यह विचित्र विडंबना है कि जिस देश और संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तथा संकल्प से सिद्धि तक जल के महत्त्व को रेखांकित किया जाता है, वहां पानी का संकट साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। हर वर्ष छह ऋतुओं को देखने वाले हमारे देश में बारिश अमूमन भरपूर होती है, नदियों का संजाल है, तालाब, झीलें, नहरें और कुएं हैं। सवाल है कि फिर यहां प्यास ज्यादा चिंता क्यों पैदा करती है।

ऐसा नहीं है कि यहां पानी की कमी है, बस जरूरत और उपलब्धता के बीच में कई बाधाएं हैं और इसमें नदियों का प्रदूषित होना तथा जल संरक्षण का अभाव सबसे बड़ी वजह है। दरअसल, भारत कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है, इस नाते पानी की खपत का एक बड़ा हिस्सा खेत-खलिहानों को जीवन देता है। नदियों के जल के बूते ही बिजली, चीनी, मदिरा, शीतल पेय और बोतलबंद पानी के उद्योग बाजार में खड़े हैं। इस खपत में एक नया नाम कंप्यूटर और एआइ तकनीक आधारित उद्योगों का भी है, जिनके संयंत्रों को ठंडा रखने के लिए बड़े पैमाने पर पानी का इस्तेमाल होता है।

मानव सभ्यता के बसने और बिखरने का इतिहास हमेशा से ही नदियों के किनारों से जुड़ा रहा है। नदियां खेत-खलिहान, वन्य-जीवन और जल-जीवन की धमनियां रही हैं। जीवन को जीवित रखने का काम इन नदियों के ही जिम्मे है। मगर अब नदियों में लगातार प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। औद्योगिक कचरा, जल-मल, उर्वरक और कीटनाशक कचरा, प्लास्टिक और पूजा सामग्री के अवशेष नदियों में सबसे ज्यादा हैं। जल की समस्या और नदियों के प्रदूषण के तार आपस में जुड़े हैं। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक में जनसंख्या का असंतुलित दबाव और बढ़ती भीड़ इस समस्या को गहरा रही है। शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन स्तर की ओर मुंह ताकती आबादी के एक बड़े हिस्से को सेवाएं और सुविधाएं मुहैया न होना भी इसकी एक बड़ी वजह है।

भारतीय जल-संस्कृति में नदियों को तीर्थ का दर्जा दिया गया है, लेकिन अब ये तेजी से जल-पर्यटन में तब्दील हो रही हैं। एक तरफ नदियों के जरिए पर्यटक लुभाए जाते हैं, दूसरी ओर उन्हें साफ रखने के लिए करोड़ों रुपए की धनराशि आबंटित की जाती है। नीति आयोग की एक रपट के मुताबिक, वर्ष 2030 तक ताजा पानी की उपलब्धता में चालीस फीसद की गिरावट संभव है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया भर की लगभग चालीस फीसद आबादी पानी की कमी से जूझ रही है और आने वाले समय में हालात और बदतर होने वाले हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2023 की रपट बताती है कि गंगा, यमुना, मीठी, साबरमती, हिंडन और सतलुज सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियां हैं। औद्योगिक कचरे और अनुपचारित जल-मल के कारण यमुना नदी को कई स्थानों पर जैविक रूप में लगभग मृत माना जाता है। देश में तकरीबन 70 फीसद सतही जल संसाधन दूषित हैं और जल गुणवत्ता सूचकांक के 122 देशों की सूची में भारत 120वें पायदान पर हैं।

नदी की प्रकृति है बहना और इसका यही गुण इसे जीवनदायिनी बनाए रखता है। मगर कहीं सिंचाई के लिए, कभी बिजली उत्पादन के नाम पर, तो कहीं बाढ़-नियंत्रण की कोशिशों का हवाला देकर नदियों को बांधा जा रहा है, जिससे उनकी निरंतरता टूट रही है। बांधों और जलाशयों में रुका पानी नदी के बहाव को तो धीमा करता ही है, साथ ही इससे पानी की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। सिंचाई के वादे भी कहां पूरे हो पा रहे हैं?

कहीं बाढ़ है तो कहीं सूखा। इतना ही नहीं, पूर्वी राज्यों में फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे रसायन भूजल को जहरीला कर रहे हैं, जिसके चलते लोग दूसरी जगहों पर पलायन के लिए मजबूर हो रहे हैं। दुनिया भर में हर सप्ताह दस लाख से ज्यादा लोग शहरों की ओर कूच करते हैं। शहरी जीवन का ये आकर्षण इस सदी के मध्य तक भारत के गांवों को भी निगल लेगा और हमारे पास भी केवल गंदगी, कचरे, पानी और दूसरी समस्याओं से लदे ‘स्मार्ट शहर’ ही बचेंगे। फिनलैंड, आइसलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देश अपने नागरिकों को मुफ्त पानी दे रहे हैं, आस्ट्रेलिया और फ्रांस में भी सार्वजनिक जगहों पर पानी मुफ्त मिलता है। मगर इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस भारत के लोग जल-संस्कृति का हिस्सा रहे हैं और जहां शुरू से प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम माना जाता रहा है, वहां पानी का बाजार फल-फूल रहा है।

देश का उच्चतम न्यायालय कई वर्ष पहले कह चुका है कि पानी पर किसी भी एक का कोई मालिकाना हक नहीं है। यह साझी विरासत है, जो न केवल सरकार की है और न ही स्थानीय समाज की। प्रबंधन की ओट लेकर कोई भी इसका मालिक नहीं बन सकता। मगर पानी का दिनोंदिन फलते और फैलते बाजार को देखकर आशंका होती है कि क्या वाकई पानी के मालिकाना हक की कीमत और बोली तय नहीं हो चुकी हैं? जबकि इस समय पानी सबसे मुनाफे का कारोबार है।

तमाम तरह के नए नामों के साथ शुद्व पानी, मिनरल यानी खनिजयुक्त पानी, झरने का पानी बाजार में धड़ल्ले से बिक रहा है। पानी को लेकर हमारी सोच ऐसी हो गई है कि सिवाय ‘फिल्टर’, ‘मिनरल वाटर’ और ‘वाटर प्यूरिफायर’ से निकले ‘आरओ’ के पानी के अलावा पानी की हर बूंद बिना बोले दूषित घोषित हो चुकी है। इस पूरी प्रक्रिया में हर साल लाखों लीटर पानी व्यर्थ बहता है। दूसरी ओर, भूजल में लगातार गिरावट और भी गंभीर है। भारत में पीने के पानी का 80 फीसद और सिंचाई की 64 फीसद जरूरत भूजल से ही पूरी होती है।

नीति आयोग का कहना है कि 2030 आते-आते देश के प्रमुख शहर- दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद में भूजल शून्य हो जाएगा। प्यास और सूखे की समस्या से जूझते हुए हमारे यहां 90 फीसद प्राकृतिक आपदाओं का कारण भी पानी है। जून से सितंबर के चार महीनों में ही हमारे कुल पानी के स्रोत का तकरीबन 70 से 90 फीसद हिस्सा बारिश के रूप में बरसता है, लेकिन इसका पांच फीसद हिस्सा भी हम इकट्ठा नहीं कर पा रहे हैं। भले ही हमारे यहां बरसात के पानी का वितरण असमान है, लेकिन इतिहास गवाह है कि तालाब, पोखर, कुओं के रूप में पानी के संचय और भंडारण की स्थानीय लेकिन उत्तम तकनीक से हमारे पुरखों ने पानी को संभालकर रखा और बिन पानी के महीनों में भी सालाना अपनी पानी और सिंचाई की जरूरतें पूरी करते रहे हैं। वर्तमान में समस्या की जड़ यही है कि हम धरती से जितने पानी का दोहन कर रहे हैं, उसका आधा भी उसे नहीं लौटा रहे हैं। पानी की बर्बादी एक गंभीर समस्या है।

सबसे बड़ी समस्या सोच और मानसिकता है, जिसमें पानी बचाने और मुहैया कराने के प्रयासोें का जिम्मा केवल सरकारों के ही भरोसे है। अगर पानी वाकई जन की समस्या है, तो पानी को संरक्षित करने के लिए पांरपरिक और वैज्ञानिक तकनीकों को एक साथ हाथ बांधने होंगे। बारिश के पानी को जमीन में भेजने के तरीकों का विस्तार करना होगा। कंक्रीट के जंगल उगाने और स्मार्ट सिटी बसाने के बजाय पेड़ और दरख्तों को जमीन देनी होगी, क्योंकि पानी सहेजने का काम पेड़ों के बिना संभव नहीं। ये धरती सबकी है, इससे जितना लेना है, उतना ही वापस लौटाने की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी जन की ही है। इस बदलाव के बिना समस्या का पार पाना नामुमकिन है।

यह भी पढ़ें : Water Crisis: पेयजल संकट के मुहाने पर भारत, बारिश की बूंदों की अनदेखी और भूजलस्तर गिरने से बिगड़ रहे हालात

पानी का संकट दुनिया भर में गहराता जा रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक पृथ्वी पर कुल उपलब्ध पानी का 97.5 फीसदी हिस्सा समुद्री है, बाकी 2.5 फीसदी हिस्सा मीठा जल है, लेकिन इसका भी काफी मात्रा प्रदूषित है, जो पीने योग्य नहीं है। एक अनुमान के अनुसार कुल जल का केवल एक फीसदी हिस्सा ही पीने योग्य है, जो दुनिया की आबादी के लिहाज से बहुत कम है। ऐसे में जल संकट भयावह होता जा रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक