ग्रेगर साम्सा सुबह उठ कर खुद को एक विशाल कीट में बदला हुआ पाता है। मूल जर्मन रचना में फ्रैंज काफ्का ने इस कीट को कोई नाम नहीं दिया है। जर्मन के भावानुवाद में उसे घृणित कीट ही कहा जा सकता है। दावा किया जाता है कि काफ्का ने अपने प्रकाशक से अनुरोध किया था कि किताब के आवरण पर उस कीट की कोई छविगत पहचान नहीं दी जाए। रचनाकार ने कीट की पहचान को पाठकों की रचनात्मकता के भरोसे छोड़ दिया। काफ्का को अंदाजा नहीं था कि कभी किसी देश की अदालत में बहस के दौरान इस कीट को ऐसी पहचान दी जाएगी कि हर तरफ काकरोच की तस्वीर छा जाएगी। सत्ता द्वारा अकेले छोड़ दिए गए लोग, बीमार, असहाय, अशिक्षित, शिक्षित बेरोजगारों को काकरोच की एक सामूहिक पहचान मिल जाएगी। आज के संदर्भ में खास कर वैसे लोग जो सवाल उठाते हैं, चाहे वे नार्वे की पत्रकार हो या बारहवीं का सीबीएसई का विद्यार्थी, सबको घृणित कीट की तरह ही देखा जा रहा है। सत्ता और समाज में सवालों के अकेलेपन, असहायता और उन पर हो रहे आक्रमण के संदर्भ में बेबाक बोल

पाकिस्तानी भी सीबीएसई की परीक्षा देते हैं? यह सवाल दाग दिया गया एक बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी पर। सवाल दागने वाले देश की सरकारी संस्था के ‘एंकर’ हैं। अभी नीट परीक्षा में पर्चा लीक का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि बारहवीं की परीक्षा में सीबीएसई की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ गए। लेकिन जिन लोगों को सीबीएसई और उससे जुड़े महकमे पर सवाल उठाना शुरू कर देना चाहिए था, उन्होंने सवाल उठाने के लिए बारहवीं के विद्यार्थी को चुना। भाषा का लब्बोलुआब यही था कि अगर तुमने सवाल उठाया है तो जरूर देशद्रोही होगे, यानी पाकिस्तानी होगे।

बारहवीं के विद्यार्थी को पाकिस्तानी कहे जाने की घटना के बाद शायद नार्वे की पत्रकार हेले लेंग को अपने साथ हुए मामले को समझने में और आसानी हुई होगी। तुमने सवाल क्यों पूछा, भारतीय पत्रकारों के हर सवाल पर लेंग का मासूम सा जवाब होता, क्योंकि सवाल पूछना मेरा काम है। सत्ता पक्ष के अंध समर्थकों ने लेंग को विदेशी जासूस घोषित किया तो उन्हें सफाई देनी पड़ी। हमारे परिवेश में सवालों से बदहजमी इस कदर बढ़ गई है कि एक स्कूली बच्चेके सवाल को भी बर्दाश्त नहीं किया गया।

शुरुआत इस बात से हुई कि सत्ता के शीर्ष लोगों से कोई सवाल नहीं पूछो। उसके बाद दौर आया, सत्ता के किसी भी फैसले को लेकर सवाल नहीं पूछो। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि किसी भी संस्था से सवाल नहीं पूछो। सीबीएसई ने जो भी किया ठीक ही किया होगा, यह मान कर चलो। सीबीएसई से यह नहीं पूछो कि उसने बिना पर्याप्त परीक्षण किए डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को लागू क्यों किया? उत्तर-पुस्तिकाओं को स्कैन कर जांचने वाली प्रणाली को ठीक से जांचा-परखा क्यों नहीं गया? कई विद्यार्थियों की कापियां गलत क्रमांक संख्या से कैसे जुड़ गईं? शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया गया?

आरोप है कि केवल दिल्ली के पांच स्कूलों में, सौ शिक्षकों को महज दो दिन का प्रशिक्षण देकर पूरे देश में ‘ओएसएम’ की व्यवस्था लागू कर दी गई। साफ्टवेयर को ठीक से समझे बिना शिक्षकों ने कापियां जांची और नतीजा यह हुआ कि बारहवीं का कुल पास फीसद घट कर 2019 के बाद सबसे कम यानी 85.20 फीसद रह गया। इसका नतीजा यह है कि पूरे देश के सीबीएसई के बारहवीं के विद्यार्थियों को अपने नतीजे पर भरोसा नहीं रहा।
सबसे अहम सवाल यह है कि किसी प्रयोग को उसकी निर्धारित प्रयोगशाला में करने के बजाय सीधे आम लोगों की जिंदगी में क्यों उतार दिया जा रहा है?

लोकतंत्र के तीनों खंभों ने मिलकर आम आदमी को काकरोच घोषित कर दिया है

आखिर प्रयोग की इतनी हड़बड़ी क्यों है? यह हड़बड़ी क्या इसलिए कि लोकतंत्र के तीनों खंभों ने मिल-जुलकर आम आदमी को काकरोच घोषित कर ही दिया है। उनके साथ नोट से लेकर वोट और परीक्षा के नंबर तक किसी की भी बंदी कर दो वह चुप बैठ जाएगा। उसके किसी भी तरह के सवालों को पांव के नीचे कुचलने की कोशिश की जाएगी। तीन खंभे कहा, क्योंकि मीडिया के कथित आजाद हिस्से पर भी काकरोच होने का आरोप जड़ ही दिया है।

एक सरकारी एजंसी का ‘एंकर’ बारहवीं के विद्यार्थी को पाकिस्तानी कह कर, उसके बाद माफी मांग कर अपनी पोस्ट हटा देता है। हालांकि इसके बाद भी हर किसी को पाकिस्तानी कह देने के उसके ‘अधिकार’ पर कोई बंदिश नहीं आएगी। एक एंकर समझा रही है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने के बाद एक मोटसाइकिल चलाने वाला आम आदमी महीने भर में महज 221 रुपए ज्यादा खर्च करेगा। बकौल एंकर ऊपर-ऊपर से देखें तो कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता है।

ऊपर-ऊपर की तो बात हम नहीं करेंगे, पर हम नीचे जरूर देखेंगे। एक नीचे हमने वहां भी देखा कि बैंक के खाते से 19 हजार रुपए निकालने के लिए एक भाई अपनी बहन का कंकाल कब्र से खोद कर ले आया। इंटरनेट पर मौजूद है वह दृश्य, जिसमें एक जिंदा लाश एक कंकाल को अपने कंधे पर ढो कर ला रही है। अखबार की वह तस्वीर अब मूंगफली के लिफाफे का हिस्सा हो गई होगी जिसमें एक दंपति अपने बच्चे के पार्थिव शरीर को प्लास्टिक के थैले में ऐसे ही लेकर जा रहा है, जैसे पहले वह अपने बच्चे की मेडिकल रिपोर्ट को थैले में लेकर आता था। उसके पास एंबुलेंस के पैसे नहीं थे। एंकर कह सकते हैं कि जहां जिंदा मरीजों को एंबुलेंस और स्ट्रेचर जैसी बुनियादी चीजें नहीं मिलतीं वहां शव ले जाने के लिए एंबुलेंस की मांग तो काकरोच ही कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश की एक गर्भवती स्त्री ने अपने घर के बाहर गड्ढों को दिखा कर प्रदेश के प्रतिनिधि से पूछा था कि वह प्रसव के लिए अस्पताल कैसे जाएगी? सत्ता की बेशर्म आवाज आई थी, प्रसव की तारीख बताओ, हेलिकाप्टर से उठवा लेंगे। पर काकरोच की हद तक हठी हो चुकी स्त्री ने पूछा, किस-किस को हेलिकाप्टर से उठवाएंगे। जिस आम जनता को पेट्रोल की कीमत बढ़ने को जरा सा बताया जा रहा, उसकी अखबारों में दर्ज एक और हालत सुनिए। हापुड़ में मिठाई की एक दुकान पर खाद्य आपूर्ति अधिकारियों का छापा पड़ा। अधिकारियों ने दुकान की मिठाइयों को खराब बता कर मिठाई के कुछ डब्बे कचरे में फिकवा दिए। लेकिन स्थानीय लोग आए और कचरे से मिठाई के डब्बे उठा कर ले गए। उन्हें लगा होगा कल तक वे यही मिठाई खा रहे थे, अन्य कई दुकानों में भी ऐसी ही मिठाई मिल रही तो इससे हमारा क्या नुकसान होगा।

पटना में बर्ड फ्लू की आशंका से मुर्गियों को मारने का आदेश दिया गया। स्थानीय लोग उन मुर्गियों को अपना आहार बनाने के लिए ले गए। जनता अपने उदर को काकरोच जैसा बना चुकी है। खराब पनीर, खराब मिठाई, बर्ड फ्लू की आशंका वाली मुर्गी तक से परहेज नहीं करने वाली जनता को बस अपने लिए काकरोच का सुप्रीम खिताब मिलने का इंतजार था।

किसी भी इंसान की जुबान पर सवाल जैविक रूप से नहीं मिलते हैं। जन्म लेने के बाद कुदरती तौर पर वह सिर्फ हंसना और रोना जानता है। सवाल एक सामाजिक निर्मिति है। किसी देश के नागरिकों की जुबान पर कैसे सवाल होंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके घर का माहौल कैसा है, उसे कैसा स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय मिला। आज के दौर में सबसे अहम यह है कि उसे कैसा मीडिया मिला। हेले लेंग को अपने देश में जैसा माहौल मिला, उसके हिसाब से वे सवाल पूछने को अपना पहला काम मानती हैं। हमारे देश के घरों में जैसा मीडिया पहुंच रहा है, वह सवाल करने वाले को पाकिस्तानी मानने लगता है। सोचिए, जब एक किशोर को सवाल करने के बदले में पाकिस्तानी सुनने को मिलेगा तो वह बड़ा होकर कैसा नागरिक बनेगा? सवाल पूछने से डरने वाला?

एक समय था जब हिंदीभाषी बच्चे ऊंचे स्वर में कविता पढ़ते थे-
है उदधि गरजता बार-बार
प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग् दिगंत
वीरों का कैसा हो वसंत?
आज के दौर में सुभद्रा कुमारी चौहान होतीं तो सवाल से डराई गई इस पीढ़ी से शायद कुछ ऐसा सवाल करतीं-
कीटों का कैसा हो वसंत?

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किसी भी परीक्षा के दौरान अगर प्रश्नपत्र लीक होता है या अन्य कोई गड़बड़ी होती है, तो इसका मतलब यही है कि उसके संचालन से जुड़ा तंत्र परीक्षा की शुचिता को सुनिश्चित कराने में नाकाम रहा। हाल ही में प्रश्नपत्र लीक होने के बाद नीट-यूजी परीक्षा को जिस तरह रद्द किया गया, उससे साफ है कि पहले हुई ऐसी कई घटनाओं के बावजूद आयोजन में हर हाल में शुचिता तय करने को लेकर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए ने जरूरी सबक नहीं सीखा। नतीजतन, नीट की परीक्षा के प्रश्नपत्र फिर अवैध रूप से बाहर हुए और ऊंची कीमतों पर बेचे गए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक