दुनिया भर में विकसित देशों के लिए भारत एक विशाल उपभोक्ता बाजार, निवेश का भरोसेमंद ठिकाना और रणनीतिक साझेदारी का प्रमुख केंद्र है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने यह समझा है कि भारत की अर्थव्यवस्था में निवेश की बहुत संभावनाएं हैं। इन देशों के लिए भारत का सबसे बड़ा आकर्षण इसका विशाल मध्यम वर्ग, बढ़ती खपत क्षमता और युवा आबादी है, जो आटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल सेवाओं की मांग को लगातार बढ़ा रही है।

दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में शामिल भारत की कम लागत वाली कुशल श्रमशक्ति और विशाल बाजार पूंजीवादी शक्तियों की आर्थिक महत्त्वाकांक्षी योजनाओं को साकार करने के लिए मुफीद नजर आते हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत पर शुल्क कम करने की अचानक घोषणा ने सबको चमत्कृत किया है, वहीं अमेरिकी प्रशासन को चुनौती देकर यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौता अभूतपूर्व माना जा रहा है। भारत को यह उम्मीद है कि विकसित देशों के साथ व्यापार से दीर्घकालिक लाभ होंगे। अमेरिका और यूरोप में क्रय-शक्ति अधिक है और वे गुणवत्ता वाले उत्पादों के लिए ऊंची कीमत देने को तैयार रहते हैं।

इससे भारत के दवा उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, कपड़ा उद्योग, वाहन पुर्जे, इंजीनियरिंग सामान, रत्न तथा आभूषण और कृषि-प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों को विस्तार मिल सकता है। विकसित देशों के साथ व्यापार और समझौते भारत में विदेशी निवेश बढ़ा सकते हैं, जिससे उत्पादन क्षमता, रोजगार और आधुनिक तकनीक का हस्तांतरण संभव होता है। यह वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका मजबूत कर सकता है।

विकसित देशों की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं और पूंजीवादी समाज के साथ कदमताल मिलाते भारत के विकासशील समाज के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं। विकसित देश यानी पूंजी, तकनीक, प्रति व्यक्ति आय, बचत, निवेश और नागरिकों के रहन-सहन जैसी विशेषताओं में उच्च स्तर और मजबूत अर्थव्यवस्था। जबकि विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय कम होती है, राष्ट्रीय आय के अनुपात में बचत और निवेश का निम्न स्तर होता है।

अधिक जनसंख्या होती है, लेकिन वह कम कार्यकुशल होती है। पूंजी निर्माण की दर कम तथा आयात की मात्रा अधिक रहती है। इन देशों में पूंजी और तकनीकी का आमतौर पर दूसरे देशों से आयात होता है। विकासशील देशों में जनसंख्या का अधिकांश भाग कृषि में संलग्न रहता है, फिर भी उत्पादन देश की आवश्यकता से कम बना रहता है।

विकसित देशों को कच्चा माल, श्रम-आधारित उत्पाद चाहिए, जबकि विकासशील देशों को पूंजी, तकनीक, मशीनें और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद चाहिए। इसलिए दोनों का व्यापार अक्सर जरूरतों की पूर्ति पर आधारित होता है। ऐसे में भारत द्वारा विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना भविष्य में आर्थिक अवसरों के साथ कुछ रणनीतिक जोखिम भी पैदा कर सकता है।

विकसित देशों की कंपनियां, तकनीक, पूंजी और ब्रांड के दम पर भारतीय बाजार में तेजी से प्रवेश करेंगी, जिससे छोटे किसान और घरेलू उद्योग दबाव में आ सकते हैं। सस्ते आयात से व्यापार घाटा बढ़ने, स्थानीय उत्पादन कमजोर होने और रोजगार पर असर का खतरा भी रहेगा। इसके अलावा, पेटेंट, डेटा, पर्यावरण और श्रम मानकों जैसी शर्तें भारत की आर्थिक और राजनीतिक निर्णय की स्वतंत्रता सीमित कर सकती हैं।

बीते चार दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। इसमें विश्व व्यापार संगठन की नीतियों का भी बड़ा और सकारात्मक लाभ मिला है। वर्ष 1995 में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के बाद वैश्विक व्यापार नियमों में एकरूपता आई, व्यापार बाधाएं कम हुर्इं और विभिन्न देशों के बीच बाजार तक पहुंच आसान बनी।

भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह अवसर था कि वह अपनी आर्थिक क्षमता, श्रमशक्ति और सेवा क्षेत्र की ताकत के आधार पर वैश्विक मंच पर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाए। विश्व व्यापार संगठन ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में विकसित देशों के कब्जे को रोकने के लिए अनुचित सबसिडी, डंपिंग और व्यापार बाधाओं पर नियम बनाए। इसका लाभ भारत जैसे विकासशील देश को निर्यात विस्तार के रूप में मिला।

विश्व व्यापार के तहत आयात शुल्क घटाने और व्यापार को अधिक पारदर्शी बनाने की प्रक्रिया ने भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार खोले।

विश्व व्यापार संगठन और मुक्त व्यापार समझौते वैश्विक व्यापार को बढ़ाने की बात करते हैं, लेकिन इनके स्वरूप, उद्देश्य और प्रभाव में मूलभूत अंतर है। यही अंतर विकसित और विकासशील देशों के बीच व्यापार संबंधों में एक प्रकार का विरोधाभास पैदा करता है। विश्व व्यापार संगठन एक बहुपक्षीय संस्था है, जो नियम आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को स्थापित करती है, जबकि मुक्त व्यापार समझौता चुनिंदा देशों के बीच विशेष रियायतों और शर्तों पर आधारित क्षेत्रीय या द्विपक्षीय व्यवस्था है।

इस कारण विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच व्यापार में समानता से कहीं ज्यादा असंतुलन बढ़ता दिखाई देता है।

दूसरी ओर, मुक्त व्यापार समझौते बिल्कुल अलग हैं। मुक्त व्यापार समझौते में कुछ देश आपस में शुल्क घटाकर या समाप्त करके व्यापार को तेज करते हैं। विकसित देशों के लिए मुक्त व्यापार समझौते अक्सर एक रणनीतिक हथियार बन जाते हैं। वे विश्व व्यापार संगठन में जब व्यापक सहमति नहीं बना पाते, तब मुक्त व्यापार समझौते के माध्यम से अपने हितों को आगे बढ़ाते हैं।

विकसित देश मुक्त व्यापार के नाम पर केवल शुल्क घटाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पेटेंट नियम, डेटा स्थानीयकरण पर रोक, श्रम और पर्यावरण मानकों की कठोर शर्तें, सरकारी खरीद में विदेशी कंपनियों को अवसर तथा निवेश विवाद निपटान जैसी शर्तें जोड़ देते हैं।

इन शर्तों का असर यह होता है कि विकासशील देशों की आर्थिक नीतियों को लेकर स्वतंत्रता सीमित होने लगती है। पूंजीवादी शक्तियों का प्रभाव राजनीतिक रूप से भी पड़ने की संभावना बढ़ जाती है और यह स्थिति भारत जैसे विकासशील और लोकतांत्रिक देश की चुनौतियां बढ़ा सकती है।

व्यापार को लेकर नए समझौतों से अमेरिका और यूरोपीय बाजारों में भारत की पहुंच बढ़ने से निर्यात में वृद्धि होगी, विदेशी निवेश और तकनीक हस्तांतरण के अवसर भी मिलेंगे। वहीं विकसित देशों की विशाल कंपनियां कम शुल्क के साथ घरेलू बाजार में प्रवेश करेंगी, तो भारत के छोटे और मध्यम वर्ग के उद्योग तथा कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है।

दरअसल, विकसित देश नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था की बात करते हुए भी अपने हितों के लिए क्षेत्रीय समझौतों का सहारा लेते हैं। भारत और विकसित देशों की प्राथमिकताओं में गहरा अंतर है। भारत की मुख्य चिंता गरीबी घटाना, रोजगार बढ़ाना, कृषि और ग्रामीण विकास, सस्ती शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक न्याय की स्थापना है।

वहीं विकसित देशों की प्राथमिकताएं उच्च जीवन-स्तर, तकनीकी नवाचार, पर्यावरण मानक, कड़े श्रम नियम और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ी हैं। जाहिर है, भारत और विकसित देशों की नीतियां और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं।

इसलिए भारत के लिए जरूरी है कि वह मुक्त व्यापार को सुरक्षा-कवच, चरणबद्ध उदारीकरण और घरेलू क्षमता-वृद्धि के साथ संतुलित रूप में लागू करे। भारत के स्थायी विकास के लिए रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास, उद्योगों का विस्तार तथा ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक सुधार अत्यंत आवश्यक हैं। इन्हीं आधारों पर देश की आर्थिक मजबूती, सामाजिक संतुलन और दीर्घकालिक प्रगति सुनिश्चित की जा सकती है।