भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश की विशाल जनसंख्या, बढ़ती क्रय क्षमता, डिजिटल विस्तार और उपभोक्तावादी संस्कृति ने भारतीय खुदरा बाजार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक यह बाजार दोगुनी क्षमता हासिल कर लेगा। दुनिया की सभी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें भारत के इसी विशाल उपभोक्ता बाजार पर टिकी हुई हैं।

इसके साथ देश में ऑनलाइन व्यापार का भी तेजी से विस्तार हो रहा है। प्रतिवर्ष लगभग 19 फीसद की दर से बढ़ता ई-वाणिज्य क्षेत्र आज भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। वर्ष 2024 में भारत ने अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ई-वाणिज्य बाजार बनने का दर्जा हासिल किया। पिछले वर्ष देश का ऑनलाइन खुदरा व्यापार लगभग 65 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें करीब तीस करोड़ सक्रिय उपभोक्ता रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह आंकड़ा 190 अरब डॉलर का होगा।

देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग दस फीसद का योगदान देने वाला खुदरा व्यापार न केवल अर्थव्यवस्था की गति तय करता है, बल्कि महंगाई और मुद्रास्फीति के आंकड़ों को भी सीधे प्रभावित करता है। विडंबना यह है कि इतने विशाल और प्रभावशाली बाजार में वस्तुओं के मूल्य निर्धारण पर सरकार का कोई प्रभावी नियंत्रण दिखाई नहीं देता। बाजार में अधिकांश वस्तुओं की कीमत निर्माता स्वयं तय करता है और उपभोक्ता के पास उसे स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। वर्ष 2013 में बाजार आधारित मूल्य निर्धारण व्यवस्था को व्यापक रूप से लागू किया गया। सरकार ने वस्तुओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित करना अनिवार्य तो कर दिया, लेकिन यह तय करने की कोई वैज्ञानिक और पारदर्शी प्रक्रिया निर्धारित नहीं की कि किसी वस्तु की कीमत किस आधार पर तय होगी।

परिणामस्वरूप मूल्य निर्धारण का पूरा अधिकार निर्माता कंपनियों के हाथों में चला गया। निर्माता उत्पादन लागत, बाजार की मांग, प्रतिस्पर्धा, विज्ञापन खर्च, वितरण शृंखला, कमीशन और अपेक्षित मुनाफे को जोड़कर अपनी सुविधा अनुसार अधिकतम खुदरा मूल्य तय कर देते हैं। ‘लीगल मेट्रोलॉजी अधिनियम’ और ‘पैकेज्ड कमोडिटी नियम’ केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि अधिकतम खुदरा मूल्य से अधिक कीमत वसूलना अपराध माना जाए, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह मूल्य तय करने का वास्तविक आधार क्या होगा।

इसी सबसे बड़ी खामी ने उपभोक्ता संरक्षण की भारतीय अवधारणा को कमजोर किया है। स्थिति यह है कि ग्राहक को केवल पैकेट पर अंकित कीमत दिखाई जाती है, जबकि उस वस्तु की वास्तविक उत्पादन लागत उससे कई गुना कम हो सकती है। उपभोक्ता संरक्षण कानून ग्राहक को केवल मोलभाव का अधिकार देता है, लेकिन जब ग्राहक को वस्तु की वास्तविक लागत ही ज्ञात नहीं हो, तब मोलभाव का औचित्य मात्र औपचारिकता ही है।

देश की अधिकतम खुदरा मूल्य व्यवस्था उपभोक्ता हित के बजाय कंपनियों और मुनाफाखोर व्यापारिक तंत्र को संरक्षित करती प्रतीत होती है। अनेक उत्पादों में अधिकतम खुदरा मूल्य उत्पादन लागत से कई गुना अधिक रखा जाता है। जहां प्रतिस्पर्धा कम होती है या विकल्प सीमित होते हैं, वहां निर्माता उपभोक्ताओं से मनमाना मूल्य वसूलते हैं। किसी क्रीम, फेसवॉश या कॉस्मेटिक उत्पाद की कीमत उसके वास्तविक गुणों से अधिक उसके विज्ञापन पर निर्भर करती है।

करोड़ों रुपए के प्रचार अभियान उपभोक्ताओं की मानसिकता को प्रभावित करते हैं और उत्पाद का मूल्य कृत्रिम रूप से कई गुना बढ़ा दिया जाता है। दवा बाजार की स्थिति भी चिंताजनक है। सरकार ने कभी सस्ती चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा दिया था, लेकिन आज वही क्षेत्र मूल्य निर्धारण की सबसे बड़ी विसंगति का प्रतीक बन गया है।

यह एक अपवाद नहीं, बल्कि भारतीय दवा बाजार की वास्तविकता है। मरीज चिकित्सक के लिखे पर्चे के साथ पहली दुकान पर पहुंचता है, तो उसे वह जेनेरिक दवा अधिकतम खुदरा मूल्य या मामूली छूट के साथ दी जाती है। मगर वही मरीज जब अलग-अलग दुकानों पर कीमत की जानकारी लेता है, तो उसी ब्रांड की वही जेनेरिक दवा दस गुना कम कीमत पर भी उपलब्ध हो जाती है।

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण सूची में केवल कुछ गंभीर बीमारियों की दवाओं को ही मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा गया है। शेष दवाओं की कीमतें पूरी तरह कंपनियों और वितरकों की इच्छा पर निर्भर हैं। मरीजों से वसूली जाने वाली राशि में वास्तविक दवा लागत से अधिक कमीशन, ब्रांडिंग और व्यापारिक लाभ शामिल होते हैं। चिकित्सा उपकरणों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। आंखों में लगाए जाने वाले लेंस, हृदय रोग में प्रयुक्त स्टेंट और अन्य चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी असमानता दिखाई देती है।

ऑनलाइन बाजार ने मूल्य निर्धारण की विसंगतियों को और अधिक जटिल बना दिया है। उपभोक्ता को आकर्षित करने के लिए ‘एक के साथ एक मुफ्त’, ‘अविश्वसनीय छूट’, ‘क्रेडिट कार्ड ऑफर’ और ‘कैशबैक’ जैसे प्रलोभनों का सहारा लिया जाता है। एक ही वस्तु अलग-अलग भुगतान माध्यमों पर अलग-अलग कीमतों में उपलब्ध कराई जाती है। यह व्यवस्था न केवल उपभोक्ता के साथ भेदभाव है, बल्कि उसे अतिरिक्त बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं से जुड़ने के लिए भी बाध्य करती है। विदेशी ब्रांडों को भारतीय बाजार में कई गुना अधिक कीमत पर बेचा जाता है। विडंबना यह है कि खुले बाजार में इन्हीं ब्रांडों के नाम पर नकली उत्पादों की भरमार है। महामारी से लेकर युद्ध से उपजे संकट तक में बाजार में मुनाफाखोरी बढ़ती है। मूल्य नियंत्रण की प्रभावी नीति के अभाव में उपभोक्ता महंगाई का शिकार होता रहा है।

सेवा क्षेत्र में भी यही स्थिति दिखाई देती है। विमान कंपनियां मांग के अनुसार टिकटों की कीमतें बदलती रहती हैं। बीमा कंपनियां जोखिम और बाजार परिस्थिति के आधार पर प्रीमियम तय करती हैं। होटल, परिवहन और डिजिटल सेवाओं में भी ‘डायनामिक प्राइसिंग’ के नाम पर उपभोक्ता से अधिकतम वसूली की जाती है। इससे साफ है कि देश में बढ़ती महंगाई के पीछे केवल उत्पादन लागत में वृद्धि जिम्मेदार नहीं है, बल्कि वस्तुओं और सेवाओं का अनियंत्रित तथा मनमाना मूल्य निर्धारण भी एक बड़ा कारण है।

यह समय की मांग है कि सरकार मूल्य निर्धारण में लागत आधारित पारदर्शी नीति तैयार करे। किसी भी वस्तु का अधिकतम विक्रय मूल्य उसके वास्तविक उत्पादन खर्च, कर, परिवहन और सीमित लाभांश के आधार पर तय होना चाहिए, न कि केवल बाजार की मांग और उपभोक्ता की मजबूरी के आधार पर। देश में आवश्यक वस्तुओं, दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, शिक्षा सामग्री और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए स्वतंत्र मूल्य तय करने के वास्ते मूल्य निर्धारण आयोग का गठन किया जा सकता है। उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार मिलना चाहिए कि जिस वस्तु के लिए वह भुगतान कर रहा है, उसकी वास्तविक लागत क्या है और उस पर कितना लाभ जोड़ा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बाजार का उद्देश्य केवल व्यापारिक लाभ नहीं, बल्कि उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना भी होना चाहिए।

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देश भर में कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ गए हैं। दिल्ली में 19 किलो वाला कॉमर्शियल सिलेंडर 42 रुपए महंगा हो गया है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। इस ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में 1 जून से कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत बढ़कर 3,113.50 रुपये हो गयी है। कोलकाता में 19 किलोग्राम के कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 53.5 रुपये की बढ़ोतरी हुई है और अब यह 3,255.5 रुपये का हो गया है। इसके अलावा, दिल्ली में 5 किलोग्राम के फ्री ट्रेड एलपीजी (एफटीएल) सिलेंडर की कीमत में 11 रुपये की बढ़ोतरी हुई है और अब इसकी कीमत 821.5 रुपये हो गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक