पश्चिम बंगाल के सियासी अखाड़े में जहां तृणमूल कांग्रेस सरकार पर एंटी-इनकंबेंसी का ठप्पा लगा है, वहीं एक नाम अब भी सबसे अलग दिखता है — पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और भवानीपुर विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) उम्मीदवार ममता बनर्जी का। सरकार के खिलाफ लोगों में भले ही आक्रोश हो, ‘भय’ की राजनीति का असर हो, घुसपैठियों पर नज़र हो लेकिन ममता दीदी से नाराजगी, यह हो नहीं सकता!

बीजेपी के नेता भी यहीं अटके, उनके सारे पैंतरे जो बाकी राज्यों में काम कर जाते, यहाँ प्रभावशाली नहीं दिखते। ऐसा नहीं है कि राज्य में मुद्दे नहीं हैं, काफी हैं – शासन, बेरोज़गारी, गरीबी, हिंसा, भय – सबको पता है, लेकिन दीदी, वह तो अपनी है। दीदी ‘इनसाइडर’, बाकि सब ‘आउटसाइडर’– यही है बंगाल का विचित्र मामला।

प्रशासनिक मुद्दों से ऊपर उठकर उन्होंने चुनाव को इमोशनल और कल्चरल जंग बना दिया है — इस रणनीति के पीछे उनका कोर वोट बैंक है। भवानीपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मार्जिन भले ही कम हो गए हों, लेकिन जब लड़ाई ममता बनर्जी की बन जाती है, तो लोकल प्राइड और लॉयल्टी सामने आकर खड़ी हो जाती है। ममता बनर्जी बंगाली पहचान के साथ भाजपा के अभियान का मुकाबला कर रही हैं। आखिर में राजनीति में सबसे बड़ी ताकत अक्सर पार्टी नहीं, वो शख्स होता है जो लोगों को जोड़ता है और उन्हें हर हालात में ‘अपना’ लगता है।

ममता की पर्सनल क्रेडिबिलिटी बेदाग है। विश्लेषक बार-बार यही कह रहे हैं कि सरकार के खिलाफ वोटरों का गुस्सा, ममता पर नहीं उतरता। सड़क से उठकर आईं, कभी न झुकीं — उनकी ऐसी छवि बन चुकी है कि पार्टी से ज़्यादा उनपर व्यक्तिगत भरोसा लोगों के दिल में घर कर के बैठा है। ममता बनर्जी को जो सबसे अलग करता है, वो है उनका ज़मीनी कनेक्शन। कोलकाता की गलियों से लेकर दूर-दराज के गांवों तक वो ऐसे घूमती हैं, जैसे कभी वहां से गयी ही नहीं।

ममता बनर्जी पर एंटी-इंकम्बेंसी का असर कम पड़ता है। सिंगुर-नंदीग्राम की लड़ाई ने उन्हें ‘दीदी’ की छवि दी है — जो सबके लिए लड़ जाती है, अपनी है। वह चुनावी कैंपेन में बंगाली अस्मिता घोल देती हैं — सब कुछ इमोशनल। जब सब गवर्नेंस और रिपोर्ट कार्ड की बात कर रहे होते हैं, ममता ‘इनसाइडर बनाम आउटसाइडर’ का नरेटिव लाकर पूरा माहौल बदल देती हैं। ये कोई सतही रेटोरिक नहीं है, सालों से आज़माया नुस्खा है।

यहाँ आकर अमित शाह जैसे नेता भी लहजा बदलकर बात करते हैं, उन्होंने किसी भी रैली में ममता पर कोई व्यक्तिगत वार नहीं किया, वह सिर्फ सरकार के भ्रष्टाचार, ‘भय’ बेरोज़गारी और घुसपैठ पर लोगों को सम्बोधित कर रहे हैं। वो बालिकाओं को पढ़ाई के लिए खर्चा देने की बात करते हैं, ममता दीदी को कुछ नहीं कहते। अमित शाह ने 20 जनसभाएं, 11 रोड शो और 5 संभागीय बैठकों के अलावा कोलकाता में 10 से ज्यादा संगठनात्मक बैठकें कीं। लोगों से परिवर्तन की बात की, भाजपा को लाने की बात कही।

पश्चिम बंगाल में आज दूसरे चरण में 142 विधानसभा सीटों पर मतदान हो रहा है। ममता बनर्जी ने चुनाव के दौरान गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि बाहर से आए पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) और सुरक्षाबल निष्पक्ष नहीं हैं और माहौल को प्रभावित किया जा रहा है।

सुवेंदु अधिकारी के सामने ममता दीदी के लिए भवानीपुर एक चैलेंज हो सकता है। यहाँ समझना ज़रूरी है कि भवानीपुर में क्या समीकरण बन रहा है। भवानीपुर 2021 में चर्चा का केंद्र बन गया, जब ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट से हार गईं और उन्हें मुख्यमंत्री बने रहने के लिए 6 महीने के भीतर किसी सीट से जीतना अनिवार्य था। उन्होंने भवानीपुर से उपचुनाव लड़ा।

भवानीपुर एक जटिल निर्वाचन क्षेत्र है। इस निर्वाचन क्षेत्र में हिन्दू बहुमत (76%) है, मगर वह एकजुट होकर किसी एक उम्मीदवार के मतदान नहीं करते इसलिए करीब 24 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन जीत-हार का समीकरण बदल सकता है। हालाँकि इस सीट पर गैर-बांग्लाभाषी — मारवाड़ी, बिहारी, यूपी के लोग — जो करीब 34 प्रतिशत है , उसे भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

इस सीट पर केवल धर्म या भाषा के आधार पर वोट माँगना काफी नहीं है। देखना ये है कि यह सीट इस बार किसकी होगी – दोनों पक्षों के लिए यह मुकाबला प्रतिष्ठा की लड़ाई माना जा रहा है। ममता बनर्जी अपने पारंपरिक गढ़ को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं सुवेंदु अधिकारी इस क्षेत्र में भाजपा की बढ़ती पकड़ का फायदा उठा रहे हैं और विशेष रूप से गैर-बांग्ला भाषी आबादी का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ममता वाली वो धरती से जुड़ी, जमीनी आंच उनमें कम दिखती है।

बहरहाल, 4 मई को सब साफ़ हो जायेगा।