अगर हम आज कोई एक ऐसा चुनाव कर सकें, जिससे यह पक्का हो जाए कि हम अपनी पूरी जिंदगी खुश और स्वस्थ रहेंगे, तो हम किसका चयन करेंगे? हममें से ज्यादातर लोग सोचते हैं कि इसका कुछ लेना-देना अमीर बनने या बहुत कुछ हासिल करने से है, लेकिन हावर्ड अध्ययन के शोध बताते हैं कि दूसरे लोगों के साथ अपने रिश्तों में निवेश करना हमारी खुशी का सबसे बड़ा कारण बनता है।
जिन लोगों के रिश्ते सबसे खुशहाल और गर्मजोशी भरे थे, वे ही लोग सबसे लंबे समय तक स्वस्थ रहे और सबसे ज्यादा जिए। हमारी लगभग पचास फीसद खुशी एक तरह का जैविक तौर पर निर्धारित बिंदु है, जो शायद हमारी कोशिकाओं द्वारा तय होता है। इसका संबंध जन्मजात स्वभाव से है। हम ऐसे कई लोगों को जानते हैं जो स्वाभाविक रूप से उदास रहते हैं और दूसरे लोग जो स्वाभाविक रूप से खुशमिजाज होते हैं, चाहे कुछ भी हो रहा हो। यानी हमारी लगभग आधी खुशी वह जन्मजात स्वभाव है। लगभग दस फीसद हमारी मौजूदा जिंदगी की परिस्थितियों पर आधारित है। आखिरी चालीस फीसद हमारे नियंत्रण में है।
लोगों द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी गलतियों में से एक खुशी और खुशी की भावनाओं को भ्रमित करना है। खुशी कोई भावना नहीं है। भावनाएं खुशी का सबूत हैं। भावना बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो लोग सेहतमंद और खुश होते हैं, उनके जीवन में तीन तत्त्व समान हैं – आनंद, संतुष्टि और अर्थ।
आनंद एक ऐसी चीज है, जिसके बारे में लोग कम समझते हैं
आनंद एक ऐसी चीज है, जिसके बारे में लोगों को लगता है कि वे इसे समझते हैं, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता। यह ऐसा कुछ नहीं है, जो वास्तव में खुशी की ओर ले जाता है। आनंद उससे कहीं अधिक जटिल है। खुशी का दूसरा सूक्ष्म तत्त्व संतुष्टि है। संतुष्टि एक वास्तविक रहस्य है, क्योंकि यह वह खुशी है जो हमें किसी चीज के लिए संघर्ष करने के बाद मिलती है। अगर हम पर्याप्त संघर्ष नहीं करते, तो यह मीठा नहीं होता।
अंतिम, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है – अर्थ। क्या हम उन चीजों को करने के लिए पैसा खर्च करते हैं, जो हम सचमुच करना चाहते हैं? समय और पैसा आमतौर पर साथ-साथ चलते हैं, लेकिन अच्छे तरीके से नहीं। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि लोग जितना ज्यादा पैसा कमाते हैं, उन्हें लगता है कि उनके पास उतना ही कम समय है।
शोध बताते हैं कि आय आमतौर पर खुशी बढ़ाती है, लेकिन ज्यादा आय के स्तर पर इसका प्रभाव कम हो जाता है, साथ ही वित्तीय सफलता पर ध्यान केंद्रित करने से जीवन की संतुष्टि कम हो सकती है। पैसा तनाव कम करता है और सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन एक बार जब हम आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं, तो इसका प्रभाव कम हो जाता है। यह हमें सदियों पुराने सवाल पर लाता है कि क्या पैसा खुशी खरीद सकता है!
दरअसल, यह तभी हो सकता है, जब हम थोड़े पैसे से थोड़ा समय खरीद सकें। सरल शब्दों में, चाहे हम कितना भी कमाएं, चाहे हम कितने भी अमीर हों, थोड़ा समय खरीदना हमको ज्यादा खुश करता है। समय खरीदने की कुंजी यह है कि हम सोच-समझ कर तय करें कि हम अपने पैसे से जो समय बचाएंगे, उसका इस्तेमाल कैसे करेंगे।
समय खरीदना हमें तभी ज्यादा खुश करेगा, जब यह जानबूझ कर और उद्देश्यपूर्ण लगे। इसलिए नहीं कि हमारे पास समय नहीं है, बल्कि इसलिए कि हम अपने पास मौजूद समय का अलग तरह से इस्तेमाल करना चाहते हैं। एक बार किसी पत्रकार ने भूटान के राजा रहे जिग्मे सिंग्ये वांगचुक से पूछा कि आपके देश का सकल घरेलू उत्पाद इतना कम क्यों है। इस पर वांगचुक का जवाब था, ‘हम सकल घरेलू उत्पाद से नहीं, सकल राष्ट्रीय खुशी यानी जीएनएच (ग्रास नेशनल हैप्पीनेस) के सूचकांक से देश चलाते हैं।’
अक्सर यह माना जाता है कि आय, धन और जीवन संतुष्टि के बीच संबंध है। यानी किसी के पास जितना अधिक पैसा होता है, वह उतना ही अधिक संतुष्ट होता है। पर यह पूरा सत्य नहीं है। एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गरीब, छोटे पैमाने के समाजों में रहने वाले तीन हजार लोगों से उनके जीवन की संतुष्टि के बारे में सर्वेक्षण किया। परिणामों से पता चला कि इन लोगों की जीवन संतुष्टि सबसे धनी देशों में रहने वाले लोगों के बराबर है।
एक संभावित कारण यह है कि सामाजिक मेलजोल और प्रकृति का अनुभव जैसी साधारण खुशियां छोटे पैमाने के समुदायों में जीवन की संतुष्टि को बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभाती हैं। इनमें से कई समाजों में भारी मुद्रीकरण नहीं होता है। सोलोमन द्वीप के रोविआना और गीजो क्षेत्रों में रहने वाले मेलानेशियन लोग दुनिया के सबसे गरीब लोगों में से कुछ हैं। वे मछली पकड़ने और खेती से अपनी जरूरतें पूरी करते हुए जीवन का निर्वाह करते हैं।
मगर वे इस भौतिक रूप से सरल अस्तित्व के बावजूद, मेलानेशियन फिनलैंड और डेनमार्क के निवासियों की तुलना में अधिक जीवन संतुष्टि व्यक्त करते हैं, जो नियमित रूप से दुनिया में सबसे खुशहाल लोगों के रूप में सुर्खियां बटोरते हैं। सच यह है कि खुश रहना इस बात पर निर्भर करता है कि अगर हम सुविधाओं और संसाधनों के बीच जीवन जीते हैं, तो क्या उन्हीं सुविधाओं के बीच जीवन-तत्त्व के लिए अनिवार्य कारकों को भूल जाते हैं या उन्हें याद रखते हैं। इस मामूली लगने वाली बात की अहमियत को नजरअंदाज करना निस्संदेह हमें सुविधाओं के बीच वास्तविक खुशी से दूर कर सकता है।
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हर संवाद में शब्द हों, यह जरूरी नहीं। कभी-कभी संवाद स्वयं के और दूसरे छोर पर जो है, उसके मौन के बीच एक तरह का अवलोकन होता है। ऐसा संवाद भाषा की सीमाओं को लांघकर अंतस की ऐसी गहराइयों तक पहुंचता है, जिसकी खबर भी नहीं लग पाती। प्रकृति के साथ कुछ इसी तरह का संवाद होता है। हम शोर के युग में जीते हैं, जहां हर पल कुछ न कुछ सुनाई देता है। सन्नाटा हमसे छीन लिया गया है। एकांत किसी शातिर चोर की सेंधमारी में लुट गया है। मन को कभी विश्राम नहीं मिलता। उसे बार-बार छेड़ा जाता है, उकसाया जाता है। जैसे तांगे से बंधे किसी थके हुए घोड़े को जबरदस्ती दौड़ाया जा रहा हो। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
