विश्व की राजनीति में शक्ति के ध्रुव में परिवर्तन अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे आर्थिक प्रभाव और कूटनीतिक अवसरों के माध्यम से आकार लेता है। हाल ही में चीन की यात्रा पर पहले डोनाल्ड ट्रंप और उसके बाद व्लादिमीर पुतिन का पहुंचना केवल औपचारिक कूटनीतिक घटनाएं नहीं थीं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी मुलाकातों और उसके बाद हुई घोषणाओं ने दुनिया को यह स्पष्ट संकेत दिया है कि चीन एक आर्थिक शक्ति से आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका के बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में तेजी से उभर रहा है।

वहीं व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग ने संयुक्त रूप से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत की तथा दबाव, वर्चस्ववादी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के एकतरफा उपयोग पर गहरी चिंता जताई। चीन और रूस खुद को पश्चिमी प्रभाव के समानांतर एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। अमेरिका की दशकों पुरानी सहयोग और साझेदारी पर आधारित कूटनीति को पीछे छोड़कर आर्थिक हितों पर केंद्रित डोनाल्ड ट्रंप की बेचैनी और रूस तथा चीन की हस्तक्षेपवादी नीतियों से यह प्रश्न सामने है कि भविष्य की विश्व व्यवस्था किन मूल्यों और शक्ति संतुलन पर आधारित होगी।

अमेरिका की केंद्रीय भूमिका

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने खुद को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित कर वैश्विक व्यवस्था के संरक्षक के रूप में भी अपनी भूमिका तैयार की। उसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार, सुरक्षा, वित्तीय संस्थाओं और सामरिक गठबंधनों का ऐसा ढांचा खड़ा किया, जिसने दशकों तक विश्व राजनीति की दिशा तय की। संयुक्त राष्ट्र, नाटो, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में अमेरिका की केंद्रीय भूमिका रही है।

डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुख्य मुद्रा बना, अमेरिकी तकनीक और बाजार दुनिया के विकास का आधार बने और उसकी सैन्य उपस्थिति ने अनेक क्षेत्रों में शक्ति संतुलन बनाए रखा। इसी कारण दुनिया के कई देशों ने अपनी सुरक्षा, व्यापार और आर्थिक स्थिरता के लिए अमेरिका पर भरोसा किया। अमेरिका सैन्य शक्ति के साथ वैश्विक नियमों, मुक्त व्यापार और कूटनीतिक संतुलन का प्रमुख केंद्र भी बना।

मगर डोनाल्ड ट्रंप के दौर में शुल्क संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय समझौतों से दूरी, सहयोगी देशों पर सार्वजनिक दबाव और वैश्विक संस्थाओं के प्रति अनिश्चित रवैये ने अमेरिका की उस छवि को कमजोर किया है, जो दशकों तक विश्व व्यवस्था के स्थिर नेतृत्वकर्ता की रही थी। वहीं चीन ने स्वयं को स्थिरता, निवेश और वैकल्पिक साझेदारी के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया है। यही वजह है कि आज कई देश बीजिंग की ओर हाथ बढ़ाते दिखाई दे रहे हैं। वे चीन के साथ व्यापार करना चाहते हैं, इसके साथ ही बदलते शक्ति संतुलन में अपनी नई रणनीतिक स्थिति भी तलाश रहे हैं।

चीन अभी पूरी तरह अमेरिका का विकल्प न बना हो, लेकिन बीते डेढ़ दशक में उसने यह अवश्य दिखा दिया है कि वह विश्व की राजनीति, वैश्विक व्यापार और सामरिक समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। दुनिया के अनेक देशों को अब यह महसूस भी होने लगा है कि आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था केवल अमेरिका केंद्रित नहीं रहेगी।

आर्थिक दबाव की रणनीति

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने कूटनीति को वैश्विक दृष्टिकोण से हटाकर घरेलू राजनीतिक लाभों तक सीमित कर दिया है। ट्रंप ने यूरोप, कनाडा, मैक्सिको और भारत सहित कई देशों पर शुल्क लगाए। अमेरिका के सहयोगियों को यह महसूस हुआ कि वाशिंगटन अब मित्र और प्रतिद्वंद्वी के बीच स्पष्ट अंतर नहीं कर पा रहा। यूरोपीय देशों ने इसे आर्थिक दबाव की राजनीति के रूप में देखा।

