पश्चिमी राजस्थान में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ को काटे जाने और गांवों की चरागाह भूमि के अधिग्रहण का व्यापक स्तर पर विरोध होना कोई सामान्य घटना नहीं है। स्थानीय लोगों की ओर से इन दरख्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और पारंपरिक चरागाहों के संरक्षण की मांग ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस सौर ऊर्जा को पर्यावरण हितैषी माना जाता है, क्या उसी के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना उचित है?

वैसे देखा जाए तो भारत पिछले एक दशक में जिस तेज गति से सौर ऊर्जा की ओर अग्रसर हुआ है, वह न केवल तकनीकी प्रगति का प्रमाण है, बल्कि वैश्विक जलवायु संकट के प्रति देश की रणनीतिक समझ का भी संकेत देता है। वर्ष 2014 में जहां भारत की कुल स्थापित सौर क्षमता मात्र तीन गीगावाट के आसपास थी, वहीं आज यह 135 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। यह वृद्धि केवल संख्यात्मक नहीं है; यह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति, नीति समर्थन और पूंजी निवेश का परिणाम है, जिसने सौर ऊर्जा को भारत की ऊर्जा नीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, कार्बन डाइआक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाना तथा ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना- ये सभी लक्ष्य सौर ऊर्जा के विस्तार से जुड़े हैं।

सौर ऊर्जा को ‘स्वच्छ’, ‘हरित’ और ‘नवीकरणीय’ कहा जाता है

सौर ऊर्जा की मूल अवधारणा अत्यंत सरल और नैतिक रूप से आकर्षक है। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा न तो प्रदूषण फैलाती है, न ही सीमित संसाधनों पर किसी तरह का दबाव डालती है। कोयला, तेल और गैस आधारित विद्युत उत्पादन के विपरीत, सौर ऊर्जा उत्पादन के दौरान न तो धुआं निकलता है, न राख बनती है और न ही कार्बन डाइआक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड या नाइट्रोजन आक्साइड जैसी घातक गैसों का उत्सर्जन होता है। यही कारण है कि सौर ऊर्जा को ‘स्वच्छ’, ‘हरित’ और ‘नवीकरणीय’ कहा गया है, और इसी आधार पर इसे वैश्विक जलवायु समाधान का प्रमुख साधन माना गया है।

मगर नीति-निर्माण में कोई भी समाधान तब तक पूर्ण नहीं होता, जब तक उसके सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का सम्यक आकलन न किया जाए। भारत में सौर ऊर्जा के उत्पादन में तेजी के साथ-साथ अब एक गंभीर प्रश्न भी उभर कर सामने आ रहा है कि क्या सौर ऊर्जा का मौजूदा विकास माडल वास्तव में पर्यावरणीय दृष्टि से उतना ही लाभकारी है, जितना कि उसे माना जा रहा है? विशेषकर तब, जब सौर परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और हरे-भरे पेड़ों को काटने की घटनाएं सामने आ रही हैं।

राजस्थान इस मामले में एक उदाहरण है। देश का यह राज्य सौर ऊर्जा की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण है; वर्ष में 300 से अधिक धूप वाले दिन, विशाल भूभाग और अपेक्षाकृत कम जनसंख्या घनत्व। यही कारण है कि राजस्थान आज भारत के अग्रणी सौर ऊर्जा उत्पादक राज्यों में शामिल है। मगर यही प्रदेश पिछले कुछ अरसे में बहुमूल्य वृक्षों की कटाई को लेकर सामाजिक और पर्यावरणीय असंतोष का केंद्र भी बन गया है। यहां सौर परियोजनाओं के लिए जिन क्षेत्रों का चयन किया जा रहा है, वे केवल खाली भूमि नहीं है; वे जीवित पारिस्थितिक तंत्र हैं, जिनमें वृक्ष, पशु-पक्षी और स्थानीय समुदायों का जीवन गहराई से जुड़ा हुआ है।

नीतिगत स्तर पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सौर संयंत्रों के लिए ‘बंजर’ भूमि का उपयोग किया जा रहा है। मगर पर्यावरण विज्ञान बताता है कि बंजर दिखाई देने वाली भूमि भी पारिस्थितिकी की दृष्टि से निष्क्रिय नहीं होती। विशेषकर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, जैसे राजस्थान में ‘खेजड़ी’ जैसे वृक्ष पर्यावरण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये वृक्ष न केवल कार्बन डाइआक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित रखते हैं, बल्कि मिट्टी को बांधते हैं, जल संरक्षण में सहायता करते हैं और स्थानीय जलवायु को नियंत्रित करते हैं।

