स्निग्धा का आलेख
मोबाइल की चमकती स्क्रीन पर सिमटती दुनिया में शब्दों की गहराई कहीं धीरे-धीरे धुंधली होती प्रतीत होती है। डिजिटल युग ने ज्ञान को हमारी उँगलियों तक पहुँचा दिया है; सूचना का विस्तार अभूतपूर्व है। परंतु भाषा से हमारा आत्मीय रिश्ता पहले जैसा सशक्त नहीं रहा। तकनीक आज जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है—शिक्षा, संवाद, शोध और मनोरंजन—सब कुछ डिजिटल माध्यमों से जुड़ गया है। ऐसे में शिक्षण पद्धति में परिवर्तन स्वाभाविक है, किंतु इस परिवर्तन के बीच हिंदी भाषा का शिक्षण नई परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना कर रहा है।
एक हिंदी शिक्षिका के रूप में प्रतिदिन यह अनुभव होता है कि बच्चों के विचारों में कमी नहीं है। वे जिज्ञासु हैं, कल्पनाशील हैं, संवेदनशील भी हैं। परंतु जब उन विचारों को शब्दों में ढालने का समय आता है, तो वे ठिठक जाते हैं। हाल ही में, कक्षा में विद्यार्थियों से उनके मनपसंद विषय पर कुछ पंक्तियाँ लिखने को कहा। सभी के पास भाव थे, अनुभव थे, पर शब्द नहीं। कई विद्यार्थियों ने सहज भाव से कहा—“सोच तो है, पर लिखने के लिए शब्द नहीं मिलते।” उस क्षण यह स्पष्ट हुआ कि समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की है।
कम हो रही लंबे वाक्य लिखने की प्रवृत्ति
डिजिटल माध्यमों ने संवाद को त्वरित और संक्षिप्त बना दिया है। चैट भाषा, इमोजी और मिश्रित भाषायी प्रयोग (हिंग्लिश) का प्रभाव बच्चों की हिंदी शब्दावली को सीमित कर रहा है। लंबे वाक्य लिखने की प्रवृत्ति कम हो रही है। शुद्ध वर्तनी और व्याकरणिक सावधानी पर ध्यान घटता जा रहा है। ‘है’ और ‘हैं’, ‘क्योंकि’ और ‘क्युकी’, ‘वहाँ’ और ‘वहा’ जैसे सरल शब्दों में भी भ्रम देखने को मिलता है। कई बार बच्चे अपनी त्रुटियाँ पहचानने में भी असमर्थ होते हैं। जब भाषा की बुनियाद कमजोर होती है, तो आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है।
वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश के अनेक प्रतिष्ठित विद्यालय, जो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से संबद्ध हैं, अपनी शिक्षण पद्धति में मुख्य रूप से अंग्रेजी माध्यम का उपयोग करते हैं। यद्यपि यह बोर्ड हिंदी माध्यम के विद्यालयों को भी पूरी मान्यता प्रदान करता है, फिर भी व्यवहार में अधिकांश विद्यार्थी अन्य विषयों का अध्ययन अंग्रेजी में करते हैं। यह स्वाभाविक है कि विद्यार्थी जिस भाषा में विज्ञान या गणित जैसे विषय पढ़ते हैं, वे उसी में अधिक सहज हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, हिंदी उनके लिए अभिव्यक्ति का माध्यम कम और केवल एक ‘विषय’ अधिक बनकर रह जाती है।
अंग्रेजी का महत्व बढ़ा
अभिभावकों की प्राथमिकताओं में भी अंग्रेजी का महत्व बढ़ा है, जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को वैश्विक अवसरों के लिए सक्षम बनाना है। इस प्रयास में अनजाने में घर और विद्यालय दोनों स्थानों पर हिंदी के सक्रिय प्रयोग और पठन के अवसर सीमित हो जाते हैं।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि समस्या किसी अन्य भाषा के अस्तित्व से नहीं है। बहुभाषिकता हमारे देश की शक्ति है। अंग्रेज़ी सहित अन्य भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है। किंतु जिस भाषा में बच्चा अपने परिवेश को समझता है और भावनात्मक रूप से जुड़ता है, उसमें दक्षता उसके चिंतन को गहराई प्रदान करती है। यही कारण है कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 प्रारंभिक स्तर पर मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में शिक्षण को महत्व देती है, क्योंकि भाषा ही विचारों की आधारशिला है।
संतुलन में है समाधान
समाधान निराशा में नहीं, संतुलन में है। यदि हिंदी को केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित न रखकर जीवन से जोड़ा जाए, तो वह पुनः बच्चों के लिए सहज और रोचक बन सकती है। कहानी-कथन, समूह-चर्चा, भूमिका-अभिनय, वाद-विवाद, रचनात्मक लेखन और काव्य-पाठ जैसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों के शब्द-भंडार और आत्मविश्वास को सुदृढ़ कर सकती हैं। विद्यालयों में नियमित पठन-अभियान, ‘दिन का शब्द’ जैसी पहलें और पुस्तकालय संस्कृति का सशक्तिकरण भी महत्त्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
डिजिटल साधनों को विरोधी नहीं, सहयोगी बनाया जा सकता है। यदि तकनीक का प्रयोग हिंदी ब्लॉग, ई-पत्रिका, ऑडियो-पुस्तक और रचनात्मक लेखन मंचों के माध्यम से किया जाए, तो बच्चे उसी डिजिटल संसार में हिंदी से जुड़ सकते हैं, जहाँ वे पहले से सक्रिय हैं।
वास्तव में भाषा केवल एक विषय नहीं, बल्कि संस्कृति, संवेदना और चिंतन की धुरी है। जब शब्द सशक्त होते हैं, तभी विचार स्पष्ट और प्रभावी बनते हैं। हिंदी को जीवंत बनाए रखना केवल शिक्षक का दायित्व नहीं, बल्कि अभिभावकों, विद्यालयों और समाज की भी साझा जिम्मेदारी है। यदि हम बच्चों को शब्दों का समृद्ध संसार दे पाएँ, तो वे अपने विचारों से भविष्य को और अधिक उज्ज्वल बना सकेंगे।
(स्निग्धा चेन्नई स्थित विद्यालय में हिंदी शिक्षिका हैं। लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं। जनसत्ता का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं।)
