इतिहास में युद्धों को अक्सर महान उद्देश्यों, राष्ट्र की रक्षा और सम्मान की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन जब हम युद्धों के आर्थिक और सामाजिक परिणामों का विश्लेषण करते हैं, तो एक कठोर वास्तविकता सामने आती है। युद्ध केवल सेनाओं का टकराव नहीं होते, बल्कि वे धन, भूमि और संसाधनों के पुनर्वितरण का साधन भी बनते हैं। साधारण लोग युद्धों में मरते हैं, घायल होते हैं, अपने घर और खेत खो देते हैं, जबकि अत्यंत धनी वर्ग, बड़े उद्योगपति और वित्तीय घराने युद्धों के दौरान असाधारण लाभ अर्जित करते हैं। इतिहास में बार-बार यही स्वरूप दिखाई देता है कि युद्ध का सबसे बड़ा बोझ जनता उठाती है, लेकिन उससे उत्पन्न संपत्ति और शक्ति का सबसे बड़ा लाभ समाज के शीर्ष पर बैठे छोटे-से वर्ग को मिलता है।
इस तथ्य को समझने के लिए बीसवीं सदी के आरंभिक युद्धों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। विशेष रूप से प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान आर्थिक लाभ का वितरण अत्यंत असमान था। उस समय के आर्थिक अभिलेखों के अनुसार, युद्ध के दौरान अमेरिका में लगभग इक्कीस हजार नए करोड़पति बने। ये वे लोग थे, जिनकी आय युद्ध के समय अचानक बहुत बढ़ गई। दूसरी ओर, लाखों सैनिकों ने खाइयों में लड़ते हुए अपनी जान गंवाई या गंभीर रूप से घायल हुए। युद्ध से उत्पन्न धन उन लोगों के पास गया, जो हथियार, धातु, कपड़ा, जूते और परिवहन सामग्री का उत्पादन कर रहे थे।
उद्योगों के लाभ के आंकड़े इस असमानता को स्पष्ट रूप से दिखाते हैं। युद्ध के दौरान बारूद और गोला बनाने वाली कंपनियों की आय कई गुना बढ़ गई। इस्पात उद्योग, जो जहाज, तोप और हथियार बनाने के लिए आवश्यक था, उसके लाभ में भी असाधारण वृद्धि हुई। तांबा, कोयला और अन्य धातुओं से जुड़े उद्योगों ने भी भारी लाभ कमाया, क्योंकि युद्ध में इन संसाधनों की मांग बहुत अधिक थी। मुनाफा कमाने वाले उद्योगों के मालिक युद्ध के मैदान से दूर थे, लेकिन युद्ध की परिस्थितियों ने उन्हें अत्यंत समृद्ध बना दिया।
जोखिम सैनिक उठाते हैं और लाभ उद्योगपति प्राप्त करते हैं
युद्ध के समय सरकारें सेना और हथियारों पर विशाल धन खर्च करती हैं। यह धन आखिर जनता से करों के रूप में लिया जाता है, लेकिन यह बड़े व्यापारिक समूहों और उद्योगों के अनुबंधों में बदल जाता है। इस प्रकार जनता का धन युद्ध उद्योग के माध्यम से कुछ शक्तिशाली कंपनियों के मुनाफे में परिवर्तित हो जाता है। युद्ध एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बना देता है, जिसमें जोखिम सैनिक उठाते हैं और लाभ उद्योगपति प्राप्त करते हैं।
भूमि और संसाधनों पर नियंत्रण भी महत्त्वपूर्ण परिणाम होता है। इतिहास में अनेक बार युद्धों के बाद विजित क्षेत्रों की भूमि को नए शासकों और उनके समर्थकों में बांट दिया गया। उदाहरण के लिए गाल पर रोमन फतह के बाद विशाल भूमि रोमन कुलीनों और सैन्य अधिकारियों के अधिकार में चली गई। स्थानीय किसानों को उनकी जमीन से हटाकर बड़े कृषि क्षेत्रों का निर्माण किया गया, जिन पर अमीर जमींदारों का नियंत्रण था। इस प्रक्रिया ने भूमि के स्वामित्व को कुछ ही परिवारों के हाथों में केंद्रित कर दिया। मध्ययुगीन यूरोप में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। इंग्लैंड पर नार्मन आक्रमण के बाद वहां की अधिकांश भूमि विजेता नार्मन कुलीनों को दे दी गई। पुराने स्थानीय जमींदारों की संपत्ति छीन ली गई और राजा के प्रति वफादार अभिजात वर्ग को विशाल जागीरें प्रदान की गईं। इस परिवर्तन ने इंग्लैंड की सामाजिक और आर्थिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया।
यूरोपीय शक्तियों ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में कब्जा किया
औपनिवेशिक युग में यह प्रक्रिया और भी व्यापक हो गई। यूरोपीय शक्तियों ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के विशाल क्षेत्रों पर सैन्य शक्ति के माध्यम से कब्जा किया। इसके बाद वहां की भूमि, खनिज संपदा और कृषि उत्पादन को अपने नियंत्रण में ले लिया गया। अनेक क्षेत्रों में पारंपरिक सामुदायिक भूमि व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया और ऐसी खेती शुरू कराई गई, जिससे औद्योगिक देशों के लिए कच्चा माल उपलब्ध हो सके। स्थानीय समाज को सस्ते श्रम का स्रोत बना दिया गया, जबकि वास्तविक लाभ विदेशी कंपनियों और औपनिवेशिक शासकों को मिला।
एक और महत्त्वपूर्ण पहलू युद्ध के बाद होने वाला पुनर्निर्माण है। जब शहर, सड़कें, पुल और कारखाने नष्ट हो जाते हैं, तो उन्हें फिर से बनाने के लिए व्यापक स्तर पर निर्माण कार्य शुरू होते हैं। इन परियोजनाओं के अनुबंध बड़े निर्माण और आर्थिक समूहों को दिए जाते हैं। इस प्रकार युद्ध पहले विनाश पैदा करता है, फिर उसी विनाश को ठीक करने के नाम पर नया आर्थिक अवसर पैदा करता है। प्राकृतिक संसाधनों और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण भी अनेक युद्धों का एक प्रमुख कारण रहा है। जिन क्षेत्रों में तेल, खनिज या उपजाऊ भूमि की प्रचुरता होती है, वे अक्सर सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं। जब कोई शक्तिशाली राष्ट्र ऐसे क्षेत्र पर सैन्य नियंत्रण स्थापित करता है, तो वहां के संसाधनों का उपयोग अक्सर बड़ी कंपनियों और आर्थिक समूहों के हित में किया जाता है। स्थानीय समाज को इन संसाधनों से बहुत कम लाभ मिलता है, जबकि बाहरी शक्तियां अत्यधिक धन अर्जित करती हैं।
इतिहास के अनेक विचारकों ने इस वास्तविकता की ओर ध्यान आकर्षित किया है। स्मेडली बटलर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि युद्ध का लाभ बहुत कम लोगों को मिलता है, जबकि उसकी कीमत लाखों लोग चुकाते हैं। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध का विश्लेषण करते हुए बताया कि युद्ध के दौरान अमेरिका में लगभग इक्कीस हजार नए करोड़पति बने। जार्ज ऑरवेल ने लिखा कि आधुनिक युद्धों के पीछे अक्सर आर्थिक हित और सत्ता की राजनीति काम करती है। लियो टाल्स्टाय ने भी यह तर्क दिया कि युद्धों में वास्तविक बलिदान आम लोगों का होता है, जबकि निर्णय और लाभ शासक वर्ग के हाथों में रहता है।
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