हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम में चुने गए 15 वर्षीय वैभव सूर्यवंशी को इंग्लैंड और आयरलैंड दौरे के दौरान अपनी टीम से अलग चेंजिंग रूम का उपयोग करना होगा। हालांकि, यह व्यवस्था या कानून कुछ लोगों को अटपटी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे खिलाड़ियों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ से जुड़े गंभीर कारण है। इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) और इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) के नियमों के अनुसार 16 वर्ष से काम आयु के खिलड़ियों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किये जाते हैं।
वैभव सूर्यवंशी भारतीय क्रिकेट की सबसे चर्चित युवा प्रतिभाओं में से एक हैं। बिहार के इस बल्लेबाज ने मात्र 12 वर्ष की आयु में रणजी ट्रॉफी में बिहार का प्रतिनिधित्व कर सबका ध्यान आकर्षित किया था। इसके बाद 14 वर्ष की उम्र में उन्हें इंडियन प्रिमियर लीग (IPL) में खेलने का अवसर मिला, जहां उन्होंने वरिष्ठ और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ ड्रेसिंग रूम साझा किया।
उस समय भारत में उनके लिए अलग चेंजिंग रूम जैसी कोई व्यवस्था नहीं की गई थी, लेकिन अब इंग्लैंड और आयरलैंड दौरे पर 15 वर्षीय वैभव के लिए अलग चेंजिंग रूम की व्यवस्था की जा रही है। इसका कारण यह नहीं है कि खिलाड़ी बदल गया है, बल्कि यह है कि जिस देश में प्रतियोगिता आयोजित हो रही है, वहां के नियम अलग हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि इंग्लैंड और आयरलैंड जैसे देशों में नाबालिग खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए ऐसे नियम आवश्यक माने जाते हैं, तो क्या भारत को भी इस दिशा में गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए?
इंग्लैंड और आयरलैंड में “सेफगार्डिंग” (Safeguarding) का अर्थ केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि नाबालिग खिलाड़ियों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक कल्याण को सुनिश्चित करना भी है। इसी कारण 16 वर्ष से कम आयु के खिलाड़ियों के लिए अलग चेंजिंग रूम, अभिभावकों की उपस्थिति और विशेष निगरानी जैसी व्यवस्थाएं की जाती हैं।
वैभव सूर्यवंशी का मामला यह प्रश्न भी उठाता है कि क्या भारत में भी उभरते किशोर खिलाड़ियों की सुरक्षा और देखभाल के लिए ऐसे स्पष्ट दिशानिर्देशों पर विचार किया जाना चाहिए?
भारतीय खेल जगत में कम उम्र के खिलाड़ियों का आना कोई आम बात नहीं है। क्रिकेट, बैडमिंटन, शतरंज, फुटबॉल, कुश्ती और अन्य खेलों में कई प्रतिभाएं किशोरावस्था में ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच चुकी हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसे खिलाड़ी शारीरिक और मानसिक रूप से विकसित हो रहे होते हैं, तब उस स्थिति में उनका देखभाल और भावनात्मक सुरक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किशोरावस्था बहुत ही संवेदनशील उम्र होती है। इस उम्र में व्यक्ति अपनी, पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक व्यवहार को विकसित कर रहा होता है। युवा खिलाड़ियों के साथ अधिक रहने के बाद किशोर खिलाड़ी अनावश्यक दबाव, असहजता और तनाव महसूस कर सकता है।
खेल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ मानते हैं कि कम उम्र के खिलाड़ियों को ऐसा माहौल मिलना चाहिए जहां वे खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सकें। सुरक्षा का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा से नहीं होता, बल्कि मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा से भी होता है।
भारत में खेलों का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। आज अधिक से अधिक बच्चे खेल जगत में अपनी करियर बना रहे है। ऐसे में केवल प्रतियोगिताओं या उससे जुड़ी सुविधाओं पर ध्यान देना ही काफी नहीं है। खिलाड़ियों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और बड़े खिलाड़ियों के साथ उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए इस पर भी हमें काम करने की जरूरत है। इससे न केवल खिलाड़ी या उनके पारिवार का भरोसा बढ़ेगा, साथ ही खेल संस्थाओं की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।
इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना है कि किसी के नियम की नकल नहीं करना है, लेकिन इस विषय पर गहरे चिंतन-मनन या व्यापक चर्चा के बाद नियमों का स्वरूप तय करना चाहिए। यह व्यवस्था केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं है। पिछले वर्ष इंग्लैंड के प्रसिद्ध फुटबॉल क्लब आर्सेनल FC के युवा खिलाड़ी मैक्स डाउमैन को भी 16 वर्ष की आयु पूरी होने तक अपनी टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों से अलग चेंजिंग रूम इस्तेमाल करना पड़ा था।
यह दर्शाता है की यूरोपीय खेल संस्थान नाबालिग खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। यह नियम किसी विशेष छूट या भेदभाव के लिए नहीं, बल्कि खिलाड़ी के कल्याण और सुरक्षा के हित के रूप में देखा जाए। वैभव सूर्यवंशी के मामले में भी इंग्लैंड और आयरलैंड के क्रिकेट बोर्ड समान प्रोटोकॉल फॉलो कर रहे हैं।
नाबालिग खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर दुनिया के अन्य खेलों में भी कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। मामला स्पेन के एक युवा फुटबॉलर लमीन यामल का ही लें। यूरो 2024 के दौरान जर्मनी के श्रम कानून (Youth Labour Protection Law) का था। उस समय लमीन यामल केवल 16 वर्ष के थे। जर्मनी में 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के लिए देर रात तक काम करने पर प्रतिबंध है। खिलाड़ियों को विशेष छूट मिलती है, लेकिन आमतौर पर उनकी गतिविधियां रात 11 बजे के बाद नहीं होनी चाहिए।
इसी कारण यूरो 2024 के दौरान ऐसी चर्चाएं भी हुईं थी कि यदि मैच अतिरिक्त समय (Extra Time) तक जाता है तो स्पेनिश फुटबॉल महासंघ पर जुर्माना लग सकता है। इस बहस ने यह दिखाया कि विकसित देश युवा खिलाड़ियों के स्वास्थ्य, आराम और सुरक्षा को लेकर कितने संवेदनशील हैं।
वैभव सूर्यवंशी, मैक्स डाउमैन और लमीन यामल के उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि महान खिलाड़ी बनने से पहले वे बच्चे हैं और उनकी सुरक्षा किसी भी पदक या रिकॉर्ड से अधिक महत्वपूर्ण है।
(कल्याणी चौधरी जनसत्ता ऑनलाइन में इंटर्न हैं)
T20I में सबसे कम उम्र में डेब्यू करने वाले भारतीय, सैमसन-पंत भी लिस्ट का हिस्सा; वैभव सूर्यवंशी इतिहास रचने के करीब
टी20 इंटरनेशनल के लिए भारतीय टीम में पहली बार वैभव सूर्यवंशी का चयन हुआ है। वह अब सबसे कम उम्र के भारतीय इंटरनेशनल डेब्यूटेंट बनने की दहलीज पर हैं। टी20 इंटरनेशनल में सबसे कम उम्र में डेब्यू करने वाले खिलाड़ियों की लिस्ट देखने के लिए क्लिक करें।
