विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक निर्देश से लोग रातोरात दो खेमों में बंट गए। अचानक सैकड़ों ‘परीक्षक’ सामने आ गए, जो हर किसी पर इस या उस पार होने के विकल्प के साथ प्रश्न खड़ा करने लगे। यों यह समस्या पानी के बुलबुले की तरह है, पर ऐसे परेशान करने वाले सवाल आगे नहीं आएंगे, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता है। मूल समस्या तात्कालिकता में नहीं है। सामाजिक बदलाव के अधूरे सपने और आधे मन से प्रयास के कारण हम अपेक्षित सामाजिक रचना के लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं। न अस्पृश्यता समाप्त हुई, न जातीय चेतना की जड़ें हिल पाईं। ऐसा क्यों हुआ, इसका उत्तर ही समाधान की राह बताता है। प्रत्येक समाज की अपनी यात्रा में कभी न कभी कठिन और कठोर प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। तब उसके दो विकल्प होते हैं। पहला, उसे टालना और भविष्य पर छोड़ देना तथा उसका प्रत्यक्ष सामना करने से बच निकलना। यह अधिक प्रचलित रास्ता है। दूसरा, स्वतंत्रता और समानता के बुनियादी उसूलों को सामने रखकर उसका सामना करना। इतिहास ने साबित किया है कि दूसरा रास्ता ही फलदायी रहा है।

यहां अमेरिका की एक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख उपयोगी है। वहां राजनीतिक रूप से प्रभावशाली, सामाजिक रूप से ‘प्रतिष्ठित’, आर्थिक रूप से संपन्न- सभी दास प्रथा से लाभान्वित थे। अमेरिका के तेरहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने जब इसे समाप्त करने का संकल्प लिया, तब उनके सामने विलक्षण स्थिति थी। उनके मंत्रिमंडल में एक भी अपवाद नहीं था, जिसके पास पचास-सौ दास नहीं हो। यहां तक कि अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थामस जैफरसन जो ‘सभी मनुष्य बराबर है’ के प्रवचनकर्ता थे, वे भी इस गैरबराबरी के पोषक थे। भले ही तब लिंकन को पता नहीं था, पर इतिहास ने इस कड़वे सच से भी पर्दा उठा दिया। दोहरे चरित्र का यह चरम था।

लिंकन के सामने राजनीतिक विद्रोह और राष्ट्र के विघटन की चुनौती थी

लिंकन के सामने राजनीतिक विद्रोह और राष्ट्र के विघटन की चुनौती थी। आखिर गृहयुद्ध हुआ। दास प्रथा मिटी, राष्ट्र की एकता भी बची रही। गेटिसबर्ग में गृह युद्ध में मारे गए, लापता हुए लोगों के लिए बने स्मारक के उद्घाटन भाषण में 19 नवंबर 1863 को लिंकन ने इस सफलता का जो कारण बताया, वह लोकतंत्र की सर्वमान्य परिभाषा बन गई, ‘जो सरकार जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए होती है, वह पृथ्वी से कभी नहीं मिट सकती है।’

इसका साफ संदेश था सामाजिक बदलाव के लिए संकल्प ही नहीं, मन को दृढ़ करने की आवश्यकता होती है। अमेरिकी सामाजिक संरचना में परिवर्तन स्वतंत्रता, समानता के उद्घोषक जैफरसन के भाषणों से नहीं, लिंकन के साहस से हो पाया। भारत की सामाजिक परिस्थितियां और बुराइयां अमेरिका से भिन्न हैं। इसलिए यहां अमेरिका की तरह बदलाव राजनीतिक हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति से ही संभव है। पिछली शताब्दी के पचास-साठ के दशकों में राजनीतिक दलों ने जातिवाद को मिटाने का संकल्प दिखाया था। दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण इसके बड़े नायकों में थे। दीनदयाल तो 1963 में जातिवाद के विरुद्ध अपने उद्गारों से जौनपुर की जीती हुई सीट हार गए।

तब और अब में एक चिंताजनक बदलाव हुआ है। उस काल में अस्पृश्यता और जातीय पहचान को राजनीति में नफा-नुकसान के अंदाज से कम देखा जाता था। इसलिए उस काल के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में सर्वसमावेशी चरित्र की मात्रा अधिक थी। पर समकालीन भारत में गजब का विरोधाभास है। एक ओर आधुनिक संपन्नता और बहुत सारी जगहों पर विश्वविद्यालयों की चमचमाती बहुमंजिला इमारतें हैं, वहीं लोग ‘जातीय चेतना’ में गोलबंद हो रहे हैं। आखिर चूक कहां हुई? स्वतंत्रता के बाद अस्पृश्यता और जातिवाद का हल संवैधानिक रास्ते से करने का प्रयास हुआ। इसने सामाजिक रास्ते से परिवर्तन के प्रयास का अर्ध-राजनीतिकरण कर दिया। परिणाम सामने है- ‘नौ दिन चले, ढाई कोस’। कानून और अवसर की समानता की गारंटी सामाजिक सोच नहीं बदल पाती है, न ही शुद्ध सांस्कृतिक पहचान की स्थापना के द्वारा इसे बदला जा सकता है।

समस्या की जड़ में सामंती मानसिकता है, जो संविधान में घोषित समानता और भ्रातृत्व को जमीन पर उतरने नहीं देती है। स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण ने निदान की राह खोली। आर्य समाज, प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज, सत्यशोधक समाज आदि सामाजिक समानता की चेतना जागृत करते रहे। चाल धीमी, पर प्रभावी थी। उन सबके द्वारा सामाजिक उन्नति को सुधार और सांस्कृतिक चेतना, दोनों के द्वारा सुनिश्चित किया जा रहा था। महादेव गोविंद रानाडे का सामाजिक सुधार सम्मेलन शिक्षित और संपन्न लोगों को उस दलदल से निकाल रहा था। महात्मा गांधी ने 1933 में वर्धा के राम मंदिर से अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान शुरू किया, जो नौ महीने चला। गांधी को लगातार विरोध, प्रश्नों और कुतर्क पर आधारित विवादों का सामना करना पड़ा था। पर वे लक्ष्य के प्रति संकल्पित रहे। वह अंतिम सुनियोजित, सुविचारित और गैर-राजनीतिक प्रयास साबित हुआ।

सामाजिक प्रश्नों पर राजनीति का वर्चस्व अब एकाधिकार तक पहुंच गया है। परिणामत: विवेक और तर्क तथा दीर्घकालिक सोच का उपयोग समाप्त हो गया है। सामाजिक बुराइयों को सामाजिक संघर्ष का रूप देना राजनीति में उपयोगी हो गया। इसमें हर पक्ष की अपनी दलील और अपना स्वार्थ होता है। बाबा साहब आंबेडकर ने प्रश्न खड़ा किया था कि कांग्रेस, हिंदू महासभा, साम्यवादियों और साधु-संतों ने अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए क्या किया है? अब इस प्रश्न की प्रासंगिकता और इसका दायरा, दोनों बढ़ गए हैं- ‘हम सबने अस्पृश्यता और जातिवाद को मिटाने के लिए क्या किया है?’

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समकालीन समाज तेजी से बदल रहा है। हर दिन अखबारों और डिजिटल माध्यमों में पीड़ा, असमानता और संघर्ष की खबरें आम हो गई हैं। आदिवासी अंचलों में विस्थापन, शहरों की ओर बढ़ता पलायन, शिक्षा से बाहर होते बच्चे और महिलाओं के साथ होती हिंसा- ये अब केवल घटनाएं नहीं, बल्कि आंकड़ों में दर्ज सच्चाइयां हैं। इन पर हम दुख व्यक्त करते हैं, सहानुभूति जताते हैं, लेकिन हमारा सामाजिक आचरण अक्सर वहीं ठहर जाता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक