आजकल दुनिया भर के विचारकों, चिंतकों, समाज विज्ञानियों, मानवाधिकार विशेषज्ञों, पर्यावरण वैज्ञानिकों और सरकारों को संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बुतरस घाली का लगभग तीन दशक पुराना वह कथन याद आता है, जिसमें उन्होंने दुनिया भर में पानी की कमी से जुड़ी परेशानियों के प्रति आगाह करते हुए कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए हो सकता है।
निस्संदेह उन्होंने बहुत ही गंभीर समस्या की ओर इशारा किया था। मगर उनकी चेतावनी पर ज्यादातर देशों ने कोई ध्यान नहीं दिया। अगर दुनिया ने उनकी बात मान ली होती, तो क्या संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में यह कहा जाता कि स्वच्छ पेयजल के अभाव में प्रतिवर्ष दुनिया भर में चौदह लाख से भी अधिक लोगों की मौत हो जाती है। इसलिए सभी देशों की सरकारों को जल संसाधन में निवेश करना चाहिए।
वास्तव में यह दुखद स्थिति है कि साफ पीने का पानी न मिलने के कारण विभिन्न प्रकार की बीमारियों का शिकार होकर लाखों लोग प्रतिवर्ष अपनी जान गंवा देते हैं। जाहिर है कि दुनिया भर की सरकारों को संयुक्त राष्ट्र की बात को गंभीरता से लेते हुए जल संसाधनों के संरक्षण में निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट ने जिस निवेश की बात कही है, वह दरअसल, देशों की अर्थव्यवस्था तथा उनके नागरिकों के भविष्य में निवेश है। जब यह निवेश जन-साधारण तक शुद्ध पानी की पहुंच को सुनिश्चित करेगा, तब इसके अभाव में होने वाली बीमारियों से नागरिकों का बचाव हो सकेगा। इससे मानव संसाधन की सुरक्षा तो होगी ही, साथ ही लोगों के इलाज पर होने वाले खर्चों पर भी अंकुश लग सकेगा। इससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले अनावश्यक बोझ में भी कमी आएगी।
विश्व बैंक की चेतावनी को याद करना चाहिए
इस प्रकार, यह निवेश पानी के मामले में दुनिया के तमाम जागरूक देशों का भविष्य निश्चित रूप से सुरक्षित कर सकता है। विश्व बैंक की उस चेतावनी को याद करना चाहिए, जिसमें उसने अपने ही एक अध्ययन के आधार पर यह दावा किया है कि वैश्विक सूखे और पानी के अभाव के कारण वर्ष 2030 तक विश्व भर में लगभग सात करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ सकता है। विश्व बैंक की आशंका विश्व भर के जलाशयों में जल भंडारण की लचर व्यवस्था को लेकर है, जो बिल्कुल सही प्रतीत होती है। ऐसे में विस्थापितों का आंकड़ा उसके आंकड़े से अधिक भी हो सकता है।
अपने देश में कैसी है स्थिति?
भारत की बात करें, तो देश के प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण की व्यवस्था आज भी लचर बनी हुई है और इसमें सुधार होने के बजाय यह लगातार बिगड़ती जा रही है। जलाशयों और नदियों की निगरानी करने वाले केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश भर के सभी 166 जलाशयों में जल भंडारण 40 फीसद से भी नीचे गिर गया है।
वहीं, देश के सभी 20 नदी बेसिनों में भी जलस्तर लगातार घटता जा रहा है। असम, गोवा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के जलाशयों में जलस्तर पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम हो गया है। आयोग ने नौ अप्रैल 2026 को जारी अपने बुलेटिन में जलस्तर में तेजी से गिरावट की चेतावनी दी थी।
फिर 30 अप्रैल के अपने बुलेटिन में भी आयोग ने बताया था कि इन जलाशयों में उपलब्ध सक्रिय भंडारण 71.082 अरब घन मीटर (बीसीएम) है, जो इनकी कुल क्षमता का केवल 38.72 फीसद ही है, जबकि नौ अप्रैल को यह 44.71 फीसद था। यानी महज 21 दिनों में ही देश के सक्रिय जल भंडारण में छह फीसद से अधिक की कमी आ गई।
अब केंद्रीय जल आयोग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 11 जून 2026 को देश के सभी 166 जलाशयों में केवल 51.92 बीसीएम पानी ही बचा हुआ है, जबकि इन जलाशयों की कुल सक्रिय भंडारण क्षमता 183.565 बीसीएम है, जो देश में अनुमानित कुल क्षमता 257.812 बीसीएम का करीब 71.20 फीसद ही है। यानी देश भर के जलाशयों में अब उनकी कुल जल भंडारण क्षमता का केवल 28.28 फीसद जल ही बचा हुआ है, जो एक आपात स्थिति का संकेत है।
तात्पर्य यह कि आने वाले सप्ताहों में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति एवं जलविद्युत परियोजनाओं के लिए देश को एक बार फिर मानसून पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
पानी के लिए हो रहे झगड़े
बहरहाल, बुतरस घाली के अनुसार तीसरा विश्वयुद्ध तो शायद कभी न हो और हम सभी को ऐसा ही सोचना चाहिए। मगर यह सच्चाई है कि पानी के लिए भारत सहित दुनिया भर में हिंसक संघर्ष की घटनाएं लंबे समय से हो रही हैं।
वैश्विक स्तर पर पानी पर काम कर रही संस्था ‘पैसिफिक इंस्टीट्यूट’ ने इस बारे में हैरान करने वाले आंकड़े साझा किए हैं। इनके अनुसार, वर्ष 2000 में जल संसाधनों को लेकर दुनिया भर में हुए टकरावों की महज बाईस घटनाएं ही सामने आई थीं। वहीं, 2022 में ऐसी 231 घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2023 में बढ़ कर 347 तक पहुंच गईं।
इस प्रकार, वर्ष 2023 में जल संसाधनों को लेकर होने वाली हिंसक घटनाओं में नाटकीय बढ़ोतरी देखी गई। इन घटनाओं में वृद्धि का सिलसिला पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से जारी है, जिसमें अब तक 1,477 फीसद तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।
‘पैसिफिक इंस्टीट्यूट’ के अनुसार, वर्तमान दशक के पहले चार वर्षों में ही जल संघर्ष के 785 मामले दर्ज किए गए हैं, जो पिछले पूरे दशक (2010) की तुलना में काफी अधिक है। पानी को लेकर वर्ष 2024 में विश्व स्तर पर संघर्ष के 420 मामले दर्ज किए गए, जिनमें मध्य पूर्व, यूक्रेन, भारत, ईरान और मैक्सिको की घटनाएं शामिल हैं।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनओडीसी’ के अनुसार, वर्ष 2019-2021 के बीच भारत में दर्ज हत्याओं में से लगभग 20 फीसद यानी प्रत्येक पांच में से एक हत्या पानी के लिए ही हुई। यह सचमुच गंभीर स्थिति है। हालिया घटनाओं पर गौर करें, तो जून 2026 में देहरादून स्थित सहसपुर थाना क्षेत्र के बैरागीवाला गांव में पानी को लेकर दो पक्षों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और परिवार के अन्य सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए।
इसी तरह, अप्रैल 2026 में मध्य अफ्रीकी देश चाड के एक प्रांत में दो समूहों के बीच एक जल-स्रोत पर कब्जे को लेकर शुरू हुई झड़प देखते-ही-देखते हिंसक प्रतिशोध में बदल गई। इसमें 42 लोग मारे गए। ये तमाम घटनाएं दुखद तो हैं ही, दुनिया को आगाह करने वाली भी हैं। वैश्विक सूखे और पानी के अभाव के कारण संघर्षों और विवादों से निपटने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी का निर्वहन आवश्यक है।
जरूरी है कि समाज अब जल स्रोतों, विशेष रूप से भूजल स्रोतों के संरक्षण और उनके सदुपयोग के प्रति जागरूक और जवाबदेह बने। इसके अतिरिक्त, वर्षा जल एवं अपशिष्ट जल के शोधित स्वरूप यानी शोधित जल के उपयोग के प्रति भी समाज को अपने नकारात्मक रवैए में बदलाव लाना बेहद जरूरी है, अन्यथा भविष्य में परिस्थितियां जीवन के प्रतिकूल बन सकती हैं।
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मानव सभ्यता के बसने और बिखरने का इतिहास हमेशा से ही नदियों के किनारों से जुड़ा रहा है। नदियां खेत-खलिहान, वन्य-जीवन और जल-जीवन की धमनियां रही हैं। जीवन को जीवित रखने का काम इन नदियों के ही जिम्मे है। मगर अब नदियों में लगातार प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। औद्योगिक कचरा, जल-मल, उर्वरक और कीटनाशक कचरा, प्लास्टिक और पूजा सामग्री के अवशेष नदियों में सबसे ज्यादा हैं। पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें।
