गर्मी की दस्तक के साथ ही लोग अपने गर्म कपड़े संभालने लगते हैं, लेकिन ऐसा भी कोई व्यक्ति होता है, जो इस मामले में थोड़ी अलग संवेदना रखता है। वह अपना आधी बाजू का एक स्वेटर अपनी कमीजों की अलमारी में ही रख देता है। वह गर्मियों में भी दिखता रहता है, तो उसे मन ही मन सुकून मिलता है। दरअसल, एक दफा उसका यह स्वेटर ढूंढ़ने से भी नहीं मिला, तो वह बेचैन हो गया था और उसने सारा घर सिर पर उठा लिया। परिवार के सारे सदस्य ढूंढ़ने में लग गए। दो दिनों बाद बमुश्किल पलंग के नीचे बने दराज से मिला। तब से उस व्यक्ति ने इसे सर्दियों के कपड़ों के साथ संभाल कर रखना छोड़ दिया।
अब ऐसा लगता है कि वह अपना यह खासमखास स्वेटर कभी नहीं छोड़ पाएगा, क्योंकि स्वेटर पहनते ही उसकी मधुर यादों की एक खिड़की खुल जाती है। एहसासों की गरमाहट महसूस करते-करते सालों-साल पीछे लौट जाता है। उसकी मां के जिन हाथों ने कभी यह स्वेटर बुना था, अचानक उसे सिर-माथे पर फिरते महसूस होते हैं। वह छात्र था, तो बुनते-बुनते उसकी मां उसकी पीठ पर लगा कर देखती कि नाप ठीक है न! कभी खेल रहा होता, तो आवाज लगा कर बुलाती और छाती से लगा कर स्वेटर की नाप जांच लेती।
कई छात्र मानते हैं कि पुराने-घिसे कपड़े पहन कर पढ़ाई करने में एकाग्रता बढ़ती है
हर किसी को अपनी पुरानी चीजों से जुड़ाव होता है। पुराना वाहन या पुरानी कलम ही क्यों न हो, उससे चलना या लिखना सहूलियत भरा लगता है। इसीलिए परीक्षार्थी अमूमन नए के बजाय पुरानी कलम लेकर ही परीक्षा के प्रश्नोत्तर लिखने में बेहतरी महसूस करते हैं। पुरानी कलम अंगुलियों पर बैठी होती है। कई छात्र मानते हैं कि पुराने-घिसे कपड़े पहन कर पढ़ाई करने में एकाग्रता बढ़ती है।
जीवन सिखाता है कि साजो-सामान और तामझाम जुड़ता रहेगा और खोता रहेगा। कुछ भी सदा के लिए संग नहीं रहेगा। कभी हम त्याग देंगे, कभी वह अलविदा कह देगा। शुरुआती दौर में, हर बिछड़ना दिल तोड़ता है, लेकिन समय के साथ समझ आता है कि हर किसी का आना किसी मकसद से होता है, कुछ सिखाने, कुछ आराम देने और कुछ मजबूत बनाने के लिए। हमेशा के लिए कुछ भी नहीं ठहरता, बस एक अध्याय या दौर की तरह आता है और अपना कर्म निभा कर चला जाता है। सीख मिलती है कि साथ यहीं तक था।
इस परम सत्य को दिल से स्वीकार करते ही गजब की शांति और सुकून का अनुभव होता है। जो मौजूदा दौर में हाथ में है, वही हाल-फिलहाल हमारा है। जो चला गया, छूट गया, नष्ट हो गया, मियाद पूरी कर गया, उसका हमारा नाता वहीं तक था। यही जीवन है- आना और जाना, मिलना और बिछुड़ना, और हर अदल-बदल पर खुद को थोड़ा समझाना, सांत्वना देना। कुदरत ने अनगिनत मिसालें पेश कर सिखाया है कि हर चीज का प्रारंभ और अंत निश्चित है। बिछुड़ने के बावजूद कुदरत ने जीवित रहने के हौसले से लैस रहने की प्रवृत्ति भी कूट-कूट कर भरी है।
सयाने लोग समझाते रहे हैं कि पूरा अस्तित्व, हर एक पल, उत्सव की तरह आनंदित करने योग्य है। इसलिए खुद को एक दौर या एक वस्तु विशेष तक सीमित या बांध कर न रखा जाए। जो व्यक्ति अपनेपन के मोह के धागे तोड़ कर स्वतंत्र भाव से जीने लगता है, वह किसी माया-बंधन में नहीं बंधता। जो होता है और हो रहा है, उसे सहर्ष गले लगा लिया जाए। अब तक जो पाया है, उसे भूल जाया जाए। अतीत को भूलने और उससे अलग होने के बाद पीछे मुड़-मुड़ कर देखना व्यर्थ है।
वर्तमान में रहने की जरूरत है, क्योंकि जीवन परिवर्तन का ही नाम है। इसलिए नियंत्रित करने की कोशिश न ही की जाए। हर इंसान स्वयं में पूर्ण है। पूर्ण होने या बनने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं रहती। जो कुछ चाहिए, वह हरेक के भीतर ही है। इसे पहचानने वाला व्यक्ति शर्तिया समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। कोई खोजा जाता है, वह अतिथि नहीं है, आतिथेय है। बाहर से हासिल नहीं करना, वह तो भीतर ही समाया है।
प्रभुत्व की चाह में विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने में तमाम देश और उद्योग घराने पीछे नहीं हटते। मिस्र, यूनान, ब्रिटिश समेत कई साम्राज्य और वैश्विक स्तर पर मशहूर कई कारोबारी दिग्गज दुनिया या बाजारों पर हावी रहे। फिर लापता भी हो गए। दूसरे शब्दों में, जीवन का भाव होना चाहिए कि ‘जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा होगा। तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया, जो नष्ट हो गया? वास्तविकता यही है कि तुमने जो पाया, यहीं से पाया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, कल किसी और का हो जाएगा।’ सृष्टि की इस नसीहत और नियम का बखान एक पुराने फिल्मी गीत के बोल क्या खूब करते हैं- ‘…जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया/ जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया/ गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां/ मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया..।’
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सार्वजनिक शोक कई बार रणनीतिक माना जाता है- सहानुभूति, या सांस्कृतिक निकटता का निमंत्रण। कुछ लोग शोक सामग्री की इस नई लहर को ‘प्रदर्शनकारी शोक’ कहते हैं, क्योंकि ये ‘लाइक’ की गिनती संभावित रूप से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ने या कुछ मामलों में पैसे भी दिला सकती है। जब 26 जनवरी, 2020 को अमेरिका के मशहूर बास्केटबाल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट की मृत्यु हुई, तो सोशल मीडिया मानो एक विशाल स्मारक बन गया, लेकिन शोक मनाने वालों की आलोचना हुई। कहा गया कि आप एक ऐसे बास्केटबाल खिलाड़ी के बारे में आनलाइन क्यों आंसू बहा रहे हैं, जिसे आप निजी तौर पर जानते तक नहीं! मगर जो लोग सचमुच दुख का इजहार करने की कोशिश करते हैं, उनके लिए आनलाइन माहौल अक्सर भ्रामक बन जाता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
