एक दिन विपक्ष की एक बड़ी पार्टी में अंतर्कलह। पार्टी के एक नेता ने कहा कि वे वरिष्ठों से असुरक्षित महसूस करते हैं! फिर चर्चा में आई एक नेता की विवादित टिप्पणी। ऐसे ही एक बहस में एक ने जब दूसरे प्रवक्ता को अपशब्द कहे तो उधर से भी अपशब्दों का हमला हुआ। हमारे अधिकांश बहस कार्यक्रमों का शायद जीवन-तत्त्व ही यही है। जब क्ता-प्रवक्ताओं के पास तर्क और तथ्य नहीं बचते, तो मामला ‘गाली-गलौज’ तक पहुंच जाता है और कभी-कभार हाथापाई की नौबत भी आ जाती है।

आगे था सतहत्तरवां गणतंत्र दिवस और इस दिवस की शोभा बढ़ाने आईं यूरोपीय संघ की मुख्य और अन्य नेता। इस गणतंत्र दिवस की ‘थीम’ रही ‘वंदे मातरम्’। मिनट दर मिनट के हिसाब से कार्यक्रम, शहीद स्मारक पर सलामी, राष्ट्रगान ‘जन गण मन’, विदेशी मेहमानों का स्वागत, राष्ट्रपति का स्वागत, उपराष्ट्रपति का स्वागत, अंतरिक्ष यात्रा से लौटकर आए वायुसेना के अधिकारी शुभांशु शुक्ला को अशोक चक्र, परेड और झांकियां, ‘आपरेशन सिंदूर’ की झांकी और ‘वंदे मातरम्’ को लेकर अखिल भारतीय वृंद नृत्य व गान का अद्भुत संयोजन।

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अगले रोज यूरोपीय संघ के साथ भारत के ‘सभी सौदों की जननी’ ने बड़ी खबर बनाई, जिसमें दोनों पक्ष अपने को जीते हुए की स्थिति में बता कर बल्ले-बल्ले करते दिखे। ‘शिकायत’ रही कि विपक्ष के नेता को आगे की सीट नहीं दी गई… जवाब आया कि ये सब नियमानुसार किया जाता है!

तीस जनवरी को गांधी समाधि पर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, रक्षा मंत्री आदि द्वारा दी गई श्रद्धांजलि, पृष्ठभूमि में ‘हरे राम हरे राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ और फिर ‘प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो’ भजन। इसके आगे ‘पद्म सम्मानों’ की घोषणा थी और एक मरी मरी-सी चिल्ल-पों थी कि ये सम्मान उन राज्यों के व्यक्तियों को ज्यादा दिए गए है, जिनमें कुछ दिन बाद चुनाव होेने हैं। इस आरोप का जवाब आया कि ऐसा तो आप करते थे। हम तो ‘गुण के ग्राहक’ हैं!

इसके आगे की खबर बनाई विश्वविद्यालय अनुदान (यूजीसी) द्वारा शिक्षा संस्थानों में ‘नए समानता नियमों’ को लागू करने के आदेश ने और प्रतिक्रिया में सवर्ण समाज के युवाओं द्वारा नियमों के अखिल भारतीय विरोध ने! पांच-छह दिन चैनलों ने इस ‘स्वत: स्फूर्त विरोध’ को तवज्जो नहीं दी, लेकिन जब आंदोलन सोशल मीडिया से भी छलकने लगा और सरकार की सर्वत्र आलोचना होने लगी, तो चैनलों ने यूजीसी के विवादित नियमों को अपनी बहसों का विषय बनाया।

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तब मालूम हुआ कि केंद्र सरकार के भरोसेमंद मतदाता और सतत् पक्षकार सवर्ण समाज के खिलाफ सरकार और यूजीसी ने ऐसे नियम बनाए जो सामान्य वर्ग को निशाने पर रखते हैं। ये नियम एससी, एसटी, ओबीसी विद्यार्थियों को इतना अधिकार देते हैं कि किसी सवर्ण छात्र के खिलाफ आरोप उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई आमंत्रित कर सकता है। इनके अनुसार, आधारहीन और झूठे आरोप किसी भी ‘सवर्ण’ को अपराधी बनाकर सजा दिला सकते हैं, उसकी पढ़ाई-लिखाई को बर्बाद कर सकते हैं।

इसके विरोध में सवर्ण समाज ने खुल कर बोला। टीवी की बहसों में आने वाले सत्ता प्रवक्ता सिरे से गायब दिखे। सवर्ण समाज के प्रवक्ता कहते रहे कि सत्ता दल ने पहले हमारा वोट लिया, अब नया वोट बैंक बनाने के लिए हमें ही ‘निशाने’ पर रख दिया। इन नियमों के रहते स्कूलों और विश्वविद्यालय परिसरों में अब सिर्फ ‘जाति युद्ध’ होंगे और सारा समाज तहस-नहस हो जाएगा।

‘बंटेगे तो कटेंगे’ कहने वाले खुद ‘बंटो और कटो’ की नीति पर चल रहे हैं… यह नहीं होना है… हम अदालत जाएंगे..! और पहली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के इन नियमों को लागू करने पर रोक लगा दी और कहा कि इससे विभाजन बढ़ेगा… यह ‘सवर्ण समाज’ के प्रति भेदभाव युक्त है… इसकी भाषा अस्पष्ट है… हम आगे जा रहे हैं या पीछे। इस मामले में अभी 2012 के नियम ही लागू रहेंगे, जिनमें निराधार या झूठे आरोप लगाने वालों को भी सजा की व्यवस्था है।

एक राष्ट्रवादी एंकर ने तो चेतावनी तक दे दी कि सरकार किसी गलतफहमी में न रहे। यह सरकार जाति विभाजन बढ़ाना चाहती है… यह ‘गंदी राजनीति’ है… इस कानून को वापस लो!

लेकिन अगली सुबह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नामी नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की विमान दुर्घटना में अचानक मृत्यु ने राजनीति और चैनलों को शोकमग्न कर दिया। इस दुर्घटना पर विपक्षियों की ओर से कई भिन्न राय आई, लेकिन शरद पवार की हिदायत ने शोक को गहन शोक में बदल दिया। चलते चलते: यूजीसी नियमों पर अदालत के स्थगन आदेश के बाद जेएनयू के वामपंथी विद्यार्थियों ने मोर्चा संभाला और विरोध प्रदर्शन करने लगे। सत्ता के आगे, इधर कुआं उधर खाई!