती जो इन प्रवक्ताओं ने की, वह यह थी कि चुनाव आयुक्त को बचाने के लिए उन्होंने इतिहास के सारे पन्ने खोले, इस चीज को साबित करने के लिए कि पहले भी चुनाव आयुक्त ऐसे रहे हैं, जिनका रिश्ता किसी एक राजनीतिक दल से करीबी रहा है। यह बात सच है। मैंने खुद निंदा की थी जब एमएस गिल को राज्यसभा की सदस्यता दी थी कांग्रेस ने और उन्हें मंत्री भी बनाया था। मैंने इससे भी ज्यादा निंदा की जब संजय गांधी के दोस्त नवीन चावला को सोनिया गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया। चावला की भूमिका आपातकाल में इतनी बुरी थी कि काफी दिन के लिए उन्हें किसी भी पद पर नियुक्त नहीं किया गया।

इतिहास के विवादों से आगे वर्तमान की जवाबदेही

चुनाव आयोग का सबसे खराब वक्त वह था, जब उसने सरकार के कहने पर कश्मीर में दशकों तक जाली वोट डलवाकर कांग्रेस को जिताया। झूठे थे तकरीबन सारे चुनाव उस राज्य में कोई बीस साल तक और नतीजा यह हुआ कि आम कश्मीरी का लोकतंत्र में विश्वास कम होता गया। इसलिए ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग की भूमिका अतीत में कोई इतनी अच्छी रही हो, लेकिन जब भाजपा के प्रवक्ता अहंकारी अंदाज में टीवी पर आकर इतिहास के पुराने पन्ने खोलकर याद दिलाते हैं तो थके, हारे से दिखते हैं। इतिहास के बदले उनको बातें करनी चाहिए वर्तमान की। हम भी थक गए नेहरू और गांधी परिवार की बुराइयां सुनते-सुनते।

ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दिए होते अभी तक तो राहुल गांधी का संवाददाता सम्मेलन नहीं होता और न ही काकरोच जनता पार्टी (काजपा) के नेता सामने आए होते इस्तीफा मांगने। राहुल गांधी ने संवाददाता सम्मेलन में एक रील दिखाई, जिसमें मोदी और शाह दिखते हैं बार-बार कहते हुए कि भाजपा अगले सत्तर साल राज करेगी। रील में दिखे मोदी अहंकारी अंदाज में कहते हुए ‘अबकी बार, चार सौ पार’। इसके बाद राहुल गांधी ने कहा कि जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं तो ‘सत्ता विरोधी लहर’ नाम की कोई चीज नहीं दिख रही है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। उदाहरण दिया उन्होंने अपनी दादी का, जिन्होंने बांग्लादेश की जंग जीती, लेकिन इसके दो साल बाद ही देश भर में उनका विरोध होने लगा।

आरोप यह था कि चुनाव आयोग की बेईमानी के कारण ही मोदी बार-बार जीते हैं बावजूद सरकार की तमाम गलतियों के। यहां याद दिलाना चाहती हूं मैं कि मोदी नोटबंदी के बाद जीते बावजूद इसके कि जनता को नोटबंदी से बहुत तकलीफ हुई थी। बुजुर्ग लोग कई-कई घंटे बैंकों के बाहर खड़े रहे थे कई-कई दिन सिर्फ अपने नोट बदलवाने के लिए। देहातों में मैं खुद कई महिलाओं से मिली थी जिन्होंने रोते-रोते बताया कि उनके सारे पैसे बेकार हो गए क्योंकि उन्होंने चुपके से बचाकर रखे थे अपने पतियों की नजरों से। इसके बाद याद कीजिए कि कोरोना के सबसे डरावने दौर में जब गंगा में लाशें बहती दिखी थीं उत्तर प्रदेश में। फिर भी योगी आदित्यनाथ दूसरी बार जीते।

मतदाता अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर बढ़ते सवाल

सच यह भी है कि जब से एसआइआर की प्रक्रिया शुरू हुई है कई ऐसे लोग हटाए गए हैं मतदाताओं की सूची से जिनको पूरा अधिकार होना चाहिए वोट करने का। बंगाल में जितने लोग हटाए थे सूची से उन्होंने जब दलील लेकर अदालतों के दरवाजे खटकाए तो उन्हें अपना अधिकार मिल गया, लेकिन तब तक चुनाव हो चुका था और भाजपा की सरकार बन गई थी। इतने सारे किस्से हैं ऐसे लोगों के जो मृत घोषित होने के बाद जीवित मिले हैं कि चुनाव प्रक्रिया पर शक होने लगा है कई आम लोगों को। शक बहुत पहले से ईवीएम में गड़बड़ी का भी रहा है। ऐसे में जब मुख्य चुनाव आयुक्त इतने बड़े खुलासे के बाद चिपके रहते हैं अपनी कुर्सी से तो यह न उनके लिए अच्छा है और न प्रधानमंत्री के लिए।

वैसे भी प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान हुआ है काफी जबसे काजपा के प्रदर्शन शुरू हुए हैं और उनकी ‘स्कूल ठीक करो’ मुहिम शुरू हुई है। अब उनकी तरफ से भी एलान आया है कि ज्ञानेश कुमार अगर इस्तीफा नहीं देते तो उनके प्रदर्शन फिर शुरू होंगे पूरे देश में। ऐसा होता है अगर तो सरकार का हाल और भी कमजोर हो जाएगा। इसलिए जैसे मैंने इस लेख के शुरू में कहा उसको दोहराती हूं। मैं अगर ज्ञानेश कुमार की जगह होती तो अपनी इज्जत और देश की इज्जत कायम रखने के लिए अपना इस्तीफा जरूर दे देती।