पेड़ों के कटने से कार्बन सोखने की क्षमता समाप्त होती है

सामान्यत: एक मेगावाट सौर संयंत्र के लिए लगभग चार से पांच एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। यदि उस भूमि पर दर्जनों या सैकड़ों वृक्ष मौजूद हैं, तो उनके कटने से कार्बन सोखने की जो क्षमता समाप्त होती है, उसकी भरपाई सौर पैनल द्वारा उत्पादित स्वच्छ ऊर्जा से तुरंत नहीं की जा सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो सौर ऊर्जा से जो कार्बन उत्सर्जन बचाया जाता है, उसका एक हिस्सा पेड़ों की कटाई के कारण खो भी जाता है।

अगले कुछ दशकों में जब आज लगाए जा रहे सौर पैनल बड़ी मात्रा में अनुपयोगी होंगे, तब उनके निस्तारण से उत्पन्न ई-कचरा और उससे जुड़े पर्यावरणीय जोखिम एक नई चुनौती बनकर सामने आएंगे। यदि इन सभी पहलुओं को जोड़कर देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि सौर ऊर्जा का वर्तमान मूल्यांकन अधूरा है; यह लागत और उत्पादन पर केंद्रित है, पर शुद्ध पर्यावरणीय लाभ की गणना से दूर है।

ऐसे में सौर ऊर्जा के मूल्यांकन को केवल लागत-प्रति-यूनिट या स्थापित क्षमता के आधार पर नहीं देखा जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक सौर परियोजना का जीवन-चक्र आधारित पर्यावरणीय आकलन किया जाए। इसमें यह देखा जाना चाहिए कि परियोजना के निर्माण, भूमि परिवर्तन, वृक्ष कटाई, संचालन और अंतत: सौर पैनलों के निस्तारण तक कुल कितनी पर्यावरणीय लागत उत्पन्न होती है, और उसके मुकाबले वास्तविक पर्यावरणीय लाभ कितना है। जब तक यह संतुलन स्पष्ट नहीं होगा, तब तक ‘स्वच्छ ऊर्जा’ का दावा अधूरा रहेगा।

वर्तमान व्यवस्था में सौर परियोजनाओं को तेजी से स्वीकृति देने की होड़ में पर्यावरणीय मूल्यांकन को औपचारिकता मात्र बना दिया गया है। पेड़ों की कटाई के बदले प्रतिपूरक वृक्षारोपण की शर्तें तो लगाई जाती हैं, मगर यह शायद ही कभी देखा जाता है कि लगाए गए पौधे जीवित रहते हैं या नहीं, और क्या वे उसी पारिस्थितिक क्षेत्र में लगाए गए हैं, जहां नुकसान हुआ है।

एक परिपक्व वृक्ष और एक नवरोपित पौधे के बीच के पर्यावरणीय अंतर को नीति में शायद ही कभी गंभीरता से लिया जाता है। इस संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सौर ऊर्जा का वर्तमान विस्तार माडल वास्तव में जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायक है, या वह अनजाने में एक नई पर्यावरणीय समस्या को जन्म दे रहा है।

यदि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयास में हम कार्बन सोखने के प्राकृतिक तंत्र को ही नष्ट करना शुरू दें, तो यह एक प्रकार का नीतिगत विरोधाभास होगा। स्वच्छ ऊर्जा का उद्देश्य केवल चिमनियों से निकलने वाले धुएं को रोकना नहीं है, बल्कि पृथ्वी की प्राकृतिक संतुलन प्रणालियों को सुदृढ़ करना भी है।

मगर इस समस्या का समाधान सौर ऊर्जा को सीमित करना नहीं है, बल्कि उसके विकास के तरीके को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। नीति-निर्माताओं को यह स्वीकार करना होगा कि नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन अनिवार्य है।

इमारतों की छतों, नहरों और परित्यक्त औद्योगिक भूमि पर सोलर पैनल लगाना तथा रेलवे और राजमार्ग गलियारा जैसे विकल्प भूमि एवं वृक्षों की कटाई पर दबाव कम कर सकते हैं। साथ ही ‘एग्रीवोल्टाइक’ जैसी प्रणालियां भूमि के द्वि-उपयोग का मार्ग खोलती हैं, जहां कृषि और सौर ऊर्जा का उत्पादन साथ-साथ हो सकता है।

भारत की सौर नीति को अब एक नए चरण में प्रवेश करना होगा, जहां लक्ष्य केवल गीगावाट जोड़ना नहीं, बल्कि वास्तविक पर्यावरणीय लाभ सुनिश्चित करना हो। सौर ऊर्जा तभी नवीकरणीय कही जा सकेगी, जब उसका विस्तार वृक्षों, भूमि और स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए हो। अन्यथा, स्वच्छ ऊर्जा का यह सपना अपनी ही जड़ों को काटता हुआ आगे बढ़ेगा।

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