नाटो को लेकर ट्रंप का रवैया नकारात्मक रहा। इससे यूरोप में यह चिंता बढ़ी कि अमेरिका अब पहले जैसा भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार नहीं रहा। वर्ष 2015 में ईरान के साथ अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी तथा यूरोपीय संघ के बीच हुआ परमाणु समझौता एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था। इस समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना सहयोगियों के लिए बड़ा झटका था। इससे यह संदेश गया कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय समझौतों को घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार बदल सकता है।

इसी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेरिस समझौता जैसे वैश्विक ढांचों से दूरी बनाने के फैसलों ने भी अमेरिका की बहुपक्षीय नेतृत्वकर्ता की छवि को कमजोर किया।

संबंधों की शक्ति

अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल शक्ति से नहीं, बल्कि विश्वास और सम्मान से भी संचालित होते हैं और यही मानक ट्रंप की नीतियों से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। वेनेजुएला के नेतृत्व को अस्थिर करने के प्रयासों, कठोर आर्थिक प्रतिबंधों और ईरान के खिलाफ सैन्य एवं आर्थिक दबाव की अमेरिकी नीतियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है।

वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिबंधों और सत्ता संघर्ष ने तेल उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों पर पड़ा, जिससे कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा। इसी तरह ईरान पर हमलों से स्थितियां ज्यादा बिगड़ गईं। होर्मुज जलमार्ग बंद होने से वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बाधित हुई है।

पिछले कुछ वर्षों में कई देश वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था को लेकर गंभीर हो गए हैं। चीन और रूस ने इसी असंतोष का लाभ उठाकर डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक आर्थिक ढांचों को बढ़ावा देने की कोशिश की है। यूरोप में रणनीतिक स्वायत्तता की चर्चा तेज हुई है, जबकि कई देशों ने चीन और रूस के साथ संतुलित संबंध बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

ट्रंप की नीतियों से उत्पन्न वैश्विक असंतोष और चीन तथा रूस की वैकल्पिक शक्ति केंद्र बनने की कोशिशों के बीच विश्व व्यवस्था का भविष्य सवालों में है। अब चुनौती यह है कि क्या नई उभरती शक्तियां केवल अमेरिकी प्रभुत्व का विरोध कर रही हैं, या वे वास्तव में अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और संतुलित वैश्विक व्यवस्था प्रस्तुत कर सकती हैं। विश्व व्यवस्था की स्थिरता शक्ति के साथ विश्वास, नियमों और संस्थागत विश्वसनीयता से तय होती है।

नीतिगत राजनीतिक संरचनाएं

इसमें दोराय नहीं कि अमेरिका की नीतियों का विरोध घरेलू मोर्चे पर भी खुलकर होता है। इसके विपरीत चीन और रूस की राजनीतिक संरचनाएं केंद्रीकृत और नियंत्रण आधारित मानी जाती हैं। चीन में एकदलीय व्यवस्था है, जहां राजनीतिक असहमति, मीडिया स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर व्यापक नियंत्रण देखने को मिलता है। इसी प्रकार रूस में भी विपक्ष, मीडिया और राजनीतिक असहमति के प्रति कठोर रवैये की आलोचना होती रही है।

चीन और रूस स्वयं को पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन वहां उदार लोकतंत्र के वैकल्पिक मॉडल के किसी भी रूप का नामोनिशान तक नहीं है, जो वैश्विक स्तर पर शांतिप्रिय और वैधानिक व्यवस्था की मूलभूत जरूरत है। आवश्यकता किसी एक महाशक्ति के समर्थन या विरोध से अधिक इस बात की है कि दुनिया ऐसी संतुलित और उत्तरदायी वैश्विक व्यवस्था विकसित करे, जिसमें शक्ति के साथ सहयोग, जवाबदेही और मानवीय मूल्यों का स्थान भी सुरक्षित रहे।

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डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका वापस लौटे हुए अभी एक सप्ताह भी नहीं हुए हैं कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन के दौरे पर मंगलवार रात पहुंच गए हैं। उनका यह दौरा दो दिन यानी 19 और 20 मई तक है। बीजिंग एयरपोर्ट पहुंचने पर रूसी राष्ट्रपति का चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने खुद गर्मजोशी से स्वागत किया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक