‘किनारे पर चुपचाप खड़े रहने से बेहतर है, अपने लिए एक नई दुनिया की राह ढूंढ़ते हुए, दस बार लहरों में डूबकर मर जाना।’ यह आधुनिक नर्सिंग आंदोलन की अगुआई करने वाली ‘लेडी विद द लैंप’ फ्लोरेंस नाइटिंगेल का विचार है। इसे यों समझा जा सकता है कि जीवन में आगे बढ़ना चाहते हो, तो बहरे बन जाओ, क्योंकि आसपास के ज्यादातर लोगों की बातें और सुझाव मनोबल गिराने वाले होते हैं। इसलिए हमेशा अपने अंदर की आवाज को सुनो।
वहीं से प्रगति का मार्ग शुरू होता है। और फिर, हर किसी में अनंत संभावनाएं हैं। जो आज इतिहास हो गए हैं, वे भी कभी इसी संभावना के अंश रह चुके हैं। बेशक तमाम कोशिशों के बावजूद हार मिले, लेकिन जुटने और जूझने से मुंह न फेरना जरूरी है। इसलिए जीवन को एक विराट खेल की तरह जीना चाहिए। फर्क नहीं पड़ता कि कोई हारे, या कोई जीते। क्योंकि बिना एक के हारे दूसरे की जीत मुमकिन नहीं है।
कभी फुरसत मिलने पर नन्ही-सी चींटी को टकटकी लगा कर गौर से देखना चाहिए। चींटी अपने से कई गुना बड़ा पत्ता घसीटते इधर से उधर जाती दिख जाएगी। उसे अपने सफर में तमाम रुकावटों का सामना करना पड़ेगा। वह रुकेगी, रास्ता बदलेगी, फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाएगी। अगर उसके रास्ते जमीन पर कोई दरार आ गई, तो वह क्षण भर रुक जाएगी।
परिस्थिति का भली-भांति जायजा लेगी, फिर पत्ते को दरार के ऊपर टिका देगी। और खुद धीरे-धीरे पत्ते के ऊपर से गुजर जाएगी। दूसरी तरफ पहुंच कर फिर से पत्ता घसीटने लगेगी, और अपना सफर जारी रखेगी। चींटियां रोज-रोज और बार-बार जाहिर करती हैं कि दरारें कभी बड़ी नहीं होतीं, उन्हें पाटने वाले बड़े होते हैं।
निहायत छोटे जीव की इतनी बड़ी कोशिश सृष्टि के चमत्कार पर चिंतन करने के लिए विवश कर देती है। नन्हे से नन्हा प्राणी भी विश्लेषण, चिंतन और तर्क खोज कर, आने वाली चुनौतियों पर विजय पाने और प्रश्नों के हल की तरकीब खोजने के लिए कितना सक्षम है, लेकिन यहीं अंतिम पड़ाव पर आकर चींटी की कमजोरी उजागर हो जाती है। चींटी उस बड़े पत्ते को, रास्ते की कड़ी मेहनत-मशक्कत और कार्यकुशलता से अपने गंतव्य यानी बारीक छेद तक तो ले गई, लेकिन उसे छेद के अंदर घुसाने में असमर्थ रह जाती है।
कोई रास्ता न सूझता, तो बेचारी पत्ते को वहीं छोड़ कर, खाली हाथ अपने घर में घुस जाती है। सच है कि चींटी ने अपनी यात्रा शुरू करने से पहले नतीजे के बारे में नहीं सोचा होगा। वरना वह पहले बिंदु से ही ऐसा न करती। बेशक पत्ता उसके लिए पूरे सफर का सिर्फ बोझ बन कर रह गया। यही जीवन की बड़ी सीख है- जिंदगी का हर मुकाम इंसान की मर्जी का नहीं होता- कभी वक्त रास्ता चुनता है, तो कभी हालात मंजिल बदल देते हैं।
कहा भी जाता है कि जिंदगी की परीक्षा सबसे ज्यादा वफादार होती है, क्योंकि इसका प्रश्नपत्र कभी लीक नहीं होता। हर इंसान अपने घर-परिवार और नौकरी-कारोबार की फिक्र में हरदम डूबा रहता है। इसी उधेड़बुन में कि कहां रहना है, कौन-सी गाड़ी खरीदनी है, कैसे कपड़े पहनने हैं, कौन-से गैजेट नए लेने हैं या उन्हें अद्यतन कराना है!
उसके अंतिम पड़ाव पर पहुंचते-पहुंचते तमाम सांसारिक चीजें छूट जाती हैं, या छोड़नी पड़ जाती हैं। जानते-बूझते भी सफर में ढोते-ढोते अहसास ही नहीं रहता और अनजान बने रहते हैं। इसलिए सभी तमाम बोझ ताउम्र ढोते रहते हैं। अंतिम वक्त पर ही जान पाते हैं कि तमाम तामझाम को साथ ले जा नहीं सकते और बेकार में ढोते रहे हैं। जब होश आता है, तब तक इन्हें ढोते-ढोते सारी उम्र निकल चुकी होती है।
सयाने समझाते आए हैं कि जो हमारे पास है, उसका भरपूर आनंद लिया जाए, अपने रिश्तों को सहेजा जाए, उनसे प्यार किया जाए। जीवन कुदरत की छोटी-छोटी नियामतों को निहारने और स्पर्श करने और आनंदित होने के लिए है, न कि पद तथा शक्ति की अंधदौड़ में अनजाने में जीवन आनंद को खोने के लिए है। आने वाले दिनों की चिंता छोड़कर वर्तमान को खुल कर जीना चाहिए। इसे खेल की तरह खेल लेना चाहिए, हां, इसमें भटक नहीं जाना चाहिए और न ही इसे अति गंभीरता से लेना चाहिए। ओशो कहते हैं, ‘जीत और हार मायने नहीं रखती। मायने यह रखता है कि इंसान ने जीवन को सचमुच गहराई से जिया, या उसे केवल काट लिया।’
जब तक इंसान को कहीं पहुंचने का राग है, जब तक कुछ पाने का राग है, तब तक मन अचंचल नहीं हो सकता, चंचल रहेगा। इसमें मन का क्या कसूर है? हम राग कर रहे हैं, मन दौड़ रहा है। विचारक जोनाथन मार्टेसन के शब्द हैं कि ‘भावनाएं लहरों की तरह होती हैं। आप उन्हें आने से रोक नहीं सकते, लेकिन आप यह चुन सकते हैं कि किन लहरों की सवारी करनी है।’ दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जीवन एक चक्रव्यूह ही है। इस तथ्य को जानते-समझते अपनी ऊर्जा को खत्म करने से बेहतर है, इसका उपयोग आनंद ढूंढ़ने में लगाया जाए। वरना जीवन आनंद छूट जाएगा, क्योंकि जीवन का अंत हो जाता है, चाहतों का नहीं।
