तकनीक के विकास के साथ-साथ मानवीय मूल्य और संवेदनाएं कमजोर होती जा रही हैं। इससे सामाजिक संबंधों के समक्ष विश्वास का संकट पैदा हो गया है। मानवीय मूल्य वे मूलभूत नैतिक मानक एवं सिद्धांत होते हैं, जो हमारे आचरण को दिशा देते हैं, जबकि संवेदनाएं दूसरों के सुख-दुख को महसूस करने की क्षमता हैं। ये दोनों मिलकर व्यक्ति को सामाजिक रूप से जिम्मेदार इंसान बनाते हैं।

मगर जब मनुष्य की सोच से ये दोनों तत्त्व गायब हो जाएं, तो सभ्य समाज का आधार भी निर्बल हो जाता है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाएं भी इसी का नतीजा है। घरेलू हिंसा को तो समाज में कई बार सामान्य घटना के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि सख्त कानून होने के बावजूद इस तरह की घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

कई बार यौन दुर्व्यवहार के मामलों में दोषी को न्याय के कठघरे में लाने के बजाय समाज पीड़िता के पहनावे, रहन-सहन या आचरण को दोषी ठहराने लगता है। इससे ऐसा लगता है कि पितृसत्तात्मक समाज अपराधी को बचाने और महिलाओं को प्रताड़ित करने का समर्थन कर रहा है। स्त्रीवादी कैथरीन मैककिनन का मानना है कि बलात्कार पुरुष शक्ति और प्रभुत्व का एक चरम रूप है। इसके जरिए महिलाओं को डराकर और नियंत्रित करके रखा जाता है।

हाल की कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि अपराधियों की मानसिकता किस हद तक विकृत होती जा रही है। राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक बच्ची का अपहरण कर पांच दिन तक बत्तीस लोगों ने उससे बलात्कार किया। पश्चिम बंगाल के बुरुईपुरा में एक बच्ची से सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई।

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक लड़की और हरदोई में एक बच्ची से बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। सवाल है कि क्या इन बच्चियों के साथ हुई यौन हिंसा के लिए भी उनके कपड़ों, व्यवहार और चाल-चलन को दोषी ठहराया जाएगा?

यह सच है कि पहले की तुलना में महिलाओं को अब अनेक अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें अपने अस्तित्व और अस्मिता की सुरक्षा का अधिकार अभी तक नहीं मिल पाया है। आए दिन सड़कों, ट्रेनों, बसों, घरों, खेतों और दफ्तरों में लड़कियों एवं महिलाओं को वह सब झेलना पड़ता है, जो अनैतिक और गैर-कानूनी है। फिर भी यह सब खुलेआम हो रहा है, जैसे उसे सामाजिक वैधता प्राप्त हो। सरकार की ओर से नए कानून बनाए जाते हैं या पहले से बने कानूनों में संशोधन किया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि इन्हें सख्ती से लागू करने की जिम्मेदारी किसकी है? जांच प्रक्रिया इतनी धीमी और लापरवाही भरी होती है कि कई मामलों में पीड़िता को न्याय मिल ही नहीं पाता है और अगर कहीं न्याय मिलता भी है, तो उसके लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है।

महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित कार्यशालाओं और बौद्धिक चर्चाओं में कई तरह की सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती रही हैं। जैसे- गाड़ी में बैठने से पहले पिछली सीट पर देख लें, मोबाइल फोन में हेल्पलाइन नंबर रखें, रात में बाहर न निकलें, सोते समय सभी खिड़कियां बंद कर लें, अनजान लोगों से खाने-पीने की कोई वस्तु न लें, मिर्च स्प्रे साथ रखें, काम से घर जाते समय अपना रास्ता बदलते रहें और कोई संदेह होने पर तत्काल पुलिस को सूचित करें। सवाल है कि ये सावधानियां बच्चों और किशोरियों को कैसे सिखाई जाएं। और क्या संभावित समस्याओं का हल केवल यही है कि लड़कियों एवं महिलाओं को ही सावधान रहना होगा। क्या वास्तव में इन सब सावधानियों से यौन हिंसा की घटनाएं रुक जाएंगी?

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि किसी भी देश की स्थिति वहां की महिलाओं की स्थिति को देखकर ज्ञात की जा सकती है। यदि इस तर्क को सही माना जाए, तो फिर इस दावे के क्या मायने रह जाते हैं कि भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की पंक्ति में खड़ा है। जिस देश की आधी आबादी को यौन शोषण, घरेलू हिंसा, तेजाब हमले और दहेज के लिए हत्या जैसी अमानवीय घटनाओं का दंश झेलना पड़ रहा हो, उस देश की स्थिति क्या होगी, यह बताने की जरूरत नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने या महिला सशक्तीकरण का उद्घोष करने से ही अगर उनकी स्थिति में बदलाव लाया जा सकता, तो अब तक यह सब हो चुका होता। दरअसल, सवाल यहां महिला सशक्तीकरण का है ही नहीं, उन्हें मजबूत या सशक्त बनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे पहले से ही मजबूत हैं। जरूरत है समाज में महिलाओं की ताकत का आकलन करने के नजरिए को बदलने की। अगर पुरुष समाज महिलाओं के प्रति अपने नजरिए को बदल ले, तो समस्या अपने आप समाप्त हो जाएगी।

सवाल है कि क्या बलात्कार को सामूहिक आतंकवाद की संज्ञा दी जा सकती है? आतंकवाद में भी भय उत्पन्न करके दूसरों के व्यवहार पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया जाता है और बलात्कार में भी महिलाओं के व्यवहार को नियंत्रित कर उन पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की कोशिश की जाती है। पहले के समय में बलात्कार की अधिकतर घटनाओं के लिए अपरिचित या अजनबी दोषी होता था, लेकिन अब परिवार, दोस्त और रिश्तेदारी के दायरे में भी महिलाएं यौन उत्पीड़न की शिकार हो रही हैं।

असल में महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा तभी मिलेगा, जब उन्हें पुरुषों के समान सारे अधिकार मिलेंगे। लैंगिक समानता आधारित समाज वह होता है, जहां हर कोई जैसा है, वैसा रह सके। इसलिए जरूरत इस बात की है कि देश की न्यायिक और सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव किया जाए तथा महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर स्तर पर गंभीरता से प्रयास किए जाएं।