आदिवासी समुदाय के विकास की पड़ताल अमूमन पक्की सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी योजनाओं के भारी-भरकम आंकड़ों से ही शुरू होती है। बेशक, किसी भी समाज की तरक्की के लिए इन बुनियादी सुविधाओं का होना पहली शर्त है। बीते कुछ वर्षों में केंद्र और राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर केंद्रित कई नीतियां बनाई हैं। ‘पीएम-जनमन’ और ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
धरती आबा अभियान के जरिए 17 मंत्रालयों की 25 योजनाओं को मिलाकर 63,843 आदिवासी गांवों के विकास का ‘मास्टरप्लान’ तैयार किया गया है, ताकि आने वाले पांच वर्षों में पांच करोड़ से अधिक आदिवासियों तक इसका सीधा फायदा पहुंच सके। लक्ष्य बड़ा है, लेकिन यहीं से आदिवासी विकास का असली विमर्श शुरू होता है। सवाल यह नहीं कि योजनाएं हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उनका लाभ मिला या नहीं। अगर कोई सुविधा मिली, तो क्या वह अवसर में बदली? और अवसर मिला, तो क्या वह अधिकार में तब्दील हुआ? अगर इन सवालों के जवाब ‘हां’ हो, तभी कोई सड़क महज रास्ता न रहकर विकास की रेखा बन पाती है।
शिक्षा और संस्कृति
आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर हमारी सोच अक्सर स्कूल के गेट पर खत्म हो जाती है। बच्चा स्कूल पहुंच गया, दाखिला हो गया… मतलब सब ठीक हो गया। मगर असल कहानी इस चौखट के भीतर से शुरू होती है। सरकार कागजों पर एकलव्य विद्यालयों के आंकड़े गिनाती है- 728 स्वीकृत, 518 चालू और 1.70 लाख बच्चे। मगर इमारतों से ज्यादा जरूरी उनके भीतर की हकीकत है। क्या वहां पर्याप्त शिक्षक हैं? क्या शुरुआती पढ़ाई उनके अपने परिवेश से जुड़ती है? जब बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए परिवार से दूर इन आवासीय विद्यालयों में रखा जाता है, तो उनकी सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की जिम्मेदारी और भी गंभीर हो जाती है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आदिवासी आश्रम स्कूल में बिस्तर के अभाव में जमीन पर सो रही तीन बच्चियों की सांप के काटने से हुई मौत का मामला इसी सवाल को सामने लाता है।
एकलव्य विद्यालयों में स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को जगह देने की पहल जरूर की गई है, लेकिन सिर्फ व्यवस्था बना देना काफी नहीं। स्थानीय भाषा से परिचित शिक्षक न हों, तो बच्चों से सहज संवाद मुश्किल होता है। कई जगह यह व्यवस्था महज खानापूर्ति साबित हो रही है। शिक्षा आदिवासी बच्चों को आगे बढ़ाए, लेकिन उनकी भाषा और पहचान को पीछे छोड़े बिना। यही संतुलन शिक्षा को सही मायने में अवसर बना सकता है।
सुविधाओं की हकीकत
आदिवासियों के स्वास्थ्य की सच्चाई सिर्फ अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों की गिनती से तय नहीं होती। मीलों का सफर, आने-जाने का खर्च और स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सक एवं दवाओं की गैरमौजूदगी, सुविधाओं की इन इमारतों को बेमानी कर देती है। मातृ स्वास्थ्य से लेकर कुपोषण और मलेरिया जैसी समस्याएं इसी आधी-अधूरी व्यवस्था का नतीजा है। ‘पीएम-जनमन’ के तहत चल रहीं 800 से ज्यादा सचल चिकित्सा इकाइयां एक अच्छी पहल जरूर हैं, लेकिन इनका कभी-कभार गांव पहुंचना और जरूरत पड़ने पर (जैसे सुरक्षित प्रसव या गंभीर बीमारी में) तुरंत इलाज मिलना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। आदिवासी आबादी को प्रभावित करने वाली आनुवंशिक बीमारी ‘सिकल सेल’ इस चुनौती की सबसे बड़ी मिसाल है।
सरकारी अभियान के तहत 16 जुलाई, 2026 तक 7.24 करोड़ लोगों की जांच हुई, जिनमें से इस बीमारी के 2,47,961 मरीज पाए गए, जबकि 20,35,181 लोगों की पहचान इस बीमारी के वाहक के रूप में की गई। मगर हकीकत इन आंकड़ों से भी परे है। वर्ष 2026 में राजस्थान के अध्ययन और महाराष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि मीलों दूर स्वास्थ्य केंद्र, महंगा इलाज, खस्ताहाल ढांचा और कर्मियों की कमी मरीजों के रास्ते की बड़ी दीवार है। बीमारी पकड़ में आने के बाद सुविधाओं के अभाव और सामाजिक झिझक के कारण नियमित जांच कराना बहुत कठिन हो जाता है।
आजीविका का आधार
आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल और जमीन सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। उनकी रोजमर्रा की कई जरूरतें इन्हीं से जुड़ी हैं। ऐसे में किसी इलाके में खनन, उद्योग, सड़क या दूसरी परियोजना आती है, तो उसे सिर्फ विकास कह देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि उससे स्थानीय लोगों की जमीन, आजीविका और पर्यावरण पर क्या असर पड़ा तथा फैसले में उनकी आवाज कितनी शामिल थी। इस संदर्भ में वन अधिकार कानून, 2006 महत्त्वपूर्ण है। इसके तहत जंगल पर लंबे समय से निर्भर परिवार और समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों की मान्यता के लिए दावा कर सकते हैं। 30 जून, 2026 तक देश भर में ऐसे 54 लाख से अधिक व्यक्तिगत दावे सरकारी महकमों को प्राप्त हुए थे, जिनमें करीब 25.42 लाख को मंजूरी देकर अधिकार-पत्र दिए गए। इनमें से दस लाख से अधिक दावे अभी लंबित थे। इसी अवधि में 19,845 सामुदायिक वन अधिकारों को भी मान्यता दी गई। मगर कागज पर अधिकार मिलना और जमीन पर उसका लाभ मिलना दोनों अलग-अलग बातें हैं। कई जगह प्रक्रिया की जानकारी का अभाव, दस्तावेजों की जटिलता और प्रशासनिक अड़चनें रास्ता रोक देती हैं।
आदिवासी इलाकों से पलायन को सिर्फ रोजगार की तलाश मान लेना तस्वीर के एक हिस्से को ही दर्शाता है। जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक, करीब अस्सी फीसद आदिवासी आबादी खेती और जंगल आधारित आजीविका पर निर्भर है। ऐसे में अगर जमीन, वन उपज और स्थानीय काम के अवसर कमजोर पड़ते हैं, तो गांव में टिके रहना भी मुश्किल होता जाता है। सवाल यह भी है कि क्या विकास गांव में इतनी आजीविका छोड़ रहा है कि लोगों को अपनी जमीन और घर छोड़कर रोजी की तलाश में बाहर न जाना पड़े?
निर्णय में भागीदारी
जीडीपी की बहसों के बीच क्या हमारी नजर कभी उस अर्थव्यवस्था पर जाती है, जो पूरी तरह आदिवासी महिलाओं के कंधों पर टिकी है? महुआ बीनने से लेकर घर और खेत तक- यह वह श्रम है, जो कहीं दर्ज नहीं होता। मगर विडंबना देखिए, जब भी जल, जंगल या जमीन की नीतियां बदलती हैं, सबसे गहरी चोट इन्हीं पर पड़ती है। ‘वन धन विकास केंद्र’ जैसी योजनाएं कागजों पर शानदार लगती हैं। अगस्त 2026 तक के सरकारी आंकड़ों में ऐसे हजारों केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। मगर जमीनी हकीकत में ये आंकड़े तब तक बेमानी हैं, जब तक महुआ और शहद जैसे उत्पादों का आदिवासियों को उचित दाम नहीं मिल पाता। बदलाव तब दिखेगा, जब मुनाफे का सीधा हिस्सा संबंधित आदिवासी महिलाओं की मुट्ठी में जाएगा। बात सिर्फ रोजगार की ही नहीं, बल्कि उनके अपने ही संसाधनों पर हक की भी है।
इसके साथ ही आदिवासी युवाओं के लिए नजरिए को भी बदलना होगा। उन्हें सिर्फ ‘कौशल विकास’ के प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि अपना काम शुरू करने के लिए आसान पूंजी और डिजिटल बाजार तक ठोस पहुंच भी जरूरी है। आदिवासी विकास की असली कसौटी यही है कि नीतियां उनके लिए नहीं, उनकी भागीदारी से बनें। ग्रामसभा, महिलाओं, युवाओं और उनके अनुभवों एवं समझ को फैसले की प्रक्रिया में जगह मिलनी चाहिए।
विकास का पैमाना केवल योजनाओं और बजट के आंकड़ों से तय नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि इन योजनाओं ने लोगों के जीवन में कितना बदलाव किया, जल-जंगल-जमीन पर उनके अधिकार को कितना मजबूत किया और शिक्षा, रोजगार तथा अवसरों तक उनकी पहुंच कितनी बढ़ाई?
