निजी स्वार्थ मनुष्य के स्वभाव का एक ऐसा पक्ष है, जो जन्म से उसके साथ चलता है। स्वयं की सुरक्षा, प्रगति और पहचान की चाह स्वाभाविक है। यही स्वार्थ मनुष्य को परिश्रम करना, आगे बढ़ना और अपने लिए बेहतर जीवन गढ़ना सिखाता है। मगर जब यही भावना सीमाएं लांघने लगे, तब यह समाज के लिए चिंता का विषय बन जाती है। आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है। शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय- हर क्षेत्र में आगे निकलने की होड़ है। इस होड़ में कई बार व्यक्ति अपने लाभ को ही सर्वोच्च मान लेता है और दूसरों के हिस्से की जमीन भी अपने पांव तले दबाने लगता है। यही वह बिंदु है जहां स्वस्थ स्वार्थ अस्वस्थ बन जाता है। ऐसा स्वार्थ सफलता का भ्रम तो रचता है, पर भीतर से मनुष्य को खोखला कर देता है।
स्वार्थ का प्रभाव केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रहता। यह धीरे-धीरे रिश्तों में प्रवेश करता है। आज अनेक संबंध सुविधा और उपयोगिता पर टिके दिखाई देते हैं। जब तक व्यक्ति काम का है, तब तक वह अपना है; और काम निकलते ही दूरी बन जाती है। यह सोच परिवारों में दरार, मित्रता में अविश्वास और समाज में असंवेदनशीलता को जन्म देती है। छात्र जीवन में जैसे ही किसी एक को बेहतर अंक या अवसर मिल जाता है, दूरी अपने आप बन जाती है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्रेरणा देती है, लेकिन जब स्वार्थ हावी हो जाएं, तब मित्रता बोझ बन जाती है, जो समय की कसौटी पर टिक नहीं पाती।
कार्यस्थलों पर ‘टीमवर्क’ यानी ‘सामूहिक भावना के साथ काम’ की बातें होती हैं, लेकिन श्रेय लेने की होड़ बनी रहती है। किसी सहकर्मी के विचार को अपना बताकर प्रस्तुत करना, किसी के अच्छे काम को खराब बताना, सही को गलत कहना और सफलता मिलते ही आगे बढ़ जाना- ये व्यवहार संस्थानों को भीतर से कमजोर कर देते हैं। जहां भरोसा नहीं होता, ईर्ष्या हावी होती है, वहां कार्यक्षमता भी धीरे-धीरे गिरने लगती है। स्वार्थ भले ही व्यक्ति को अस्थायी लाभ दिला दे, पर कार्य-संस्कृति को स्थायी नुकसान पहुंचाता है।
स्वार्थ का सबसे संवेदनशील और पीड़ादायक रूप परिवार में देखने को मिलता है। संपत्ति के बंटवारे में भाई-भाई का दुश्मन बन जाना, बुजुर्गों को बोझ समझना या रिश्तों को सुविधा के तराजू पर तौलना- ये दृश्य आज आम होते जा रहे हैं। परिवार वह स्थान होना चाहिए, जहां निस्वार्थ होना सबसे अधिक हो, लेकिन जब वही स्थान स्वार्थ का शिकार बन जाए, तो समाज की नींव हिलने लगती है।
माता-पिता का प्रेम इस संसार का सबसे निस्वार्थ भाव है। वे अपनी इच्छाएं, सुख-सुविधाएं और कई बार अपने सपने तक बच्चों के भविष्य के लिए त्याग देते हैं। जीवनभर देते रहते हैं, बिना किसी अपेक्षा के। विडंबना यह है कि ऐसे निस्वार्थ प्रेम के बावजूद कुछ बच्चे स्वार्थी हो जाते हैं। पढ़ाई पूरी होते ही माता-पिता से दूरी बना लेना, उनकी जरूरतों को बोझ समझना या उन्हें अकेला छोड़ देना- ये दृश्य आज चुभते हुए सच बन चुके हैं। यह स्वार्थ केवल माता-पिता को नहीं, मानवीय संवेदना को भी चोट पहुंचाता है।
इन उदाहरणों के बीच हमारे सैनिक निस्वार्थ भावना का जीवंत प्रतीक हैं। वे अपने परिवार, आराम और कभी-कभी अपने प्राण तक देश के लिए समर्पित कर देते हैं। सीमा पर खड़ा सैनिक यह नहीं सोचता कि उसे क्या मिलेगा, वह केवल यह सोचता है कि देश सुरक्षित रहे। जब हम अपने छोटे-छोटे लाभ के लिए रिश्तों और जिम्मेदारियों से समझौता कर लेते हैं, तब सैनिकों का त्याग हमें आईना दिखाता है। उनका बलिदान याद दिलाता है कि सच्चा कर्तव्य वही है, जो स्वार्थ से ऊपर उठकर निभाया जाए।
एकलव्य और द्रोणाचार्य की कहानी में एकलव्य ने बिना किसी स्वार्थ के पूरी निष्ठा और लगन से धनुर्विद्या सीखी, लेकिन द्रोणाचार्य ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के लिए स्वार्थवश एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया, जिससे स्वार्थ की सीमाओं और पक्षपात की तस्वीर उजागर हुई। ऐसे प्रसंगों से हमें स्पष्ट संदेश मिलता है कि स्वार्थ न केवल दूसरों का नुकसान करता है, बल्कि नैतिकता, न्याय और रिश्तों की नींव को भी कमजोर कर देता है।
प्रश्न यह नहीं कि हम स्वार्थी हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि हमारा स्वार्थ रिश्तों को जोड़ रहा है या तोड़ रहा है। जिस दिन हम अपने लाभ की सीमा वहां रोक देंगे, जहां से दूसरों की पीड़ा शुरू होती है, उसी दिन स्वार्थ मानवता में बदल जाएगा। हालांकि कहना मुश्किल है कि स्वार्थ पूरी तरह त्याज्य है। आत्मसम्मान की रक्षा करना, अपने अधिकारों के लिए खड़े होना और अपने भविष्य के लिए निर्णय लेना- ये सब स्वार्थ नहीं, बल्कि विवेक हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब विवेक का स्थान केवल लाभ-लालसा ले लेती है।
संतुलन ही समाधान है- ऐसा संतुलन जिसमें ‘मैं’ सुरक्षित रहे और ‘हम’ भी जीवित रहें। इतिहास और वर्तमान- दोनों इस सत्य के साक्षी हैं कि केवल अपने लिए जीने वाले लोग क्षणिक रूप से सफल हो सकते हैं, पर समाज उन्हें याद नहीं रखता। समाज उन्हें स्मरण करता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ की सीमा वहीं रोक दी, जहां दूसरों की पीड़ा शुरू होती है। ऐसे लोग पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनते हैं।
आज आवश्यकता है स्वार्थ की ऐसी नई परिभाषा गढ़ने की, जो आत्मविकास और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच सेतु बने। अगर व्यक्ति यह समझ ले कि समाज के बिना उसका अस्तित्व अधूरा है, तो स्वार्थ स्वत: ही मानवीय हो जाएगा। आखिरकार स्वार्थ समस्या नहीं है, समस्या है उसकी दिशा। सही दिशा में प्रवाहित स्वार्थ समाज को आगे बढ़ाता है और गलत दिशा में बहता स्वार्थ उसे भीतर से तोड़ देता है। चुनाव हमारे हाथ में है- हम अपने स्वार्थ से केवल ऊंचे बनना चाहते हैं या व्यापक भी!
